जासूस चीन: क्या है 'हाइब्रिड वॉरफेयर', डेटा को कैसे इस्तेमाल कर सकता है चीन?

भारत के खिलाफ चीन डिजिटल सर्विलांस कर रहा है.

भारत के खिलाफ चीन डिजिटल सर्विलांस कर रहा है.

भारत के हज़ारों VIPs की जासूसी (China Surveillance Indian VIPs) के साथ ही चीन दुनिया भर में अपने दुश्मन देशों या रणनीतिक तौर पर अहम देशों के खिलाफ भी 'हाइब्रिड वॉरफेयर' की चाल चल रहा है, जो बेहद खतरनाक है.

  • News18India
  • Last Updated: September 15, 2020, 10:23 PM IST
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एक तरफ, भारत के उत्तरी छोर पर सीमा विवाद (Border Dispute) को हवा देकर चीन ने तनाव (Border Tension) की स्थिति बना रखी है, तो दूसरी तरफ, वो भारत के खिलाफ हर मुमकिन साज़िश रचने से बाज़ भी नहीं आ रहा है. हाल में आई एक रिपोर्ट में कहा गया कि चीन भारत की 10,000 से ज़्यादा अहम शख्सियतों की जासूसी (China Spying India) कर रहा है. यह जासूसी चीन के शेनज़ेन इलाके (Shenzen) में बेस्ड कंपनी ज़ेनहुआ (Zhenhua) डेटा इन्फॉर्मेशन टेक कंपनी के मारफत की जा रही है. यह कंपनी चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party of China) से संबंध रखती है.

इस कंपनी के ज़रिये चीनी प्रशासन 'हाइब्रिड वॉरफेयर' का इस्तेमाल करते हुए बड़े पैमाने पर डेटा का इस्तेमाल जासूसी के लिए कर रहा है. हाल में, सामने आई रिपोर्ट में कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी, डिफेंस प्रमुख जनरल बिपिन रावत समेत तमाम मुख्यमंत्रियों, मुख्य न्यायाधीश, सीएजी और फोर्सों के पूर्व व वर्तमान प्रमुखों पर चीन पूरी निगरानी रख रहा है. इसके अलावा, रतन टाटा और गौतम अडानी जैसे उद्योगपति भी चीन की नज़र में हैं.

जिस चीनी कंपनी के ज़रिये ये जासूसी की जा रही है, वो भारत में रियल टाइम सर्विलांस बड़े पैमाने पर करने के लिए जानी जाती है. अब आपको जानना चाहिए कि 'हाइब्रिड वॉरफेयर' का पूरा खेल क्या है और इससे भारत को कैसे और कितना नुकसान चीन पहुंचा सकता है.

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रूस की तर्ज़ पर चीन प्रॉक्सी वॉर की रणनीति अपना रहा है.

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क्या होता है हाइब्रिड वॉरफेयर?

दुश्मनों के साथ जंग करने का यह गैर पारंपरिक यानी नये ज़माने का तरीका है. इस तरह की रणनीति में डेटा का खेल होता है और उस डेटा के विश्लेषण के बाद दुश्मन के खिलाफ चालें चली जाती हैं. जैसे इस डेटा की मदद से आप दुश्मन के घर में गलत सूचनाएं फैलाकर फसाद या हिंसा करवा सकते हैं, वित्तीय मामलों में गड़बड़ियों को अंजाम दिया जा सकता है और देश के खिलाफ विद्रोह भड़काया जा सकता है.



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एक किस्म के 'प्रॉक्सी वॉर' यानी छद्मयुद्ध के तौर से हाइब्रिड वॉरफेयर को समझा जा सकता है. इसमें दुश्मन के साथ आप खुले तौर पर कोई जंग नहीं करते हैं, लेकिन उसके घर में तनाव और घातक गतिविधियों को अंजाम दे सकते हैं. 1999 में भी चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने इस तरह की चालें चली थीं और तब इसे 'अनलिमिटेड वॉरफेयर' कहा गया था.

क्यों हो रहा है इस रणनीति का इस्तेमाल?

