जानें उस स्पेशल 'कड़कनाथ' के बारे में, जिसे धोनी रांची के बाजार में बेच रहे हैं

कड़कनाथ मुर्गा मूलतौर पर मध्य प्रदेश के झाबुआ में मिलता है.

कड़कनाथ मुर्गा मूलतौर पर मध्य प्रदेश के झाबुआ में मिलता है.

भारतीय क्रिकेट के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने अपने रांची के करीब इजा फार्म में कड़कनाथ मुर्गा पालन शुरू किया है, जिसे अब वो रांची के बाजार में बेच रहे हैं. ये बहुत महंगा और खासा प्रोटीन युक्त चिकन होता है, चिकन की ऐसी प्रजाति दुनिया में कहीं नहीं मिलती, क्या हैं कड़कनाथ मुर्गे की खासियतें

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 31, 2021, 11:05 AM IST
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भारतीय क्रिकेट के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने अपने रांची के करीब इजा फार्म हाउस के जरिए कड़कनाक मुर्गे को बड़े पैमाने पर पालने और बेचने की योजना तैयार की है. वो अब रांची के बाजार में इस स्पेशल ब्रीड वाले मुर्गे को बेचने जा रहे हैं.  कड़कनाथ चिकन के बारे में पिछले कुछ समय से लगातार खबरें आती रही हैं.

ये दूसरे चिकन से अलग और खास होता है. इसमें प्रोटीन बहुत ज्यादा होता है. इसके बोन और मांस का कलर भी अलग होता है. माना जाता है कि सेहत के लिए ये बहुत फायदेमंद होता है. हालांकि ये बाजार में आम चिकन की तुलना में महंगा बिकता है. इसके दाम 900 से 1000 रुपए किलो तक होते हैं. इसे जीआई टैग भी मिला हुआ है.

कड़कनाथ का जीआई टैग मप्र के पास 

वैसे कड़कनाथ का जीआई टैग मध्यप्रदेश सरकार के पास है. राज्य सरकार ने करीब 03 साल पहले इसका जीआई टैग हासिल किया था. तब उसने ये घोषणा की थी कि प्रोटीन और स्वाद से सराबोर कड़कनाथ मुर्गे को आप घर बैठे ऑर्डर कर सकते हैं.  यह काम आप एक एप के ज़रिए कर सकते हैं जिसे राज्य के सहकारी विभाग ने तैयार किया है.
लगातार बढ़ रहे हैं इसके दीवाने

देश में कड़कनाथ चिकन के दीवाने लगातार बढ़ रहे हैं. झारखंड में भी इसकी खासी मांग है, इसी को देखते हुए पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान धोनी ने इसको अपने फार्म हाउस में पालने की योजना पर काम शुरू किया. इसने कड़कनाथ को और सुर्खियों में ला दिया.  जिन्हें नहीं पता कि यह कड़कनाथ किस बला का नाम है, तो उनके लिए हम इस मुर्गे से जुड़ी कुछ जानकारियां लेकर आए हैं.

काले रंग की दुर्लभ मुर्गे की प्रजाति



यह एक दुर्लभ मुर्गे की प्रजाति है. यह काले रंग का मुर्गा होता है जो दूसरी मुर्गा प्रजातियों से ज्यादा स्वादिष्ट, पौष्टिक, सेहतमंद और कई औषधीय गुणों से भरपूर होता है. जहां कड़कनाथ में 25 प्रतिशत प्रोटीन है, वहीं बाकी मुर्गों में 18-20 फीसदी प्रोटीन ही पाया जाता है.

Kadaknath, Madhya Pradesh
कड़कनाथ बाकी मुर्गों की तुलना में ज्यादा पौष्टिक बताया जाता है (तस्वीर : Kadaknath App)


कालीमासी भी कहा जाता है

कड़कनाथ को कालीमासी भी कहा जाता है क्योंकि वह काले रंग का होता है. इसकी विशिष्ट प्रजाति होने की वजह से ही यह ब्रोइलर चिकन से तीन से पांच गुना ज्यादा दाम पर बेचा जाता है. इसे खरीदने वाले बताते हैं कि इसका दाम 500 रुपये किलो से शुरू होता है.

