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    कश्मीर का वो गांव, जो भारत में पेंसिल उत्पादन के लिए 90% स्पेशल लकड़ी देता है

    कश्मीर में पेंसिल की लकड़ी फैक्ट्री में काम करते कामगारों की तस्वीर ट्विटर से साभार.
    कश्मीर में पेंसिल की लकड़ी फैक्ट्री में काम करते कामगारों की तस्वीर ट्विटर से साभार.

    जम्मू और कश्मीर (Jammu & Kashmir) में पुलवामा ज़िले (Pulwama) का नाम अभी तक आपने शायद हिंसा या आतंकवाद (Terrorism) से जुड़ी खबरों में ही सुना है, लेकिन यह ज़िला 'मेक इन कश्मीर' का एक बेमिसाल उदाहरण (Make in Kashmir) बनने के कारण भी चर्चा में है.

    • News18India
    • Last Updated: October 1, 2020, 10:34 AM IST
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    अब तक सिर्फ आतंकियों के अड्डे (Terror Hotbed) के तौर पर सुर्खियों में आने वाले पुलवामा ज़िले के गांव न केवल रोज़गार (Employment) देने के गढ़ बन गए है बल्कि इनके तार देश भर से जुड़ गए हैं. इस बार ये तार किसी निगेटिव अर्थ में नहीं ​बल्कि व्यापार (Trade with Kashmir) के मायने में हैं. देश भर के छोटे छोटे बच्चे जब लिखना पढ़ना सीखने की उम्र में पेंसिल पकड़ते हैं, वहीं से इनका एक अनजाना रिश्ता कश्मीर के साथ बनता है. पुलवामा कैसे देश का 'पेंसिल डिस्ट्रिक्ट' (Pencil District of India) बन रहा है, ये कहानी बहुत कुछ बयान कर रही है.

    एक गांव है ऊखू, क्या आपने सुना नाम?
    दक्षिण कश्मीर में बसा यह गांव ऊखू, देश भर में होने वाले पेंसिल उत्पादन के लिए 90 फीसदी लकड़ी मुहैया करवा रहा है. पेंसिल और स्लेट के उत्पादन के लिए अहम गढ़ बन चुके इस गांव की वजह से ही पुलवामा देश के नक्शे पर पहली बार सकारात्मक रूप से उभर कर सामने आ रहा है. यहां एक फैक्ट्री के मालिक मंज़ूर अहमद के हवाले से खबरें कह रही हैं कि जो कंपनियां पहले जर्मनी और चीन से लकड़ी आयात करती थीं, अब ऊखू से कर रही हैं. इससे यहां रोज़गार के मौके बढ़ रहे हैं.

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    इस गांव और पुलवामा में हर घर में स्लेट बनाए ​जाने का सपना कई लोग देख रहे हैं. सरकार स्तर पर प्रयास हो रहे हैं कि पुलवामा को यह नई पहचान दिलाई जा सके और कश्मीर में पूरी पेंसिल का उत्पादन किए जाने की मांग बढ़ रही है. ये सब होने के बीच इस कहानी के कुछ ज़रूरी और दिलचस्प पहलू आपको जानने चाहिए कि ये कैसे संभव हो रहा है और वो लकड़ी कैसी और कितनी है, जो पेंसिलों के लिए ये गांव मुहैया करा रहा है.



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    पेंसिल के उपयुक्त लकड़ी देने वाला खास पेड़ पुलवामा में पाया जाता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


    पेंसिल बनाने की खास लकड़ी
    जिस लकड़ी से अच्छी क्वालिटी की पेंसिल बनाई जा सकती है, वह जिस पेड़ से मिलती है, कश्मीर के पुलवामा ज़िले में वो पॉप्लर पेड़ बहुतायत और खास किस्म में होता है. पुलवामा के नम इलाकों में पाया जाने वाला यह पेड़ चिनार की ही एक किस्म है. यहां दर्जनों छोटी छोटी इकाइयां इस लकड़ी को पेंसिल इंडस्ट्री को मुहैया कराने के कारोबार में लगी हुई हैं.

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    इस पेड़ के बारे में, यहां की एक यूनिट के मालिक अब्दुल रहीम के हवाले से एचटी की रिपोर्ट कहती है कि पेंसिल बनाने के लिए लकड़ी में मॉइश्चर जितना ज़रूरी, उतने ही परफेक्ट अनुपात के हिसाब से यहां के पेड़ लकड़ी मुहैया कराते हैं. इस लकड़ी से होने वाले उत्पादन की इबारत इस कश्मीरी ज़िले में कैसे लिखी जा रही है, देखिए.

    कश्मीर में 60% उत्पादन
    कश्मीर के सबसे बड़े औद्योगिक सेटअप का विकास लासिपोरा में 300 हेक्टेयर में 1984 में हुआ था, आधिकारिक तौर पर बताया गया है कि यहां 60% पेंसिल उत्पादन होता है. यहां करीब 250 इकाइयां सेब के बागान से घिरे इस इलाके में पेंसिल उत्पादन उद्योग में काम कर रही हैं.

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    नटराज के पीछे ये हैं चैंपियन!
    जी हां, इन्हीं इकाइयों से जो रॉ मटेरियल सप्लाई किया जा रहा है, वो देश की बड़ी पेंसिल निर्माता कंपनियों के पास पहुंच रहा है. एचटी की ही रिपोर्ट के मुताबिक नटराज और अप्सरा पेंसिल जैसे ब्रांड बनाने वाली हिंदुस्तान पेंसिल्स को यहीं से कच्चा माल मिल रहा है. यह कंपनी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी पेंसिल निर्माता है.

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    नटराज और अप्सरा पेंसिल ब्रांड की कंपनी भी कश्मीर के गांव से रॉ मटेरियल लेती है.


    महिलाओं के हाथ में है कमान
    कश्मीर के इस अनूठे उद्योग में ज़्यादातर महिलाएं ही इस काम को अंजाम दे रही हैं. पेंसिल और स्लेट से जुड़े इस उद्योग से करीब 2000 ​लोगों को ज़िले में काम मिला है. ऊखू में घरों में ही छोटी छाटी यूनिटों में महिलाएं कुशलता से कारीगरी कर रही हैं. पहले सिर्फ लकड़ी पेंसिल निर्माताओं को दी जाती थी, लेकिन उस लकड़ी को सीधे पेंसिल में इस्तेमाल करने लायक बनाकर यानी स्लैट या उसे एक पतली पट्टी के तौर पर तैयार करके दिया जा रहा है.

    अब पुलवामा और लासिपोरा के छोटे बड़े तमाम कारीगर और उद्योगों से जुड़े लोग सरकार से यहां विकास की उम्मीद लगाए बैठे हैं. पूरे भारत के साथ औद्योगिक रिश्ते बनाने के लिए यहां सबसे पहले एक हाईवे की ज़रूरत है ताकि उनके माल का आना जाना बाधित न हो. यह हाईवे लंबे समय से अधूरा पड़ा है.

    यहां बिजली की लगातार ज़रूरत बनी हुई है और टैक्स आदि को लेकर सरकारी छूट का मुंह भी ताका जा रहा है, ताकि पिछड़ा उद्योग जगत मुख्यधारा में आ सके. कोल्ड स्टोर, टीएमटी, फोम, लेदर, फेब्रिकेशन, दूध उत्पादन जैसे कई सारे उद्योग, जो हज़ारों रोज़गार यहां पैदा कर रहे हैं, इन सबको 2006 में तब विकास की गति मिली थी, जब तत्कालीन सरकारों ने यहां औद्योगिक हब के तौर पर विकास किया था.
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