कैसा एप है KOO और क्या यही है ट्विटर का इकलौता स्वदेशी विकल्प?

कू को देसी ट्विटर कहा जाता है.

कू को देसी ट्विटर कहा जाता है.

जारी किसान आंदोलन (Farmers' Protest) के चलते भारत सरकार और ट्विटर (Indian Govt vs Twitter) के बीच जंग के अलावा पीएम मोदी की ‘मन की बात’ में प्रचार पाने के बाद से मेड इन इंडिया एप को लाभ मिल रहा है. लेकिन क्या ये देसी एप्स सिर्फ नकल हैं या किसी ज़रूरत के मुताबिक भी हैं?

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 11, 2021, 12:19 PM IST
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केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद (RS Prasad), पीयूष गोयल और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chouhan) में इन दिनों क्या कॉमन है? पिछले दिनों इन सभी ने सोशल नेटवर्क प्लेटफॉर्म कू जॉइन किया है. वासतव में, किसानों का जो आंदोलन (Farmers' Movement) जारी है, उसके चलते कई अकाउंटों को ब्लॉक और अनब्लॉक करने के लिए भारत सरकार का दबाव झेल रहे ट्विटर का भारत में भविष्य सुरक्षित नज़र नहीं आ रहा है इसलिए ट्विटर के विकल्प के तौर पर कुछ एप्स अपना दावा पेश करने में लगे हैं. इनमें आजकल कू का नाम सबसे ज़्यादा अहम हो गया है.

कू के सीईओ के हवाले से खबरों में कहा गया है कि इस एप पर 2019 से काम हो रहा था, जिसे मार्च 2020 में लॉंच किया गया, लेनिक उसी वक्त कोविड का प्रकोप शुरू हुआ. लेकिन, अब यह एप कुछ बड़े नामों को अपनी तरफ आकर्षित कर सका है. गोयल और चौहान ने ट्वीट करते हुए कहा कि उनके फॉलोअर उन्हें कू पर जॉइन कर सकते हैं. और कौन कू पर आमद दर्ज करा चुका है, इससे पहले कू के बारे में जानिए.

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क्या और कैसा है कू प्लेटफॉर्म?
ट्विटर की तरह यह भी एक माइक्रो ब्लॉगिंग साइट है, जो गूगल प्ले स्टोर सहित आईओएस पर भी है. यहां आप अपने ओपिनियन पोस्ट करने के साथ ही दूसरे यूज़रों को फॉलो कर सकते हैं. कू पर पोस्ट की कैरेक्टर लिमिट 400 है. मोबाइल नंबर के ज़रिये इस पर साइन अप किया जा सकता है और फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब आदि की फीड्स को आप लिंक कर सकते हैं.

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ट्विटर के साथ कई समानताओं से अलग कू भारतीय भाषाओं पर फोकस करता है.


यहां ऑडियो और वीडियो पोस्ट की जा सकती हैं. ट्विटर की तरह यहां भी हैशटैग है और कोई भी यूज़र किसी और को टैग कर सकता है. यहां आपको पोल्स पोस्ट करने, फोटो व वीडियो शेयर करने और जैसी सुविधाएं भी मिलती हैं. यानी यह ट्विटर का ही एक संस्करण लगता है, तो इसमें अलग क्या बात है?



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कू के सीईओ अप्रमेय राधाकृष्ण की मानें तो भारतीय भाषाओं के लोगों के लिए मंच देना इस एप का मकसद है. राधाकृष्ण के मुताबिक मौजूदा प्लेटफॉर्म अंग्रेज़ी पर ही ज़्यादा फोकस करते हैं. कुछ पॉइंट्स में आपको बताते हैं कि कू के और फैक्ट्स क्या हैं.

- आत्मनिर्भर एप इनोवेशन चैलेंज में ज़ोहो और चिनगारी के साथ ही कू भी विजेता रहा था.

- आईआईएम से पए़े राधाकृष्ण के मुताबिक अब तक इस एप को 30 लाख डज्ञउनलोड मिल चुके हैं.

- बॉम्बिेनेट टेकनोलॉजी ने इस एप को क्रिएट किया है.

- इस एप पर भारतीय भाषाओं में पोस्ट किए जा सकते हैं.

- यह एप एक समय में आप एक ही भाषा में इस्तेमाल कर सकते हैं.

- कू ने खुद को फ्री एक्सप्रेशन प्लेटफॉर्म कहता है और यह भी कि आखिर में वह देश के कानून के ही दायरे में है.

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दिलचस्प बात यह है कि कू खुद को ट्विटर के खिलाफ किसी रेस में होने से मना करता है, लेकिन जबसे ट्विटर के साथ केंद्र सरकार का गतिरोध शुरू हुआ है तबसे कुछ बड़े नेताओं के अलावा टेलिकॉम, इनकम टैक्स, इंडिया पोस्ट, टैक्स व कस्टम के सेंट्रल बोर्ड, मायगव इंडिया जैसे कई विभागों ने भी कू जॉइन किया है. सरकारी विभागों के अलावा ईशा फाउंडेशन, पूर्व क्रिकेटर जवगल श्रीनाथ और अनिल कुंबले भी यहां मौजूद हैं.

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क्या सिर्फ कू ही है ट्विटर का विकल्प?

बेशक नहीं. इससे पहले भी ट्विटर के स्वदेशी विकल्प के तौर पर कुछ ऐप्स चर्चा में रह चुके हैं. पिछले साल नवंबर में टूटर ने खुद को स्वदेशी ट्विटर के तौर पर प्रेज़ेंट किया था. हालांकि यह बहुत हद तक ‘विदेशी’ एप पर ही आधारित रहा. इस एप से भी कुछ बड़े नेता जुड़े लेकिन लंबे समय तक यहां रुके नहीं. इससे पहले 2019 में भारतीय ट्विटर एक्टिविस्टों के बीच एक और एप डंेजवकवद चर्चा में रहा था. लेकिन यहां भी ज़्यादा देर तक लोग रुके नहीं और ट्विटर पर ही लौट गए.
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