आमतौर पर कड़कनाथ मुर्गे तीन प्रजातियों में मिलते हैं-जेट ब्लैक, गोल्डन ब्लैक और पेसिल्ड ब्लैक. मुर्गे का वजन 1.8 किलो से 2.0 किलो होता है तो मुर्गी का 1.2 किलो से 1.5 किलो. कड़कनाक को मध्य प्रदेश और बस्तर के आदिवासी लोग पालते थे. इसे पवित्र माना जाता था. दीवाली के बाद देवी के सामने इसकी बलि देकर इसे खाने का रिवाज रहा है.

पिछले कुछ सालों में जब अचानक कड़कनाथ प्रजाति के मुर्गे कम होने लगे तो सरकार का ध्यान इस ओर गया और उसके लिए कई पॉल्ट्री फॉर्म खोलकर उसकी ब्रीडिंग शुरू की गई, इससे इसकी तादाद में पर्याप्त इजाफा हुआ.

मप्र के झाबुआ जिले में पाया जाता है

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच कड़कनाथ पर अधिकार को लेकर लड़ाई चल रही थी. लेकिन मध्यप्रदेश ने इस मुर्गे की भौगोलिक पहचान से जुड़ा टैग हासिल कर लिया है. यह राज्य के पश्चिमी हिस्से के झाबुआ जिले में पाया जाने वाला मुर्गा है. वहीं पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ भी काफी वक्त से इस पर दावा करता आ रहा है.

राज्य सरकार द्वारा संचालित मुर्गी पालन के अहाते में कड़कनाथ के ढाई लाख चिकन पैदा किए जाते हैं. मध्यप्रदेश ने चिकन की इस प्रजाति के लिए पहला मुर्गा पालन केंद्र 1978 में स्थापित किया था.

दुनिया में चिकन भारतीय उपमहाद्वीप से ही फैला

माना जाता है कि हजारों साल पहले भारतीय उपमहाद्वीप में ही लाल जंगली मुर्गियों और मटमैले रंग के जंगली मुर्गों की नस्ल देखी गई, जो यहां से पूरी दुनिया में फैल गईं. दुनिया में अब हजारों किस्म के चिकन हैं. चिकन और अंडा उत्पादन में भारत का स्थान दुनिया में चौथा है. जहां तक चिकन खाने की बात है, इसका उल्लेख 600 ईसापूर्व सबसे पहले बेबीलोन में मिला.

मध्य काल में चिकन एक खाद्य के रूप में बहुत लोकप्रिय था. पिछले कुछ दशकों में यूरोप में ये सबसे ज्यादा खाया जाने लगा है. एक जमाना था जबकि अमेरिका में ये इतना महंगा बिकता था कि केवल रईस लोगों की रसोई तक ही पहुंच पाता था.

बहरैन में एक शख्स पर 40 मुर्गों का अनुपात 

अगर एक व्यक्ति पर मुर्गों का अनुपात देखा जाए तो इस मामले में बहरैन सबसे ऊपर है. वहां एक शख्स करीब 40 मुर्गे रखता है. वैसे मध्य पूर्व के खाड़ी देशों में मुर्गा और व्यक्ति का अनुपात दुनिया में सबसे ज्यादा है.

भारत में कितनी प्रजाति के मुर्गे

मूल रूप से भारत में चार तरह की शुद्ध नस्लें पाई जाती हैं, लेकिन फिर उनसे सैकड़ों किस्म की प्रजातियां विकसित हो चुकी हैं. ये चार शुद्ध नस्लें असील, चिटगांग, कड़कनाथ और बुसरा हैं.
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