भारत के इस क्रांतिकारी ने बनाई थी नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की INA से कई गुना बड़ी फौज

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: September 2, 2019, 7:40 PM IST
भारत के इस क्रांतिकारी ने बनाई थी नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की INA से कई गुना बड़ी फौज
स्वाधीनता संग्राम सेनानी अल्लामा मशरिकी.

बीते 25 अगस्त को अल्लामा मशरिकी (Allama Mashriqi) की जयंती थी और 27 अगस्त को पुण्यतिथि. जानिए नेताजी सुभाषचंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) के समकक्ष इस क्रांतिकारी ने क्या कारनामे किए थे और क्यों उन्हें भुला दिया गया.

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'विभाजन (India Partition) को लेकर जो स्थितियां बन रही हैं, अब आखिरी उपाय यही है कि हम सब एक होकर खड़े हों. हिंदू मुसलमान (Hindu Muslims) सब इकट्ठे होकर एक क्रांति करें भले ही वो अंग्रेज़ों (British Raj) की गोलियों के शिकार हों. बेशक इसमें लाखों लोग मारे जाएंगे लेकिन करोड़ों लोग हमेशा के लिए बच जाएंगे. अगर कुछ लोगों ने सत्ता की हवस के चलते दुनिया को सिर्फ अत्याचार और लूट की बर्बरता दिखाने की ठानी है, तो लाखों लोगों को बलिदान (Martyrdom) देकर दुनिया को सच्चाई, सम्मान और न्याय की लड़ाई दिखाना होगी.'

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पटना (Patna) में 5 मई 1947 को अल्लामा मशरिकी ने 50 हज़ार से ज़्यादा लोगों के सामने ये भाषण दिया था, जिसमें ​देश के विभाजन की अंग्रेज़ी नीति (Divide & Rule Policy) का बेलाग विरोध था. इससे पहले मार्च में मशरिकी ने 3 लाख खाकसार सैनिकों को दिल्ली में 30 जून 47 को जुटकर अंग्रेज़ी हुकूमत (British Government) उखाड़ फेंकने का आह्वान किया था. कौन थे ये स्वतंत्रता संग्राम सेनानी (Freedom Fighter) अल्लामा मशरिकी और आप इनके बारे में क्या जानते हैं? ये भी जानें कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस (Netaji S.C. Bose) से सालों पहले कैसे मशरिकी ने पहली बार अपनी सेना के बूते पहली निर्वासित सरकार (Provisional Government) बनाई थी.

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खाकसार तहरीक के जवानों की एक पूरी यूनिफॉर्म और नियमावली थी. तस्वीर विकिपीडिया से साभार.


इस तरह मिसाल बन गया था खाकसार आंदोलन
स्कॉलर, दार्शनिक, लेखक और राजनीतिज्ञ इनायतुल्लाह खान उर्फ अल्लामा मशरिकी ने 1930 के दौरान खाकसार तहरीक यानी आंदोलन की नींव रखी थी, जिसमें हर धर्म, संप्रदाय और वर्ग के लोग शामिल हुए थे. कुछ ही सालों में ये आंदोलन देश के भीतर देश की अपनी एक आर्मी के तौर पर उठ चुका था, जिसने अंग्रेज़ों की नाक में दम कर दिया था. पाकिस्तान क्राइस्ट पोस्ट के लेख में दिए गए एक आंकड़े के मुताबिक 1940 में इस तहरीक में 40 लाख खाकसार शामिल थे और 1946 के आखिर तक 50 लाख.
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भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में यह सबसे बड़ी देशी आर्मी थी. मशरिकी के आह्वान पर लाखों लोग भारत की आज़ादी के लिए सैनिक बन चुके थे. खाकसारों का एक वर्ग श्रीनगर से मैसूर और कलकत्ता से कराची तक यात्रा करते हुए मशरिकी के संदेश फैलाता था और फंड जमा करता था, तो दूसरी तरफ, जांबाज़ खाकसारों ने बलिदान से न हिचकने की कसम उठा रखी थी. अपनी खाकी वर्दी में परेडों और हथियार चलाने की कला के कैंप और प्रदर्शन हुआ करते थे.

ऐसे बनी थी पहली निर्वासित या पैरेलल सरकार
मशरिकी कई बार अंग्रेज़ों के निशाने पर आ चुके थे और कानून को ताक पर रखकर उनके खिलाफ एक्शन लिये जा चुके थे. इसके बाद भी आंदोलन रुकने का नाम नहीं ले रहा था और 1939 में खाकसार तहरीक के जांबाज़ों ने उत्तर प्रदेश में ब्रितानी हुकूमत को उखाड़ फेंका और देश की पहली समानांतर सरकार की घोषणा की. इतना ही नहीं, खाकसार तहरीक ने अपनी मुद्रा जारी करने तक का साहस किया. इस कदम ने अंग्रेज़ी हुकूमत की चूलें हिला दीं और फिर दमन का सिलसिला शुरू हुआ.

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1939 में खाकसार तहरीक के जांबाज़ों ने उत्तर प्रदेश में ब्रितानी हुकूमत को उखाड़ फेंका था. खाकसारों के जुलूस की तस्वीर ट्विटर से साभार.


लाहौर में 19 मार्च 1940 को खाकसार जांबाज़ों का बर्बर नरसंहार किया गया. इसके साथ ही भीषण हत्याएं, कारावास और प्रतिबंध जैसे कई कदम उठाकर अंग्रेज़ों ने इस आंदोलन को कुचलने की कोशिश की लेकिन मशरिकी के नेतृत्व में ये आंदोलन और बढ़ता चला गया. नतीजतन, एक तरफ दमन कर रहे अंग्रेज़ों को दूसरी तरफ भारत को आज़ादी देने की प्रक्रियाएं शुरू करना पड़ीं.

