अब गन्ने का रस पिएं तो गौर करें, क्यों मिठास में हज़ारों औरतों के आंसुओं का स्वाद है?

#DigitalPrimeTime : महाराष्ट्र के मराठवाड़ा के गन्ने की मिठास के पीछे कितनी कड़वाहटों का जहन्नुम है? हज़ारों महिलाओं के गर्भाशय निकाल दिए जाने के खुलासे के बाद आपके मन में जितने सवाल हैं, सबका जवाब देती खास रपट.

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: June 24, 2019, 10:09 PM IST
Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: June 24, 2019, 10:09 PM IST
बिहार में बच्चों की मौतों का शोर गूंज ही रहा था कि इसी बीच महाराष्ट्र से एक बेहद डरावनी खबर आई, जिसने देश भर को भीतर तक झकझोर कर रख दिया. 2016 से 2019 के बीच, महाराष्ट्र के बीड में 4605 खेतिहर मज़दूर औरतों के गर्भाशय निकालने की यानी यूटरस रिमूवल सर्जरी की गई. इनमें से ज़्यादातर महिलाओं की उम्र 25 से 30 साल के बीच बताई जा रही है. ये आंकड़ा क्या सिर्फ रोज़मर्रा की एक खबर भर है?

ये खबर सवाल खड़े करती है मसलन गन्नों के खेतों में काम करने वाली इन महिलाओं को यूटरस रिमूवल सर्जरी करवाना क्यों पड़ी? किन अस्पतालों में किन सुविधाओं के बीच ये सर्जरी हुईं? इस तरह की सर्जरी के बाद इन मज़दूर महिलाओं की सेहत पर क्या असर है? आदि.

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शायर फुज़ैल जाफरी फरमाते हैं, 'ज़हर मीठा हो तो पीने में मज़ा आता है /बात सच कहिए मगर यूँ कि हक़ीक़त न लगे'... इधर गन्ने का रस पीते हमें और आपको ये खयाल तक नहीं आता कि ये रस हम और आप तक पहुंचता कैसे है! इसके ​पीछे कितनी महिलाओं और कितने परिवारों की चीखें हैं. हज़ारों की संख्या में महिलाओं को यूटरस रिमूवल सर्जरी करवाना पड़ती है, तो सवाल पूरे सरकारी और सामंतवादी सिस्टम पर भी उठता है.

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गन्ना खेतिहर मज़दूर. फाइल फोटो.


ताज़ा खबर के मुताबिक राज्य सरकार ने स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव की अध्यक्षता वाली एक समिति बनाकर इस मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं. लेकिन, आपको हैरत हो सकती है ये जानकर कि ये कदम महिलाओं को सिर्फ इसलिए उठाना पड़ा है ताकि कुछ रुपयों का नुकसान न हो. इन आंकड़ों के पीछे गरीबी और जागरूकता के अभाव की ऐसी कुरूप तस्वीर है, जो हम देखने से कतराते हैं.

कौन हैं ये औरतें?
महाराष्ट्र के गन्ना उत्पादन के क्षेत्र में हज़ारों की संख्या में औरतें खेतिहर मज़दूर के तौर पर काम करती हैं. इनके घरों के पुरुष भी साथ मिलकर गन्ने की कटाई का काम करते हैं और ज़रूरी बात ये भी है कि खेतों के ठेकेदार पुरुष और महिला के एक जोड़े को एक इकाई यानी एक मज़दूर मानते हैं. मराठवाड़ा का ये इलाका ​चूंकि पिछड़ा है इसलिए यहां गरीबी, अशिक्षा और जागरूकता के अभाव जैसी समस्याएं हैं. मराठवाड़ा और आसपास से कई परिवार अक्टूबर से मार्च यानी छह महीनों के लिए मज़दूरी करने आते हैं ताकि साल भर की रोज़ी रोटी का बंदोबस्त हो सके.

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गन्ना खेतिहर मज़दूर. फाइल फोटो.


क्या होता है हिसाब किताब?
खबरों के मुताबिक ठेकेदार प्रति टन गन्ना कटाई पर एक मज़दूर जोड़े को 250 रुपये देते हैं. एक जोड़ा औसतन एक दिन में 3 से 4 टन गन्ने की कटाई करता है यानी 750 से 1000 रुपये तक कमा पाता है. फिर नियम ये है कि अगर जोड़े में से किसी एक, महिला या पुरुष, ने भी किसी दिन छुट्टी ली, तो उसे 500 रुपये का जुर्माना ठेकेदार को देना पड़ता है.

