युद्ध के खिलाफ लिखी चिट्ठी में गांधीजी ने हिटलर को क्यों लिखा था 'दोस्त'?

युद्ध के खिलाफ लिखी चिट्ठी में गांधीजी ने हिटलर को क्यों लिखा था 'दोस्त'?
न्यूज़18 क्रिएटिव

#GANDHI@150 : क्या महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) की हत्या चाहता था हिटलर (Adolf Hitler)? जानिए गांधीजी ने क्यों लिखी थीं हिटलर को दो चिट्ठियां और गांधी जयंती (Gandhi Jayanti) पर इसे कैसे समझा जाए.

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  • Last Updated: October 1, 2019, 9:17 PM IST
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'प्रिय मित्र, कुछ दोस्त चाहते थे कि मानवता (Humanity) की खातिर मैं आपको लिखूं लेकिन मुझे यही लगता रहा कि शायद ये गुस्ताख़ी होगी. लेकिन कुछ है जो कहता है कि मैं ज़्यादा हिसाब किताब न करूं और अपनी बात रखूं. ये साफ है कि इस समय में आप दुनिया में वो इंसान हैं, जो चाहे तो मानवता की खातिर युद्ध रोक (World War) सकता है. बेशक आप जो हैं, उसकी कीमत आपने ज़रूर चुकाई होगी. फिर भी क्या आप एक ऐसे व्यक्ति की अपील सुनेंगे जिसने युद्ध को जानते बूझते नामंज़ूर किया है? आपका दोस्त, एम.के. गांधी (Mohandas Karamchand Gandhi)'

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दूसरा विश्वयुद्ध (Second World War) भयावह न हो जाए इसलिए महात्मा गांधी ने 23 जुलाई 1939 को ये चिट्ठी जर्मन तानाशाह (German Dictator) हिटलर को लिखी थी. इसके बाद उन्होंने 24 दिसंबर 1940 को एक और पत्र हिटलर के नाम (Letters to Hitler) लिखा था, जिसमें युद्ध से तौबा करने और अहिंसा, शांति व सत्याग्रह जैसी बातें थीं. लेकिन, रिपोर्ट्स कहती हैं कि ब्रितानी व्यवस्था (British Raj) ने दोनों ही चिट्ठियां इंटरसेप्ट कर लीं इसलिए हिटलर तक नहीं पहुंचीं. दूसरी तरफ, ऐतिहासिक रूप से हिटलर ने महात्मा गांधी को कोई पत्र नहीं लिखा यानी जवाब नहीं दिया. अब इन पत्रों को कैसे समझा जाना चाहिए? गांधी और युद्ध पर कैसे बात की जाना चाहिए?



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क्या हिटलर गांधी की हत्या चाहता था?
युद्धों को लेकर बात से पहले ये लाज़िमी है कि आप जान लें कि हिटलर और गांधी उस समय के दो विरोधी ध्रुव थे. एक तरफ, गांधीजी ने दोनों पत्रों में हिटलर को 'मित्र' संबोधित किया लेकिन हिटलर का गांधीजी को लेकर क्या सोचना था? कोएन्राड अल्स्ट के एक लेख की मानें तो हिटलर की मंशा गांधीजी को खत्म करने की थी. भारत के वायसराय रह चुके इरविन के साथ 1937 की एक बैठक में हिटलर ने वादा किया था कि ब्रिटेन उसका साथ दे तो वह भारत में ब्रितानी हुकूमत को बचाने में साथ देगा.

यही नहीं, अल्स्ट के लेख में कहा गया है कि ब्रितानी राज को भारत में कायम रखने के लिए हिटलर का फॉर्मूला था - गांधी की हत्या. ये भी कि इससे बात न बने तो कुछ और नेताओं की हत्या और उसके बाद और हत्याएं, जब तक भारत के लोग आज़ादी की उम्मीद थककर छोड़ न दें.


