ब्रिटिश राज में फांसी पर चढ़ाए गए पहले क्रांतिकारी की कहानी

महज़ 18 साल की उम्र में इस स्वाधीनता संग्राम सेनानी (Indian Freedom Fighter) ने देश के लिए आज ही के दिन बलिदान दिया था. स्वतंत्रता दिवस की सालगिरह से चंद दिन पहले जानें शौर्य और बलिदान के प्रतीक देश के नायक (Unsung Hero) की कहानी.

News18Hindi
Updated: August 11, 2019, 1:05 PM IST
ब्रिटिश राज में फांसी पर चढ़ाए गए पहले क्रांतिकारी की कहानी
खुदीराम बोस.
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Updated: August 11, 2019, 1:05 PM IST
भारत की आज़ादी की लड़ाई (India Freedom Struggle) कई लोगों ने मिलकर लड़ी. लेकिन हम कुछ प्रमुख नेताओं और क्रांतिकारियों के बारे में ही जानते हैं. उनके अलावा भी बहुत से ऐसे सेनानी (Freedom Fighters) थे, जिन्होंने देश की आजादी के सपने को सच बनाने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा दी थी. उनमें से कई देश की आज़ादी का सुनहरा पल देखने के लिए ज़िंदा भी नहीं रहे. आज़ादी की सालगिरह (Independence Day) कुछ ही दिन दूर है और 111 साल पहले आज का ही दिन था, जब एक नौजवान क्रांतिकारी ने देश के लिए बलिदान दिया था. जानें उस ​क्रांतिकारी और उसकी कहानी.

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खुदीराम बोस (Khudiram Bose) की कहानी ऐसी है, जो भारतीयों में एक साथ ही गर्व और करुणा दोनों भावनाएं पैदा करती है. बोस केवल 18 साल के थे, जब उन्हें भारत की आज़ादी की लड़ाई में योगदान के चलते उन्हें फांसी पर चढ़ना पड़ा. 1906 में मिदनापुर में लगी औद्योगिक व कृषि प्रदर्शनी में प्रतिबंध की अवज्ञा (Disobedience) करके खुदीराम ने ब्रिटिश विरोधी पर्चे बांटे थे. जिसके चलते एक सिपाही ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की थी. लेकिन, खुदीराम उसके मुंह पर एक जोरदार घूंसा मार ‘साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ का नारा लगाते हुए भाग निकले थे.

पकड़े गए तब भी बच निकले

अगले ही साल 28 फरवरी को पकड़े गये तो भी पुलिस को चकमा देकर भागने में सफल रहे थे. दो महीने बाद अप्रैल में फिर पकड़ में आए तो उन पर राजद्रोह का अभियोग चलाया गया था, लेकिन एक तो उनकी उम्र कम थी और दूसरे उनके खिलाफ एक भी गवाह नहीं मिला, इसलिए 16 मई को महज़ चेतावनी देकर छोड़ दिए गए थे.

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ब्रिटिश राज की पुलिस की कैद में खुदीराम बोस. चित्र विकिपीडिया से साभार.

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इसके बाद 6 दिसंबर, 1907 को खुदीराम ने दल के ऑपरेशनों के तहत नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन के पास बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन और 1908 में अंग्रेज़ अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम फेंके. लेकिन अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्रांतिकारी ऑपरेशन को उन्होंने 20 अप्रैल, 1908 को अंजाम दिया.

चर्चित बमकांड को दिया था अंजाम
यह ऑपरेशन बिहार के मुज़फ्फरपुर ज़िले के सत्र न्यायाधीश किंग्सफोर्ड की हत्या से संबंधित था. दरअसल, बंग भंग के वक्त किंग्सफोर्ड कलकत्ता में मजिस्ट्रेट था और उसने वहां आंदोलन करते हुए पकड़े गए क्रांतिकारियों को जानबूझकर एक से बढ़कर एक क्रूरतम सज़ाएं दी थीं. इससे खुश ब्रिटिश सत्ता ने उसे पदोन्नत करके मुज़फ्फरपुर का सत्र न्यायाधीश बना दिया था.

