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कांग्रेस में पहले भी होते रहे घमासान, इंदिरा से लेकर सोनिया ने यूं बगावत पर किया काबू

कांग्रेस में पहले भी होते रहे घमासान, इंदिरा से लेकर सोनिया ने यूं बगावत पर किया काबू

सोनिया गांधी का स्वागत करते कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सीताराम केसरी की फाइल फोटो

सोनिया गांधी का स्वागत करते कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सीताराम केसरी की फाइल फोटो

पिछले आम चुनाव (Lok Sabha Elections) में शिकस्त के बाद राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद से सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) अंतरिम अध्यक्ष हैं. अब 23 वरिष्ठ नेताओं की कथित चिट्ठी के बाद फिर कांग्रेस नेतृत्व पर संकट (Congress Crisis) के बादल हैं. हालांकि इस पत्र में नेहरू गांधी परिवार को 'कलेक्टिव लीडरशिप' का अभिन्न अंग बनाए रखने की बात ज़रूर कही गई है.

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    कुछ साल पहले तक देश की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस के भीतर नेतृत्व संकट (Congress Leadership Crisis) को लेकर घमासान मचा हुआ है. ताज़ा खबरों की मानें तो मौजूदा सांसदों, मुख्यमंत्रियों समेत पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं (Senior Congress Leaders) ने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी (Congress President Sonia Gandhi) को पत्र लिखकर नेतृत्व पर सवाल खड़े किए. जैसे ही सोनिया ने पद छोड़ने पर हामी भरी, तो कई कांग्रेसी नेता उनके समर्थन में आ खड़े हुए. इस पूरे मुद्दे पर सोमवार को कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की अहम बैठक हो रही है.

    इस घटनाक्रम से जुड़कर जानने की बात यह है कि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. 134 साल पुरानी पार्टी में ऐसा कई बार हुआ है, जब भीतरी असंतोष या बगावत तक की स्थिति बनी है, लेकिन उसे संभाल लिया गया. इस बार कहा जा रहा है कि ऐसे हालात तब बने हैं, जब इतिहास में कांग्रेस अपने सबसे खराब दौर से गुज़र रही है. नेहरू-गांधी परिवार का नेतृत्व संकट और सवालों के घेरे में हैं. ऐसे में न्यूज़18 आपको बताने जा रहा है कि कब कब पार्टी के भीतर नेतृत्व संकट खड़ा हुआ और कैसे पार्टी ने उसे संभाला.

    जनवरी 1966 : जब इंदिरा बनीं पीएम
    देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने थे, लेकिन करीब दो साल के भीतर ही ताशकंद में ऐतिहासिक समझौते के बाद उनकी भी मृत्यु हुई. तब पार्टी में शीर्ष नेतृत्व को लेकर सवाल खड़ा हुआ. प्रधानमंत्री पद के लिए शास्त्री के बरक्स उम्मीदवार रह चुके मोरारजी देसाई का नाम सबसे आगे था.

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    पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी.


    लेकिन, उस समय पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी का नाम आगे किया और नेहरू परिवार को तवज्जो दिए जाने की परंपरा शुरू हुई. इंदिरा को पीएम बनाए जाने के लिए समर्थन जुटाने में के कामराज की प्रमुख भूमिका रही और कांग्रेस के भीतर इंदिरा 180 वोटों से देसाई से जीत गईं. कुछ ही दिनों बाद इंदिरा ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण की.

    नवंबर 1969 : और मज़बूत हुई इंदिरा की पकड़
    1967 के आम चुनावों में कांग्रेस को करारे झटके लग चुके थे और फिर करीब आधे राज्यों के चुनावों में भी. ऐसे में पार्टी के भीतर करीब चार महीनों तक घमासान मचा रहा. तत्कालीन कांग्रेस पार्टी प्रमुख निजालिंगप्पा ने नवंबर 69 में इंदिरा गांधी को पार्टी से 'गूंगी गुड़िया' कहकर निर्वासित कर दिया. अब पार्टी के वरिष्ठ नेताओं यानी सिंडिकेट दो धड़े थे, जिसमें से एक इंदिरा के पक्ष में था.

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    इससे कुछ ही पहले वीवी गिरि को राष्ट्रपति बनाए जाने की एक छोटी सी दौड़ इंदिरा जीत चुकी थीं. जब उन्हें पार्टी से निर्वासित किया गया, तब कांग्रेस की संसदीय पार्टी बैठक में उन्हें काफी समर्थन मिला. नतीजा यह हुआ कि पार्टी दो टुकड़ों में बंट गई और लेफ्ट पार्टियों व डीएमके की मदद से इंदिरा ने अपनी सरकार किसी तरह बचाई. इंदिर की अगुआई वाली कांग्रेस आई ने 1971 का चुनाव जीतकर बड़ी कामयाबी हासिल की.

    मई 1987 : वीपी सिंह का विद्रोह
    कांग्रेस पार्टी के भीतर एक और बड़ा घमासान तब हुआ था, जब 'मिस्टर क्लीन' कहे जाने वाले वीपी सिंह ने बोफोर्स कांड में भ्रष्टाचार के आरोपों के चर्चा में आने के बाद मई 1987 में कांग्रेस सरकार में वित्त मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. पार्टी से बाहर किए जाने के बाद वीपी सिंह ने जनता दल बनाकर सीधे तौर पर राजीव गांधी सरकार को चुनौती पेश की.

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    कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी.


    दूसरी तरफ, शाह बानो केस के कारण इस्तीफा दे चुके कांग्रेस के पूर्व मंत्री आरिफ मोहम्मद खान समेत ओडिशा के बीजू पटनायक, कर्नाटक के रामकृष्ण हेगड़े जैसे राज्य के बड़े नेता भी सिंह की पार्टी से जुड़े. 1989 के चुनाव में राजीव गांधी की कांग्रेस को शिकस्त मिली और भाजपा के सहयोग से नेशनल फ्रंट की सरकार बनी तो वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण की.

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    मार्च 1998 : केसरी की विदाई, सोनिया गांधी की एंट्री
    राजीव गांधी की हत्या के बाद से ही सोनिया गांधी राजनीति में आने के दबाव को झेल सकी थीं, लेकिन 1998 के आम चुनाव से कुछ ही पहले 1997 के आखिर में उन्होंने घोषणा की कि वो कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी. तब कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने सोनिया को कांग्रेस के लिए 'तारणहार' बताते हुए पार्टी में उनका स्वागत तो किया लेकिन जब सोनिया को कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की मांग उठी, तब केसरी ने हिचकिचाहट ज़ाहिर की.

    14 मार्च 1998 को कांग्रेस पार्टी की वर्किंग कमेटी ने एक रिज़ॉल्यूशन पास करके केसरी को पार्टी अध्यक्ष के पद से विदाई दी. कहा जाता है कि इस दिन सोनिया को कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने में कोई रुकावट खड़ी न हो, इसलिए केसरी को कांग्रेस मुख्यालय, 24 अकबर रोड, में बंद कर दिया गया था. बहरहाल, प्रणब मुखर्जी ने पार्टी का फैसला पढ़ा. सेवाओं के लिए केसरी को धन्यवाद दिया और सोनिया को पार्टी अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया.

    (इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)undefined

    Tags: All India Congress Committee, Congress, Gandhi Family, Indira Gandhi, Politics, Rahul gandhi, Sonia Gandhi

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