दुश्मन देशों में असंतोष और हिंसा फैलाने वाले छद्मयुद्ध का यह तरीका वास्तव में चीन का आइडिया नहीं है. खबरों की मानें तो चीन के लिए इस हाइब्रिड वॉरफेयर के मास्टरमाइंड चीनी सेना के कर्नल कायो लिआंग और कर्नल वांग शिआंगसुई हैं. लेकिन, 2014-15 में रूस ने जिस तरह क्रीमिया में ​बगैर किसी खुले युद्ध के कामयाबी हासिल की, तबसे हर दूसरा देश इस तरह की रणनीति का इस्तेमाल करने में दिलचस्पी ले रहा है.

ज़ेनहुआ डेटा तकनीक क्या है?

चीन की नेवी और इंटेलिजेंस से सीधे संबंध रखने वाली यह चीनी कंपनी डेटा सूचनाएं जुटाने में महिर है. हर डिजिटल गतिविधि पर बारीक नज़र रखती है और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भी रास्ता बनाती है. नतीजा यह होता है कि इससे एक पूरी 'सूचना लाइब्रेरी' बन जाती है और फिर काम के डेटा को छांटकर उसका विश्लेषण होता है. अब यह सवाल खड़ा होता है कि किस तरह के डेटा पर खास नज़र रखी जाती है.

क्या है काम का डेटा?

पते, वैवाहिक स्टेटस, खास लोगों के साथ तस्वीरें, राजनीतिक रिश्ते, परिवार और सोशल ​मीडिया पर सक्रियता जैसी सूचनाएं जासूसी और प्रॉक्सी वॉर के लिहाज़ से अहम समझी जाती हैं. ज़ेनहुआ कंपनी इस तरह की तमाम सूचनाओं का भंडार चीन की 'थ्रेट इंटेलिजेंस सर्विस' को सौंपती है. साथ ही, कंपनी उस डेटा को नष्ट नहीं करती, जो इंटेलिजेंस या चीनी सेना के काम का न हो, उसे भी अलग से भविष्य के लिए मेंटेन किया जाता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि इस डेटा का इस्तेमाल खतरनाक ढंग से हो सकता है.

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न्यूज़18 क्रिएटिव


भारत के हिसाब से क्या यह गैरकानूनी है?

भारत में आईटी के लिए जो कायदे कानून हैं, उनके मुताबिक सोशल मीडिया या डिजिटल प्लेटफॉर्म से कंपनियां विज्ञापन और मार्केटिंग के लिए डेटा लेती हैं और इस्तेमाल करती हैं, इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है. यानी तकनीकी रूप से ज़ेनहुआ के खिलाफ कार्रवाई करना बहुत कठिन है. लेकिन जब यह एंगल हो कि कोई विदेशी कंपनी दुश्मन देश के इंटेलिजेंस को डेटा देने के लिए सूचनाएं जुटा रही हो, तब क्या नियम होंगे? क्या तब भी इसे कानूनी माना जाए? इन तमाम विषयों पर प्रावधानों की ज़रूरत है.

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क्या 'बॉयकॉट चीन' कारगर है?

भारत और चीन के बीच सीमा तनाव के साथ ही प्रॉक्सी वॉर के हालात में भारत ने पिछले दिनों चीनी एप्स को प्रतिबंधित करके बॉयकॉट के कदम उठाए. हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि चीनी एप्स बंद करने से ज़ेनहुआ के मारफत चीन के जो नापाक इरादे हैं, उन पर कोई खास असर नहीं पड़ता. चीन की तकनीक यही है कि वो प्रोपैगेंडा, भ्रामक सूचनाओं यानी इन्फो एयर पॉल्यूशन के ज़रिये दुश्मन की नाक में दम करे.

सिर्फ भारत ही निशाने पर है या?

जी नहीं. चीन अपने तमाम दुश्मनों के खिलाफ इसी रणनीति का इस्तेमाल कर रहा है. अमेरिका और यूरोप के कई देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा, इं​टेलिजेंस और अर्थव्यवस्था से जुड़ी संवेदनशील सूचनाएं सोशल मीडिया के ज़रिये चीन जुटा रहा है. खबरों में यह भी कहा गया कि चीनी कंपनी के पास दुनिया भर के करीब 24 लाख लोगों का डेटाबेस है, जिसमें 35,000 ऑस्ट्रेलियाई लोग भी शामिल हैं. चीन की इन नापाक चालों के खिलाफ क्या उसके दुश्मन देश किसी तरह लामबंद हो सकते हैं? जवाब के लिए समय का इंतज़ार करें.
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