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क्या कुछ चमत्कारी बाबाओं ने रखी थी कांग्रेस की नींव?

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: October 11, 2019, 11:21 AM IST
क्या कुछ चमत्कारी बाबाओं ने रखी थी कांग्रेस की नींव?
1885 में पहली कांग्रेस के साथ बीचोंबीच ए. ओ. ह्यूम.

सवा सौ साल से भी पहले जब देश की पहली राजनीतिक पार्टी (Political Party) कांग्रेस (Congress) की स्थापना हुई थी, जानिए तब ऐसी पार्टी के आइडिया को लेकर क्या कहता है इतिहास.

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  • Last Updated: October 11, 2019, 11:21 AM IST
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कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष (Congress President) और प्रदेश अध्यक्षों को लेकर कई तरह की चर्चाएं ज़ोरों पर हैं. ये भी कहा जा रहा है कि देश की सवा सौ साल से ज़्यादा पुरानी राष्ट्रीय पार्टी (National Party) का झुकाव राष्ट्रवादी और हिंदुत्व (Hindutva) के एजेंडे की तरफ भी है, ऐसे में आपको ये जानकर हैरत हो सकती है कि कांग्रेस की स्थापना (History of Congress) के पीछे कुछ पहुंचे हुए साधु महात्माओं का बड़ा रोल रहा था! जी हां, इतिहास के पन्नों में दर्ज एक थ्योरी की मानें तो कांग्रेस की स्थापना ए. ओ. ह्यूम (A. O. Hume) ने की ज़रूर थी लेकिन इसकी प्रेरणा उन्हें कुछ चमत्कारी महात्माओं के ज़रिए मिली थी.

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इतिहास के हवाले से बात की जाए तो इस थ्योरी को कुछ इतिहासकार (Historians) मनगढ़ंत या अप्रामाणिक करार देते हैं, तो कुछ मानते हैं कि उन चिंतक महात्माओं (Spiritual Gurus) की प्रेरणा से ही ह्यूम को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress) की स्थापना करने का आइडिया मिला था. जानिए कि अस्ल में क्या है ये हैरान करने वाली थ्योरी और कांग्रेस की स्थापना को लेकर इतिहास कैसे इस थ्योरी की चर्चा करता है.

हिमालय में गुप्त रूप से रहते थे ये महात्मा!

भारत में ब्रिटेन की इंपीरियल सिविल सर्विसेज़ के अधिकारी ह्यूम को भारत के इन चमत्कारी महात्माओं के बारे में अमेरिका में थियोसॉफिकल सोसायटी की स्थापना करने वाली मादाम ब्लैवैत्स्की के ज़रिए पता चला था. ब्लैवैत्स्की ने इन आध्यात्मिक गुरुओं को महात्मा कहा था और ह्यूम को बताया था कि ये महात्मा हिमालय में गुप्त रूप से तिब्बत के पास कहीं रहते थे लेकिन इनके पास करिश्माई शक्तियां थीं जिनसे वह कहीं से भी किसी के भी साथ जुड़ सकते थे और भारत के जनमानस को प्रभावित कर सकते थे.

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भारतीय धर्म और अध्यात्म से प्रभावित होकर ह्यूम ने शाकाहार अपनाया था और शिकार भी छोड़ा था.

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क्या ह्यूम को इस पर विश्वास था?
इतिहासकार बिपिन चंद्रा ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पुस्तक में इस पूरी घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि ब्लैवैत्स्की ने ह्यूम की मुलाकात ऐसे ही एक महात्मा कूट हूमी लाल सिंह के साथ करवाई भी थी. वहीं, पायनियर के संपादक एपी सिनेट ने 1880 में एक किताब लिखी थी, जिसमें ऐसे ही महात्माओं के साथ सिनेट के पत्र व्यवहार को लेकर दस्तावेज़ थे.

सिनेट की किताब में कहा गया था कि इन्हीं महात्माओं ने 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के समय अपनी चमत्कारी शक्तियों से भारतीय जनमानस को नियंत्रित किया था और एक तरह से ब्रिटिश हुकूमत की मदद की थी. ब्लैवैत्स्की और इस किताब का यही प्रभाव था कि ह्यूम ने इन बातों पर विश्वास किया और उन्हें लगा कि ये महात्मा फिर ब्रिटिश सरकार की मदद कर सकते हैं. दूसरी बात ये भी कि भारतीय और पूर्वी एशियाई धर्मों और अध्यात्म में ह्यूम की काफी दिलचस्पी रही थी.