यह भी उल्लेख है कि गांधी शायद इस बारे में जानते नहीं थे इसलिए 'मित्र' कह रहे थे. वैसे भी, गांधीजी जैसा मानवतावादी अगर हिटलर को भी 'मित्र' न संबोधित करता तो प्रश्न शायद बड़ा होता कि क्यों नहीं किया. वजह साफ है कि गांधीजी युद्ध नहीं शांति और सौहार्द्र के ही पक्षधर थे.

युद्धों के दरमियान गांधीजी की ज़िंदगी
दक्षिण अफ्रीका के दिनों से गांधीजी की सामाजिक और राजनीतिक ज़िंदगी शुरू होती है, जब उन्होंने एक एक्टिविस्ट और जननायक के तौर पर अपनी छवि गढ़ना शुरू की थी. रंग और नस्ल के खिलाफ इस युद्ध से शुरू हुआ गांधीजी का जीवन लगातार युद्धों के समय से गुज़रता रहा. प्रथम विश्वयुद्ध से दूसरे विश्वयुद्ध के बीच अंग्रेज़ी राज के खिलाफ भारत खुद युद्धरत रहा. गांधीजी की ज़िंदगी जंग से लगातार जूझती रही लेकिन उनके विचारों पर ज़ंग नहीं लगा सकी और वह शांति व अहिंसा के वक्ता के तौर पर और मज़बूत होते चले गए.

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इस बात को समझने का अर्थ यही है कि दुनिया या जीवन विरोधी विचारों के द्वंद्व का ही नाम है. एक कठोर हकीकत है, एक आदर्श का स्वप्न. एक है और एक होना चाहिए. मशहूर कहानी 'उसने कहा था' में गुलेरी जी ने ऐसी ही मार्मिक प्रेमकथा बुनी है, जिसकी बैकग्राउंड में युद्ध चल रहा है. प्रेम, शांति और सद्भावना के संदेश के लिए युद्ध, नफरत जैसी विपरीत स्थितियां बिल्कुल माकूल होती हैं इसलिए जब तक ये स्थितियां रहेंगी, गांधी के विचार प्रासंगिक रहेंगे ही.

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साल 1939 और 1940 में गांधीजी ने हिटलर के नाम दो पत्र लिखे थे, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं है कि दोनों पत्र हिटलर तक पहुंचे.


गांधी जयंती और युद्ध की स्थितियां
कल 2 अक्टूबर को गांधी के जन्म की 150वीं वर्षगांठ मनाई जाएगी लेकिन चिंता ये है कि न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया गांधीजी को याद करते हुए भाषण तो देगी, लेकिन चरितार्थ क्या करेगी? स्थितियां कुछ ऐसी हैं कि अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है. चीन ने हाल ही कम्युनिस्ट शासन की 70वीं सालगिरह पर ऐसी मिसाइलों का प्रदर्शन किया, जो आधे घंटे में सीधे अमेरिका को निशाना बना सकती हैं.

अमेरिका और ईरान के बीच जंग के हालात बने हुए हैं. भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध को लेकर सर​गर्मियां हैं और परमाणु हमले तक की आशंकाएं ज़ाहिर की जा चुकी हैं. उधर, कोरियाई देशों में भी युद्ध को लेकर आएदिन बयानबाज़ी जारी है. सांप्रदायिक सौहार्द्र के नाम पर एक हिंसक समाज हर जगह नज़र आ रहा है. युद्ध के बैकग्राउंड में ही शांति, अहिंसा और सौहार्द्र की बातें की जा सकती हैं इसलिए हमें गांधीजी को पढ़ने से ज़्यादा समझने की ज़रूरत है. हिटलर को लिखे दूसरे पत्र में गांधीजी के शब्द थे 'अहिंसा की राह में हारने जैसी बात होती ही नहीं है. यह 'करो या मरो' जैसी स्थिति है जिसमें कोई आहत नहीं होता'.

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