खुदीराम बोस ने अपने साथी प्रफुल्ल चाकी के साथ मिलकर किंग्सफोर्ड को मारने का प्लान बनाया. और उसे मारने के लिए उनकी गाड़ी पर बम फेंका. लेकिन जिस गाड़ी पर उन्होंने बम फेंका उसमें बैरिस्टर प्रिंगले कैनेडी की पत्नी और बेटी थे. दरअसल किसी काम से किंग्सफोर्ड रुक गये थे और गाड़ी में नहीं बैठे थे. कार में मौजूद लोग मारे गये.

खुदीराम बोस और उनके साथी प्रफुल्ल चाकी इस घटना के बाद वहां से भागे और सीधे 25 मील दूर वैनी स्टेशन पर जाकर रुके लेकिन तब तक वहां भी पुलिस को खबर हो गई थी और उऩ्हें दो अफसरों ने गिरफ्तार कर लिया. जिसके बाद 11 अगस्त, 1908 को खुदीराम बोस को फांसी दे दी गई. प्रफुल्ल चाकी भी एक मुठभेड़ के दौरान मार दिए गये.

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15 अगस्त को देश आज़ादी की 72वीं सालगिरह मनाने जा रहा है, जिसकी तैयारियां ज़ोरों पर हैं. फाइल फोटोे.


खुदीराम बोस : क्विक फैक्ट्स
1- खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को बंगाल के मिदनापुर जिले के गांव हबीबपुर में हुआ था. उनके पिता का नाम त्रैलोक्य नाथ था. उनके जन्म के कुछ ही दिन बाद माता-पिता का निधन हो गया. वह अपनी बहन के यहां पले-बढ़े.
2- 1905 में जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन कर दिया तो इसका पूरे देश में विरोध हुआ. खुदीराम पर भी इसका असर हुआ और वह क्रांतिकारी सत्येन बोस की अगुवाई में क्रांतिकारी बन गए.
3- वह जब स्कूल में पढ़ते थे तभी से उनके दिल में क्रांति की ज्वाला भड़कने लगी थी और वह अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ नारे लगाते थे. 9वीं की पढ़ाई के बाद वह पूरी तरह क्रांतिकारी बन गए और रेवेल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बन वंदेमातरम के पर्चे बांटने लगे.
4- 28 फरवरी 1906 को सोनार बांग्ला नाम का इश्तेहार बांटते वक्त पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. लेकिन वह चकमा देकर भागने में कामयाब हो गए. इसके बाद पुलिस ने एक बार फिर उन्हें पकड़ लिया. लेकिन उम्र कम होने की वजह से चेतावनी देकर छोड़ दिया गया.
5- 6 दिसंबर 1907 को बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर किए गए बम विस्फोट में भी उनका नाम सामने आया. इसके बाद एक क्रूर अंग्रेज़ अधिकारी किंग्सफोर्ड को मारने का ज़िम्मा सौंपा गया. इस काम में उनके साथ प्रफुल चंद्र चाकी भी साथ थे.
6- मजिस्ट्रेट को मारने के लिए बमकांड में अंग्रेज़ अधिकारी की पत्नी और बेटी मारी गई लेकिन वह बच गया. घटना के बाद खुदीराम बोस और प्रफुल चंद वहां से 25 मील भागकर एक स्टेशन पर पहुंचे. लेकिन पुलिस के हत्थे चढ़ ही गए.
7- प्रफुल चंद ने खुद को गोली मारकर स्टेशन पर शहादत दी. थोड़ी देर बाद खुदीराम को भी गिरफ्तार कर लिया गया. उनके खिलाफ 5 दिन तक मुकदमा चला.
8- जून, 1908 में उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मृत्युदंड की सज़ा सुनाई गई. 11 अगस्त 1908 को इस क्रांतिकारी को फांसी पर चढ़ा दिया गया. आज़ादी के संघर्ष में यह किसी भारतीय क्रांतिकारी को फांसी देने की पहली घटना थी.

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First published: August 11, 2019, 1:05 PM IST
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