पागल थे या झूठे थे ह्यूम?
चंद्रा की किताब में उल्लेख है कि 1883 के आसपास ह्यूम ने इन महात्माओं के साथ भारतीय प्रशासन को बेहतर करने संबंधी विषयों पर चर्चा की थी. दूसरी तरफ, वायसराय रिपन और दूसरे ब्रिटिश आला ​अधिकारियों को इन महात्माओं की चमत्कारी शक्तियों पर विश्वास करने और ब्रिटिश सरकार को इनकी मदद लेने के लिए मनाने की कोशिश की थी.

ये चर्चा आगे बढ़ी और जब ब्रिटिश हुकूमत ने इन महात्माओं को लेकर ह्यूम से ठोस सबूत मांगे तो ह्यूम ऐसा कोई सबूत नहीं दे सके, जिससे उन पर विश्वास किया जा सके. इस बात से चिड़चिड़ा चुके ह्यूम के हवाले से ये भी लिखा मिलता है कि उस वक्त भारत में मौजूद यूरोपीय लोग 'या तो उन्हें पागल समझते थे या झूठा'.

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बिपिन चंद्रा लिखित किताब का कवर पेज, जिसमें कांग्रेस की स्थापना से जुड़ा इतिहास दर्ज है.


कांग्रेस की स्थापना की दूसरी थ्योरी
चंद्रा की ही किताब में महात्माओं वाली इस थ्योरी को कांग्रेस की स्थापना को लेकर मिथक वाले अध्याय में दर्ज करते हुए अगले अध्याय में लिखा गया है कि वास्तविक कारण ये था कि कांग्रेस की स्थापना भारतीय नेताओं और ब्रिटिश सरकार के बीच करीब दो दशकों से चल रही बातचीत का नतीजा थी, जिसमें भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश सरकार में अपना पक्ष रखने के लिए राजनीतिक अधिकारों पर बहस छेड़ी थी. चंद्रा के ही शब्दों में :

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना न तो अचानक हुई थी और न ऐतिहासिक दुर्घटना थी. 1860 के दशक में इस तरह की शुरूआत हुई थी और 1885 में एक टर्निंग प्वाइंट दिखा था. भारतीय नेताओं, राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले छोटे गुट जो राष्ट्रीय में जुड़ना चाहते थे, भारतीय विद्वान, सभी ने मिलकर एक राष्ट्रीय पार्टी के लिए जो जद्दोजहद की थी, यह उसका नतीजा था.


तो क्या बकवास है महात्माओं वाली थ्योरी?
चंद्रा अपनी किताब में लिखते हैं​ कि ह्यूम का सबूत पेश न कर पाना बड़ा कारण है कि इस थ्योरी पर विश्वास न किया जाए. ह्यूम ने जिन सात वॉल्यूम्स का ज़िक्र किया था, उनके मुताबिक वो महात्माओं की चमत्कारी शक्तियों के कारण अदृश्य हो गए और वो महात्मा खुद हिमालय लौट गए. इस बारे में कोई पुख्ता ऐतिहासिक प्रमाण अब तक सामने न आने के कारण ह्यूम के ये सारे किस्से विश्वास योग्य नहीं हैं. लेकिन एक और खेमा है जो इस थ्योरी को कुछ स्वीकार भी करता है.

वर्ल्ड हिस्ट्री के चर्चित जॉर्नल में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना पर क्रॉस कल्चरल सिंथेसिस संबंधी केस स्टडी के लेखक हेन्स डब्ल्यू ट्रैविस के लेख के हवाले से कहा जाता है कि ह्यूम कई भारतीय चिंतकों के संपर्क में थे और वह भारत के राष्ट्रवादी विचारों के समर्थक थे इसलिए कांग्रेस की स्थापना के आइडिया के पीछे उन पर इन प्रभावों को माना जाना चाहिए.

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First published: October 11, 2019, 11:21 AM IST
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