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क्या है खालिस्तान, जिसके आतंक से थर्रा उठा था पंजाब

80 के दशक में खालिस्तान आंदोलन पूरे उभार पर था. उसे विदेशों में रहने वाले सिखों के जरिए वित्तीय और नैतिक समर्थन मिल रहा था. इसी दौरान पंजाब में जनरैल सिंह भिंडरावाले खालिस्तान के सबसे मजबूत नेता के रूप में उभरा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 30, 2018, 3:18 PM IST
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पंजाब के मंत्री और पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू पाकिस्तान में जिस करतारपुर गलियारे के शिलान्यास समारोह में गए थे. वहां उनके साथ एक खालिस्तान अलगाववादी नेता द्वारा खिंचाई गईं तस्वीरें सामने आने के बाद नया विवाद छिड़ गया है. इस अलगाववादी नेता को पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के साथ हाथ मिलाते देखा गया. इस कार्यक्रम में कई और खालिस्तान समर्थक नेता मौजूद थे.

खालिस्तान समर्थक नेता अब भी विदेश में सक्रिय हैं और अपने प्रचार के लिए इस तरह मंचों का इस्तेमाल करते हैं. फिलहाल चर्चाओं में आने वाले इस खालिस्तानी नेता का नाम गोपाल सिंह है, वो पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (पीएसजीपीसी) से जुड़ा हुआ है. उसे पाकिस्तान में सिख समुदाय से संबंधित सभी कार्यक्रमों में बुलाया जाता है.

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कब शुरू हुआ था खालिस्तान आंदोलन
जब 1947 में अंग्रेज भारत को दो देशों में बांटने की योजना बना रहे थे. तभी कुछ सिख नेताओं ने अपने लिए अलग देश खालिस्तान की मांग की. उन्हें लगा कि अपने अलग मुल्क की मांग करने के लिए ये सबसे उपयुक्त समय है. आजादी के बाद इसे लेकर हिंसक आंदोलन चला. जिसमें कई लोगों की जान भी गई.



पंजाबी सूबा आंदोलन और अकाली दल का जन्म
1950 में अकाली दल ने पंजाबी सूबा आंदोलन के नाम से आंदोलन चलाया. भारत सरकार ने साफतौर पर पंजाब को अलग करने से मना कर दिया.
ये पहला मौका था जब पंजाब को भाषा के आधार पर अलग दिखाने की कोशिश हुई. अकाली दल का जन्म हुआ. कुछ ही वक्त में इस पार्टी ने बेशुमार लोकप्रियता हासिल कर ली. अलग पंजाब के लिए जबरदस्त प्रदर्शन शुरू हुए.

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सरकार ने अलग राज्य की बात मानी
1966 में भारत सरकार ने पंजाब को अलग राज्य बनाने की मांग मान ली लेकिन भाषा के आधार पर हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और केंद्र शाषित प्रदेश चंडीगढ़ की स्थापना हुई.अकाली चाहते थे कि पंजाब की नदियों का पानी किसी भी हाल में हरियाणा और हिमाचल को नहीं दिया जाए. सरकार ने इसे मानने से साफ इनकार कर दिया.

खालिस्तान आंदोलन की शुरुआत 50 के दशक में हुई थी


कब इसे खालिस्तान नाम दिया गया
अलग सिख देश की आवाज लगातार उठती रही. आंदोलन भी होता रहा. 1970 के दशक में खालिस्तान को लेकर कई चीजें हुईं. 1971 में गजीत सिंह चौहान ने अमेरिका जाकर वहां के अखबार में खालिस्तान राष्ट्र के तौर पर एक पेज का विज्ञापन प्रकाशित कराया और इस आंदोलन को मजबूत करने के लिए चंदा मांगा. बाद में 1980 में उसने खालिस्तान राष्ट्रीय परिषद बनाई और उसका मुखिया बन गया. लंदन में उसने खालिस्तान का देश का डाकटिकट भी जारी किया.

इससे पहले 1978 में जगजीत सिंह चौहान ने अकालियों के साथ मिलकर आनंदपुर साहिब के नाम संकल्प पत्र जारी किया, जो अलग खालिस्तान देश को लेकर था.



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जनरैल सिंह भिंडरावाले का उदय
80 के दशक में खालिस्तान आंदोलन पूरे उभार पर था. उसे विदेशों में रहने वाले सिखों के जरिए वित्तीय और नैतिक समर्थन मिल रहा था. इसी दौरान पंजाब में जनरैल सिंह भिंडरावाले खालिस्तान के सबसे मजबूत नेता के रूप में उभरा. उसने स्वर्ण मंदिर के हरमंदिर साहिब को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया. उसने अपने साथियों के जरिए पूरे पंजाब में इस आंदोलन को खासा उग्र कर दिया. तब ये स्वायत्त खालिस्तान आंदोलन अकालियों के हाथ से निकल गया.