क्यों होती है यूटरस रिमूवल सर्जरी?
इन महिलाओं के हवाले से मीडिया में अब तक जो पुष्ट खबरें आई हैं, उनके हिसाब से इस सर्जरी के पीछे मेहनताने का नुकसान और जुर्माने का नियम है. अव्वल तो खेत के मालिक या ठेकेदार ऐसी महिलाओं को काम ही नहीं देते हैं, जिन्हें मासिक धर्म होता है क्योंकि ऐसे में महिलाएं हर महीने कुछ दिनों की छुट्टी के लिए मजबूर होती हैं. इसी तरह की मुश्किलों के चलते हालात ये बन चुके हैं कि अगर किसी महिला को मज़दूरी करना है, तो उसे मासिक धर्म से निजात पाना ही होती है. इसके लिए यही रास्ता सुझाया जाता है और ये महिलाएं ये यूटरस रिमूवल सर्जरी करवा लेती हैं.

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क्या हालात और मुश्किल हैं?
इन मज़दूर महिलाओं और परिवारों को खेतों के पास ही बने किसी टेंट में इस काम के चलते छह महीने गुज़ारने होते हैं. यहां शौचालयों की व्यवस्था नहीं होती. ज़ाहिर है ऐसे में पीरियड्स होने पर महिलाओं की मुश्किल कई गुना बढ़ जाती है. एक और भयानक कारण भी है. द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक कुछ मज़दूर औरतों ने ये भी बताया कि ठेकेदारी से जुड़े लोग बार बार इनका यौन शोषण करते हैं. ऐसे में तमाम समस्याओं से निजात पाने के लिए यूटरस रिमूवल का रास्ता चुनना इनकी मजबूरी होती है. द हिंदू ने एक महिला मज़दूर सत्यभामा के हवाले से लिखा :

'गर्भाशय निकल जाने के बाद पीरियड्स नहीं होते. इसलिए गन्ना कटाई के ​काम में हमें ब्रेक लेने की मजबूरी नहीं होती. वैसे भी हम एक रुपये का नुकसान भी झेलने की हालत में नहीं हैं.'

एक और मुश्किल है सर्जरी का खर्च
इन महिलाओं का कहना है कि यूटरस रिमूवल सर्जरी के लिए 30 से 35 हज़ार रुपये का खर्च होता है और इसके लिए उन्हें कर्ज़ लेना ही पड़ता है, भले ही कुछ रकम परिवार खुद अरेंज कर भी ले. दूसरी बात, ये कर्ज़ किसी बैंक या संस्था से नहीं बल्कि ठेकेदार या साहूकार जैसे किसी व्यक्ति से मिलता है इसलिए इस पर ब्याज भी लगता रहता है. इस कर्ज़ को चुकाना भी इन महिलाओं के लिए टेढ़ी खीर बन जाता है क्योंकि कर्ज़दार महिला को कई तरह का बर्ताव भी बर्दाश्त करना होता है. मुंबई मिरर ने एक महिला मज़दूर आशा जोगदानंद के हवाले से लिखा :

'मुझे इस सर्जरी के लिए 30 हज़ार रुपये का कर्ज़ लेना पड़ा, जिसे मैं अब तक चुका रही हूं. इसी दौरान मेरे पति एक हादसे के शिकार भी हो गए तो हालात बद से बदतर हो चुके हैं.'

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ये सर्जरी हो कैसे हो रही है?
महिला मज़दूरों की यूटरस रिमूवल सर्जरी बीड और उसके आसपास के ही प्राइवेट डॉक्टर कर रहे हैं. महिलाओं की सेहत के मुद्दे पर काम करने वाले एनजीओ का एक समूह सरकार से गुहार लगा चुका है कि इस तरह की सर्जरी करने वाले रैकेट पर लगाम लगाई जाए. मुंबई मिरर की रिपोर्ट की मानें तो हैरत की बात ये भी है कि ये डॉक्टर और गन्ने के कारोबार के बीच मिलीभगत का इशारा ये है कि ये डॉक्टर मासिक धर्म के लक्षणों को कैंसर का खतरा बताकर 25 से 30 या 35 साल की उम्र की इन महिलाओं को डराकर इस सर्जरी के लिए मजबूर कर देते हैं. सत्याग्रह की रिपोर्ट के मुताबिक कुछ पीड़िताएं तो ऐसी भी हैं, 19-20 साल की उम्र में ही जिनका गर्भाशय निकाल दिया गया. इस सर्जरी के बारे में दरबारी हॉस्पिटल की गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. गीतिका दरबारी कहती हैं :

महिलाओं को सामान्य तौर पर 40 साल की उम्र के पहले गर्भाशय निकालने की सर्जरी नहीं करवाना चाहिए. शिशु को जन्म देने संबंधी कारण के अलावा अहम ये भी है कि अगर 40 की उम्र के पहले ये सर्जरी होती है तो रजोनिवृत्‍ति यानी पोस्ट मैनोपोज़ लक्षण पहले ही आ जाते हैं. चूंकि हॉर्मोनल संतुलन के लिए यूटरस ज़रूरी होता है इसलिए इसके न होने के कारण नर्वस सिस्टम संबंधी समस्याएं और शरीर के कई हिस्सों में दर्द की शिकायतें हो सकती हैं.


