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क्या हैं कोरोना से मरने वालों के दाह संस्कार के नियम? कितना हो रहा है पालन?

क्या हैं कोरोना से मरने वालों के दाह संस्कार के नियम? कितना हो रहा है पालन?

श्मशान घाट की फाइल तस्वीर.

श्मशान घाट की फाइल तस्वीर.

Covid-19 के दौर में असंवेदनशीलता बुरी तरह घर कर चुकी है. पितरों तक को दाना पानी देने वाले और गाय के लिए श्रद्वा रखने वाले समाज में Corona Virus संक्रमण से मारे गए लोगों के अंतिम संस्कार के प्रति रवैया दुखद है. ये भी जानें कि इसके चलते लोगों और व्यवस्था से किस तरह Guidelines की अनदेखी हो रही है.

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    देश में कोरोना वायरस संक्रमण के कुल Confirm Cases की संख्या 2 लाख 87 हज़ार हो चुकी है और 8100 से ज़्यादा मौतें भी. केंद्र सरकार के साथ ही बड़े पैमाने पर प्रभावित राज्यों ने कोविड 19 के कारण मरने वाले लोगों के शवों के अंतिम संस्कार (Last Rites) के बारे में गाइडलाइन्स तो जारी की हैं, लेकिन इनका कितना पालन हो पा रहा है? और उसके बाद सवाल ये है कि पालन नहीं हो रहा तो क्या जवाबदेही तय हो पा रही है?

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    कहीं, शव सौंपे जाने में अस्पतालों से बड़ी चूकें हो रही हैं तो कहीं शव मिलने के बाद परिजन नियमों का पालन करने में कोताही बरत रहे हैं. ये भी खबरें हैं कि लोगों में संक्रमण का डर इस कदर फैला है कि स्वास्थ्य महकमे को स्थानीय स्तर पर लोगों की मांगों के सामने झुकना पड़ रहा है. जानिए पूरी स्थिति क्या है.

    कोविड 19 मरीज़ के शव संबंधी नियम
    दिल्ली में कोरोना पॉजिटिव मरीजों के शव प्रबंधन के लिए केजरीवाल सरकार ने नए निर्देश पिछले हफ्ते ही जारी किए. इनके मुताबिक, प्रोटोकॉल का पालन न करने पर संबंधितों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी. आदेश के मुताबिक, मृत्यु की स्थिति में अस्पताल 2 घंटे के भीतर शव को मुर्दाघर में भेजेगा. मृतक के परिवार की मौजूदगी में अगले 24 घंटे में अस्पताल निगम की मदद से दाह संस्कार/दफन करवाए और व्यवस्था ऐसे करे कि परिवार को अंतिम संस्कार के लिए 24 घंटे का समय मिल सके.

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    वहीं, महाराष्ट्र में, किसी भी मौत की स्थिति में शव की कोरोना जांच होगी और रिपोर्ट आने के बाद शव उसके परिजनों को सौंपा जाएगा. पॉज़िटिव रिपोर्ट आने पर संबंधित निकायों की देखरेख में अंतिम संस्कार करवाया जाएगा. दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे ने भी पिछले हफ्ते विस्तृत गाइडलाइन जारी करते हुए कहा कि कोविड मरीज़ के शव का चेहरा ही परिजन देख सकते हैं. मृत शरीर को नहलाया नहीं जाएगा, गले लगाना या माथा चूमने की भी सख्त मनाही है.

    इसके अलावा, कमोबेश तमाम राज्यों में शव सौंपे जाते वक्त उसके सैनिटाइज़ेशन के पूरे तरीके, शवदाह के दौरान ज़्यादा भीड़ न जुटने, 10 से 20 लोगों की मौजूदगी और दाह के बाद राख लेने पर कोई पाबंदी न होने जैसे निर्देश दिए गए हैं. चूंकि कोरोना वायरस दो से चार मीटर से ज़्यादा दूरी पर नहीं फैलता इसलिए आबादी से दूर बने श्मशान घाटों पर ही अंतिम संस्कार कराने में कोई अड़चन नहीं है.

    कैसे टूट रहे हैं ये नियम?
    इसी हफ्ते की एक खबर के मुताबिक 55 साल के एक व्यक्ति को मुंबई के कार्डिनल ग्रासियस अस्पताल में भर्ती कराया गया. लीवर फेल होने की वजह से बताई गई मौत के बाद अस्पताल ने परिजनों को शव सौंप दिया और परिजनों ने कई लोगों की मौजूदगी में दाह संस्कार कर दिया. इसके बाद अस्पताल ने पाया कि मृतक कोविड पॉज़िटिव था. हड़कंप मचा और 40 लोगों को क्वारंटाइन किया गया. 500 लोगों के संक्रमित होने की आशंका जताई गई है लेकिन अस्पताल ने पल्ला झाड़ लिया है.

    इसी तरह मई के आखिरी हफ्ते में उल्हासनगर में एक महिला की मौत के बाद अस्पताल ने शव को परिजनों को सौंपा गया. अंतिम संस्कार में करीब 70 लोग शामिल हुए, जिनमें से 18 को बाद में कोविड पॉज़िटिव पाया गया. इस शव को भी बाद में कोविड पॉज़िटिव पाया गया. उल्हासनगर में यह एक महीने में दूसरा मामला था.