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आतंक का दौर
जरनैल सिंह भिंडरावाला के बारे में कहा जाता है कि वो सिख धर्म में कट्टरता का समर्थक था. सिखों के शराब पीने, बाल कटाने जैसी चीजों के वो सख्त खिलाफ था. जब भिंडरावाले ने पूरे पंजाब में अपनी पकड़ बनानी शुरू की तो अराजकता का दौर भी शुरू हो गया.

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साल 1980 से 1984 के बीच पंजाब में आतंकी हिंसाओं में जबरदस्त इजाफा हुआ. 1983 में डीआईजी अटवाल की स्वर्णमंदिर परिसर में ही हत्या कर दी गई. इसी साल से भिंडरावाला ने स्वर्ण मंदिर को अपना ठिकाना बना लिया. सैकड़ों हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों से वो हमेशा घिरा रहता था, साथ ही हथियारों का जखीरा भी वहां जुटाया जाने लगा. कह सकते हैं कि मंदिर को किले में तब्दील करने की तैयारी शुरू हो गई थी.



आपरेशन ब्लू स्टार
पहले 'ऑपरेशन सनडाउन' बनाया गया, 200 कमांडोज को इसके लिए ट्रेनिंग दी गई. लेकिन बाद में आम नागरिकों को ज्यादा नुकसान की आशंका के चलते इस ऑपरेशन को नकार दिया गया. आखिरकार एक जून 1984 में भारत सरकार ने आपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम देकर सैन्य कार्रवाई की और इस आंदोलन को कुचल दिया.

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स्वर्ण मंदिर में पानी और बिजली की सप्लाई काट दी गई. स्वर्ण मंदिर के अंदर 6 जून 1984 को व्यापक अभियान चलाया गया, भारी गोलीबारी के बाद जरनैल सिंह भिंडरवाला का शव बरामद कर लिया गया. सात जून 1984 को स्वर्ण मंदिर पर आर्मी का कंट्रोल हो गया. हालांकि इससे सिख समुदाय में इंदिरा सरकार के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा भी बरपा. महज 4 महीने बाद ही 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही 2 सिख सुरक्षाकर्मियों ने कर दी.

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84 के बाद खालिस्तान आंदोलन
खालिस्तान आंदोलन यहीं खत्म नहीं हुआ, इसके बाद से कई छोटे-बड़े संगठन बने. 23 जून 1985 को एक सिख राष्ट्रवादी ने एयर इंडिया के विमान में विस्फोट किया, 329 लोगों की मौत हुई थी. दोषी ने इसे भिंडरवाला की मौत का बदला बताया.

10 अगस्त 1986 को पूर्व आर्मी चीफ जनरल एएस वैद्य की दो बाइक सवार बदमाशों ने हत्या कर दी. वैद्य ने ऑपरेशन ब्लूस्टार को लीड किया था. इस वारदात की जिम्मेदारी खालिस्तान कमांडो फोर्स नाम के एक संगठन ने ली.

31 अगस्‍त 1995 को पंजाब सिविल सचिवालय के पास हुए बम विस्फोट में पंजाब के तत्कालीन सीएम बेअंत सिंह की हत्‍या कर दी गई थी. ब्लास्ट में 15 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी.

इन सब घटनाओं को खालिस्तान आंदोलन से जोड़कर देखा जाता है. कई दूसरे देशों में बैठकर भी खालिस्तान समर्थक भारत में कट्टरवादी विचारधारा को हवा देते रहते हैं.

अब खालिस्तान आंदोलन का हाल
अब खालिस्तान आंदोलन को खत्म हुए दो दशक से ज्यादा हो चले हैं लेकिन पाकिस्तान ना केवल सिखों को इसके लिए उकसाने की कोशिश करता रहता है बल्कि कनाडा और यूरोप में बसे सिखों के कई संगठन अब भी इसे गाहे बगाहे हवा देने की कोशिश करते रहते हैं. करतारपुर साहिब में भी जिस तरह से खालिस्तान के पक्ष में पोस्टर लगाए गए और पाकिस्तान ने अलगाववादी सिख नेताओं को इसमें बुलाया, उससे जाहिर है कि पाकिस्तान की मंशा अब भी अच्छी नहीं है.

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