कब करवाई जाना चाहिए ये सर्जरी?
न्यूज़ 18 हिंदी से बातचीत करते हुए डॉ. दरबारी ने इस सवाल का जवाब इस तरह दिया, 'गर्भाशय निकाले जाने की सर्जरी इमरजेंसी की स्थिति में की जाती है या की जाना चाहिए. यहां इमरजेंसी का मतलब कुछ मेडिकल स्थितियों से है जैसे पैप स्मियर या सर्वाइकल कैंसर की जांच में अगर नाज़ुक स्थिति पता चले, यूटरस बाहर आ गया हो यानी प्रो लैप्स स्थिति हो और मासिक धर्म से जुड़ी कोई गंभीर समस्या हो, आदि'. डॉ. दरबारी इस बात पर भी ज़ोर देती हैं कि यूटरस रिमूवल सर्जरी बड़ी और अहम सर्जरी है इसलिए इसके लिए विशेषज्ञ सर्जन के साथ ही, ज़रूरी उपकरणों एवं सही दवाओं युक्त अस्पताल ज़रूरी है.

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यूटरस कैंसर के लक्षण, इलाज और प्रभाव
जैसा कि खबरों में है कि इन महिलाओं को कैंसर का डर दिखाकर इनकी सर्जरी कर दी गई, तो ये भी जानिए कि यूटरस कैंसर क्या होता है. दो पीरियड्स के बीच असामान्य ब्लीडिंग होना, पेलविक पेन होना या मासिक धर्म के दौरान ज़्यादा या असामान्य डिस्चार्ज होना यूटरस कैंसर के सामान्य लक्षण होते हैं. वहीं, यूटरस कैंसर का इलाज यूटरस रिमूव करना ही नहीं है. रेडियो थैरेपी भी होती है, ओवरी और फैलोपीन ट्यूब को हटाया जाना भी ज़रूरी होता है. यूटरस की लाइनिंग पर कैंसर पहले और अधिकतर होता है, जो सामान्य इलाज से ठीक हो सकता है. लेकिन, इसका ठीक इलाज न हो, तो यूटरस कैंसर होता है.

दूसरी ओर, यूटरस रिमूवल सर्जरी के बाद खून की कमी, हॉट फ्लैचेज़, खून का थक्का जम जाना, संक्रमण जैसे खतरे तुरंत पैदा हो सकते हैं और लंबे समय में पेलविक प्रो लैप्स का खतरा बढ़ता है. चूंकि हार्मोनल संतुलन भी बिगड़ता है इसलिए शरीर के कई हिस्सों में दर्द लगातार रहने के बाद धीरे धीरे खतरनाक हो सकता है. बीड में ऐसी सर्जरी करवा चुकी 32 वर्षीय महिला मज़दूर छाया डोके ने मुंबई मिरर को बताया कि 'मेरे शरीर में दर्द बना रहता है, घुटने दुखते हैं, मुझसे सिर पर गन्ने उठाते नहीं बनते. मैं चाहती हूं कि मेरी बेटियों का नसीब ऐसा न हो'.

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छाया ने भी ये भी कहा कि वो वहां सक्रिय डॉक्टरों की बात सुनकर ऐसी सर्जरी न करवाने के लिए औरतों को मना करती है लेकिन कैंसर का डर इतना ज़्यादा फैला है कि कोई जोखिम नहीं लेना चाहता. बात बेकल उत्साही के इस शेर पर खत्म होती है 'बीच सड़क इक लाश पड़ी थी और ये लिक्खा था /भूख में ज़हरीली रोटी भी मीठी लगती है'.

आशंकाएं और दिलासे
इस पूरे मुद्दे पर कई स्थानीय नेता सामने आ रहे हैं और कुछ ने दिलासा दिया है कि वो आगामी विधानसभा चुनाव में इस मुद्दे को उठाएंगे. गन्ने के कारोबार में करीब 14 लाख मज़दूर काम करते हैं और कर्नाटक की भी महिला मज़दूर भी ऐसी समस्याओं से जूझ रही हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग स्वत: संज्ञान लेकर कर्नाटक और महाराष्ट्र सरकार को नोटिस भेज चुका है. वहीं, सत्याग्रह की रिपोर्ट के मुताबिक गन्ना ठेकेदारों और स्थानीय अस्पतालों व डॉक्टरों के बीच एक बड़ा रैकेट चल रहा है, जिसकी भेंट ये मज़दूर महिलाएं चढ़ रही हैं. आशंका यह भी है कि इस धंधे के तार मानव अंग तस्करी से जुड़े भी हो सकते हैं, लेकिन इसकी अब तक पुष्टि नहीं हुई है.

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