सिक्किम के विलय और बांग्लादेश बनाने के पीछे था ये कश्मीरी

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Updated: August 20, 2019, 7:16 PM IST
सिक्किम के विलय और बांग्लादेश बनाने के पीछे था ये कश्मीरी
इंदिरा गांधी के कार्यकाल में रॉ का जन्म हुआ और काव को प्रमुख बनाया गया.

भारत में खुफिया एजेंसी रॉ (R&AW) के संस्थापक आरएन काव के मेमोरियल (RN Kao Memorial) पर इस साल केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) के लेक्चर के आयोजन के मौके पर जानें कि काव ने कैसे रॉ बनाई और किन कारनामों को अंजाम दिया.

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1970 के दशक में भारत नहीं बल्कि दुनिया के पांच टॉप खुफ़िया प्रमुखों (Top Spy) में जो नाम शामिल था, उनमें से एक थे आरएन काव, जिन्होंने देश की जासूसी एजेंसी (India's Spy Agency) रॉ की बुनियाद रखी थी. तख्तापलट कर सिक्किम को भारत का राज्य बनाने और पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश (Bangladesh) के तौर पर एक नया देश बनाने का बड़ा श्रेय काव को दिया जाता है. भारत के पहले जासूस, पहली जासूसी एजेंसी के संस्थापक और दुनिया भर में अपनी प्रतिभा के लिए मशहूर काव के बारे में जानने के साथ यह भी जानिए कि बांग्लादेश की नींव रखने के पीछे रॉ प्रमुख की क्या भूमिका रही थी.

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असल में, 1947 में जब देश आज़ाद (Independence Day) हुआ तो देश में खुफिया तंत्र की कोई सुचारू व्यवस्था नहीं थी. ऐसे में जब इंटेलिजेंस ब्यूरो की व्यवस्था बनी तो बाहरी गुप्तचरी का ज़िम्मा काव को सौंपा गया, जो उस वक्त देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) की सुरक्षा के लिए भी जिम्मेदार थे. बाद में, इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के सुरक्षा प्रमुख रहे काव ने 1968 में देश की खुफिया एजेंसी रॉ की नींव रखी थी. आइए उत्तर प्रदेश के बनारस में एक कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मे काव से जुड़ी बेहद खास बातें जानें.

ऐसी हुई थी रॉ की स्थापना

1955 में चीनी प्रधानमंत्री ने जो प्लेन हायर किया था, वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस सिलसिले में चीनी सरकार ने काव से जांच करने को कहा था और काव ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि उस प्लेन हादसे के पीछे ताइवान की खुफिया एजेंसी थी जिसने चीनी प्रधानमंत्री को मारने की साज़िश रची थी. इस जांच के बाद चीन ने काव की ज़बरदस्त तारीफ की थी. साथ ही 1962 के चीन युद्ध के बाद चीन की नाक के नीचे रक्तविहीन तख्तापलट कर सिक्किम का भारत के राज्य के तौर पर विलय करवाने के कारण दिल्ली तक उनकी प्रतिभा की गूंज हुई थी.

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1968 में इंदिरा गांधी सरकार ने रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ की शुरुआत की तो काव को प्रमुख नियुक्त किया.

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1968 में इंदिरा गांधी सरकार ने जब सीआईए और एमआई6 की देखादेखी भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ की शुरुआत की तो उसके पीछे भी विचार काव का था और काव को ही उसका पहला प्रमुख नियुक्त किया गया. अब काव के सामने चैलेंज ये था कि वह इस एजेंसी की उपयोगिता साबित कर सकें.

बांग्लोदश बनने के पीछे रॉ का हाथ
कैबिनेट सचिवालय के पूर्व विशेष सचिव वाप्पला बालचंद्रन का एक लेख मंगलवार को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ है, जिसमें कहा गया है कि 1971 के युद्ध के समय पाकिस्तान ने भारत पर हवाई हमले की जो योजना बनाई थी, उसे रॉ ने ही इंटरसेप्ट किया था और भारत एक बड़े हमले से बच सका था. इसी लेख के मुताबिक कहा गया है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने 1971 के हालात का ज़िक्र करते हुए लिखा था कि इंदिरा गांधी सरकार में मुख्य सचिव रहे पीएन हक्सर के आर्काइव से रमेश को कई ऐसे पत्र मिले जिनसे खुलासा हुआ कि बांग्लोदश के गठन के पीछे काव की भूमिका थी.