    लोग नहीं ले रहे परिजनों के शव
    कोरोना संक्रमण का डर किस कदर फैला हुआ है, इसका उदाहरण यह है कि कई लोग अपने उन परिजनों के शव लेने तक से इनकार कर रहे हैं, जिनकी मौत कोविड 19 के कारण हो रही है. मसलन, पंजाब के अमृतसर में नगर निगम के पूर्व एडिशनल कमिशनर जसवंत सिंह के परिवार ने शव लेने से इनकार कर दिया. स्वास्थ्यकर्मियों ने पीपीई किट पहन कर अंतिम संस्कार किया. कई राज्यों के साथ ही पंजाब में कोरोना संक्रमितों की मौत को लेकर लगातार विवाद होते रहे हैं.

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    श्मशान घाटों में जलाने नहीं दिए जा रहे शव
    कोरोना वायरस से संक्रमित मृत लोगों के संस्कार को लेकर जालंधर के श्मशानघाट पर काफी हंगामा हो चुका है. उत्तराखंड में, देहरादून से लेकर ​हरिद्वार तक लोग श्मशान घाटों पर कोरोना मृतकों के दाह संस्कार का विरोध कर रहे हैं. देहरादून में एक मामले में प्रशासन ने किसी तरह लोगों को समझाकर कोरोना मृतक बुजुर्ग का संस्कार करा दिया, दूसरे मामले में अंत्येष्टि नहीं हो सकी. उत्तर प्रदेश के फिरोज़ाबाद में भी ऐसा मामला सामने आ चुका है.

    इसी तरह, जम्मू से एक खबर ने पिछले हफ्ते देश को दहला दिया था. डोडा ज़िले में प्रशासन की मौजूदगी में एक बुज़र्ग का अंतिम संस्कार किया जा रहा था, तभी भीड़ ने अंतिम संस्कार करने वालों पर हमला कर दिया क्योंकि मौत ​कोविड की वजह से हुई थी. परिजन अधजला शव लेकर भागे, तो वहीं सुरक्षा गार्ड मदद करने में नाकाम रहे और प्रशासन के अधिकारी भी हमले से डरकर भाग खड़े हुए थे.

    अप्रैल में हरियाणा के अंबाला ज़िले में कोरोना संक्रमित होने के शक में महिला के अंतिम संस्कार के दौरान पुलिस और डॉक्टरों पर पथराव हुआ था. उससे पहले तमिलनाडु के चेन्नई में भी कोरोना से जान गंवाने वाले एक डॉक्टर के अंतिम संस्कार का इलाके के लोगों ने विरोध किया. संक्रमण का डर लोगों में किस कदर पैठा हुआ है, इस तरह के उदाहरण देश भर में कम नहीं हैं.

    नियमों की अनदेखी और असंवेदनशीलता हर तरफ
    कहीं अस्पताल, कहीं प्रशासन तो कहीं लोग असंवेदनशील हो रहे हैं और गाइडलाइन्स का उल्लंघन आम हो रहा है. जैसे खबरों की मानें तो देहरादून और हरिद्वार में श्मशान घाटों पर दाह का विरोध करने आई भीड़ ने न तो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया और न ही ज़्यादातर लोगों ने मास्क पहना.

    दूसरी ओर, पुडुचेरी में एक कोविड मृतक को दफनाने का एक वीडियो सोशल मीडिया पर आलोचना का विषय बना क्योंकि इसमें स्वास्थ्यकर्मी शव को गड्ढे में इस तरह फेंकते हुए दिखे जैसे कोई गंदगी या जानवर की लाश फेंकी जा रही हो. ले गवर्नर किरण बेदी ने इस बारे में शो कॉज़ नोटिस जारी किया. मुंबई के सायन अस्पताल में एक शव देर तक पड़ा रहा, जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. इसके बाद राज्य ने एसओपी जारी किया.

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    जवाबदेही कैसे तय हो?
    अस्पताल अपनी गलती कबूल नहीं करते. उनका कहना रहा है कि परिजनों को शव सौंपते समय ज़रूरी निर्देश दिए जाते हैं लेकिन वो नहीं मानते. जबकि स्वास्थ्य महकमे को अपनी देखरेख में शव का दाह संस्कार करवाना चाहिए. दूसरी तरफ, लोग सोशल डिस्टेंसिंग और कम से कम मौजूदगी के नियम तोड़ते हैं. सरकारी गाइडइलान्स का पालन करवाना एक चुनौती बन गया है. एक ताज़ा उदाहरण देखें.

    हैदराबाद के गांधी जनरल अस्पताल में एक कोविड मरीज़ की मौत हुई. अस्पताल ने कहा कि मरीज़ की स्थिति नाज़ुक थी और उसे हिलने ​डुलने को मना किया गया था लेकिन उसने मेडिकल सलाह नहीं मानी और इसी कारण उसकी मौत हुई. इस मौत पर इतना हंगामा हुआ कि मृतक के परिजनों ने डॉक्टरों के साथ भारी मारपीट कर दी. अब इस नोडल अस्पताल के डॉक्टर सड़क पर विरोध प्रदर्शन कर अपने लिए सुरक्षा की मांग कर रहे हैं.

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