सुभाषचंद्र बोस और मशरिकी की तुलना
भारत की आज़ादी के इतिहास में नेताजी बोस और मशरिकी एक ही समय में दो ऐसे नेता हुए, जिनमें काफी कुछ समानताएं थीं. दोनों ने देश को आज़ाद करने के लिए बेहद आक्रामक तरीका चुनकर फौजें तैयार कीं और सीधी लड़ाई शुरू की. दोनों ने महात्मा गांधी के तरीकों पर अविश्वास जताते हुए आक्रामकता को तरजीह दी. मद्रास पोस्ट के एक लेख में दोनों नेताओं की तुलना करते हुए कहा गया है कि इसी वजह से एक से ज़्यादा बार गांधी ने इन नेताओं की गिरफ्तारी को एक तरह से जायज़ भी ठहराया.

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दोनों नेताओं के बीच कुछ अंतर थे जैसे बोस ने देश के बाहर जाकर सैन्य गतिविधियों और ब्रितानी हुकूमत को उखाड़ने का काम किया. इसमें उन्होंने दूसरे देशों की सैन्य व कूटनीतिक मदद ली. वहीं, मशरिकी ने देश के अंदर मज़दूर, किसान और तमाम वर्गों के लोगों को सिपाही बनाकर एक स्वदेशी आर्मी तैयार की और देश के अंदर ही अंग्रेज़ी सरकार से खुले तौर पर लोहा लिया. ये भी कहा गया है कि 1945 में प्लेन क्रैश हादसे के बाद बोस की आर्मी आईएनए की भूमिका स्वतंत्रता संग्राम में लगभग खत्म हो गई थी, लेकिन खाकसार आंदोलन उसके बाद भी 1947 तक चलता रहा.

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नेताजी बोस की आज़ाद हिंद फौज में 1945 तक 35 हज़ार फौजियों के होने का दावा किया जाता है.


बोस और मशरिकी की ताकत
बोस ने 21 अक्टूबर 1943 को मुक्त भारत की घोषणा कर अपनी अस्थायी या निर्वासित सरकार की घोषणा की थी और भारत की आज़ादी की भी. लेकिन, इस तरह का कारनामा मशरिकी 1939 में कर चुके थे. सीआईए की रिपोर्ट के हवाले से मद्रास पोस्ट ने लिखा है कि बोस ने जो फौज तैयार की थी, 1945 तक उसमें 35 हज़ार के करीब फौजी रह गए थे. वहीं, अल इस्लाह अखबार के आंकड़े के मुताबिक मशरिकी के खाकसार तहरीक में 1946 में 50 लाख लोग बतौर सिपाही शामिल थे.

तो क्या इतिहास ने अन्याय किया?
मशरिकी का नाम इतिहास से तकरीबन गायब है जबकि बोस आज़ादी के महान नायकों में शुमार हैं. तो क्या ये इतिहासकारों का अन्याय है? मद्रास पोस्ट के लेख में मशरिकी से जुड़े उस समय ज़ब्त किए गए तमाम दस्तावेज़ों को जारी करने की मांग उठाते हुए कहा गया है कि बेशक नेताजी बोस का योगदान भुलाया नहीं जा सकता लेकिन मशरिकी के योगदान को भुला दिया जाना ठीक नहीं है.

आखिर क्यों नदारद है मशरिकी का ज़िक्र?
ब्रितानी हुकूमत ने खाकसार आंदोलन को कुचलने के दौर में इस संगठन या आंदोलन को लेकर कई तरह का प्रचार किया था और मशरिकी को 'काफिर' तक कहा गया था. यही नहीं, उन्हें क्रूर और फासिस्ट तानाशाह तक कहा गया. वहीं, महात्मा गांधी ने इस हिंसावादी विचार का भी समर्थन नहीं किया. एक वर्ग का मानना रहा है कि आज़ादी की लड़ाई में मशरिकी और खाकसार तहरीक के योगदान को पूरा स्थान नहीं दिया.

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क्रांतिकारी अल्लामा मशरिकी ने अंग्रेज़ी हुकूमत से 'सर' की उपाधि लेने से मना किया था. तस्वीर पाकिस्तान क्रिश्चियन पोस्ट से साभार.


मशरिकी के बारे में ये भी जानें
यूके में जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद गणितज्ञ और चिंतक के रूप में मशरिकी मशहूर हुए थे. उन्होंने गणित में डीफिल के साथ कई फेलोशिप हासिल की थीं और 1912 में भारत लौटे. यहां उन्होंने अलवर के दरबारी की पदवी ठुकराकर पहले शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी नौ​करियां कीं. उनका रुतबा ये था कि 1920 में ​अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें राजदूत बनने और 1921 में 'सर' की उपाधि देने का प्रस्ताव रखा था लेकिन उन्होंने दोनों ही सम्मान ठुकरा दिए थे.

1924 में उनकी एक किताब तज़किरा को नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया था लेकिन उन्होंने इस किताब के यूरोपीय अनुवाद में भी दिलचस्पी नहीं ली और आखिरकार 1930 में देश की आज़ादी के अभियान में पूरी तरह कूद पड़ने से पहले वो अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन के माध्यम से अपने संदेश फैलाते रहे. फिर सरकारी नौकरी छोड़कर पूरी तरह खाकसार आंदोलन के प्रणेता बने रहे.

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First published: September 2, 2019, 5:58 PM IST
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