इसी लेख के मुताबिक हक्सर ने ही इंदिरा गांधी को सुझाव दिया था कि बांग्लादेश के स्वतंत्रता सेनानियों की मदद के लिए उच्च स्तरीय कमेटी बनाई जाए और काव को उसका प्रमुख बनाया जाए. इसके बाद 2 मार्च 71 को गांधी ने ये कमेटी बनाकर काव को ज़िम्मेदारी सौंपी थी. काव ने मुक्तिवाहिनी के जवानों को पूरी मदद मुहैया करवाई थी और बांग्लादेश अलग देश बन सका था. इससे जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा बीबीसी की रिपोर्ट में दर्ज है.

जब मंच पर आने के बजाय चले गए काव
बांग्लादेश की 25वीं सालगिरह के मौके पर कई कार्यक्रम हो रहे थे. 1996 में ऐसे ही एक कार्यक्रम में काव दर्शकों में मौजूद थे तब एक बांग्लादेशी पत्रकार ने उनसे कहा था कि 'आपको तो मंच पर होना चाहिए क्योंकि आपके कारण ही तो ये देश बना'. तब काव ने कहा था, 'मैंने कुछ नहीं किया, जो मंच पर हैं उनकी तारीफ कीजिए'. ये कहने के बाद काव इसलिए उस कार्यक्रम से चुपचाप चले गए थे क्योंकि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि वहां उन्हें कोई पहचानेगा.

दुनिया की ज़बानी ऐसे थे काव
जब फ्रांस की खुफिया एजेंसी एसडीईसीई के प्रमुख काउंट एलेक्ज़ांड्रे से 70 के दशक में दुनिया के सबसे बेहतरीन पांच खुफिया प्रमुखों के नाम पूछे गए थे, तब काउंट ने एक नाम काव का भी लिया था. काउंट और अलग-अलग मौकों पर अन्य जानकारों ने काव के लिए ये शब्द कहे :

"शारीरिक और मानसिक शिष्टता का अदभुत सम्मिश्रण है ये इंसान! इसके बावजूद अपने या अपने दोस्तों के बारे में और अपनी उपलब्धियों के बारे में बात करने में इतना लिहाज़ बरतता है!" - काउंट एलेक्ज़ांड्रे

काव आधुनिक भारत के इतिहास के सबसे उल्लेखनीय गुप्तचर हैं. भारत की सबसे साहसी और खतरनाक एजेंसी रॉ में उनके योगदान के बिना दक्षिण एशिया के भौगोलिक, आर्थिक और राजनीतिक हालात कुछ और ही होते.
रोहन गुणरत्न, प्रमुख श्रीलंकाई पत्रकार


"दुनिया में उनके संपर्क अलग ही स्तर के थे - खासकर एशिया, अफगानिस्तान, चीन और ईरान में. सिर्फ एक फोन लगा कर काव काम करवा सकते थे. काव वो टीमलीडर थे जिन्होंने भारत में आम बात रही अंतरविभागीय स्पर्धा को खत्म कर दिया था." - केएन दारूवाला, जेआईसी चेयरमैन

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काव के प्रभाव के कारण ही रॉ के अफसरों को 'काव बॉयज़' के नाम से बुलाया जाने लगा था.


और वो 'काव बॉयज़' का किस्सा
रॉ प्रमुख रहते हुए काव ने न सिर्फ अपनी और एजेंसी की उपयोगिता सिद्ध की थी बल्कि दुनिया भर में अपनी बेहतरीन छवि बनाई थी. उनके प्रभाव के चलते ही रॉ के अफसरों को 'काव बॉयज़' के नाम से बुलाया जाने लगा था. कई रिपोर्ट्स कहती हैं कि काव को जब ये बात पता चली, तो उन्होंने काव बॉय की एक मूर्ति की प्रतिलिपि बनवाकर रॉ के रिसेप्शन पर लगवा दी थी. एक रिपोर्ट कहती है कि ये जो मूर्ति काव ने लगवाई थी, इसकी मूल कॉपी वो थी, जो उन्हें पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भेंट की थी.

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First published: August 20, 2019, 5:20 PM IST
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