कौन हैं मिलेनियल्स, जो हैशटैग के ज़रिए वित्त मंत्री से ले रहे हैं लोहा

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: September 11, 2019, 5:12 PM IST
कौन हैं मिलेनियल्स, जो हैशटैग के ज़रिए वित्त मंत्री से ले रहे हैं लोहा
2020 तक भारत की एक तिहाई से ज़्यादा आबादी युवाओं की होगी.

वित्त मंत्री (Finance Minister) के बयान के बाद सोशल मीडिया पर 'मिलेनियल' शब्द ट्रेंड (Trending on Social Media) करने लगा है. क्या आप इस शब्द के दायरे में हैं? ये भी जानें कि क्या मिलेनियल्स पर आरोप लगाया जाना ठीक है.

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#BoycottMillennials : 'बॉयकॉटमिलेनियल्स' हैशटैग अचानक क्यों सोशल मीडिया (Social Media) पर ट्रेंड करने लगा है? अस्ल में, देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitaraman) ने ऑटोमोबाइल सेक्टर (Auto Sector) में आई ज़बरदस्त मंदी को लेकर बयान दिया कि 'मिलेनियल्स' की सोच बदली है और वो ओला और उबर (Ola & Uber) जैसी प्राइवेट टैक्सी के इस्तेमाल पर ज़्यादा भरोसा कर रहे हैं इसलिए वाहन खरीदी कम होती जा रही है. सीतारमण के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर ये हैशटैग ट्रेंड (Trending Hashtag) करने लगा और लोग देश की तमाम स्थितियों के लिए इन्हीं 'मिलेनियल्स' के माइंडसेट को ज़िम्मेदार ठहराकर मज़ाकिया पोस्ट करने लगे हैं.

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ये कौन लोग हैं, जिनके लिए मिलेनियल्स (Who Are Millennials) शब्द का इस्तेमाल होता है? इसके साथ ही आपको ये भी जानना चाहिए कि इस आबादी का माइंड सेट यानी सोचने विचारने का तरीका कैसा है. भारत के मिलेनियल्स (Indian Millennial) के बारे में शोधों का सिलसिला (Research) हालांकि तेज़ रफ्तार नहीं है, लेकिन फिर भी इस विषय में कुछ रोचक जानकारियां सामने आई हैं. आइए मिलेनियल्स और इनकी दुनिया के बारे में जानें.

कौन होते हैं मिलेनियल्स?

यूएस के सेंसस ब्यूरो यानी जनगणना के आंकड़ों की मानें तो इस वक्त दुनिया की एक चौथाई आबादी मिलेनियल्स की है. आसान भाषा में आप इसे युवा आबादी कह सकते हैं. 1980 या 82 से साल 2000 के बीच जो लोग पैदा हुए हैं यानी 21वीं सदी की शुरूआत में वयस्क हुए हैं, उन्हें मिलेनियल्स कहा जाता है. इस शब्द को हम युवा आबादी या उभरते हुए युवाओं के तौर पर भी समझ सकते हैं.

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ये युवा अपनी पिछली पीढ़ियों की तुलना में तकनीक, विज्ञान और समझ को लेकर तेज़तर हैं इसलिए इन्हें जेन एक्स या जेन वाय जैसे शब्द भी मिल चुके हैं.

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क्यों अलग हैं मिलेनियल्स?
भारत में आमतौर से जिन्हें 'आजकल के बच्चे' या 'आजकल के जवान' कह दिया जाता है, उनके बारे में नील्सन ग्लोबल सर्वे ने एक रिपोर्ट जारी की थी. 2013 से 2016 के बीच इस संस्था ने 60 देशों के 30 हज़ार से ज़्यादा ऐसे युवाओं के बीच सर्वे कर जाना था कि इनका माइंड सेट अस्ल में कैसा है. इस रिसर्च के हवाले से ये खूबियां या लक्षण इस आबादी में साफ दिखे:

- संचार के युग में ये युवा डिजिटल और वास्तविक जीवन में ज़्यादा कुशल और तेज़ हैं.
- सामाजिक व सामुदायिक शैली के जीवन वाले ये युवा वैयक्तिक स्वतंत्रता को तरजीह देते हैं.
- ये युवा ज़्यादा संतुलन और बेहतर स्वास्थ्य वाली जीवनशैली चाहते हैं.
- ये युवा कं​पनियों, प्रॉडक्ट्स और सेवाओं के बारे में ताज़ा और ज़्यादा जानकारियों रखते हैं.
- ये अपने और समाज के लिए और बेहतर व अनुकूल प्रॉडक्टस की डिमांड करते हैं.
- कनेक्टिविटी और कन्विनिएंस के लिए इन युवाओं में ज़्यादा ललक है.

कुल मिलाकर ये युवा अपनी पिछली पीढ़ियों की तुलना में तकनीक, विज्ञान और समझ को लेकर बेहतर और तेज़तर हैं इसलिए इन्हें जेन एक्स या जेन वाय जैसे शब्द भी मिल चुके हैं. इसके अलावा पिछली पीढ़ियों ने आलसी, जल्दबाज़ और कम या न विचार करने वाली यानी दूर की न सोचने वाली पीढ़ी कहकर इन युवाओं को समय समय पर कठघरे में भी खड़ा किया है. लेकिन क्या ये सच है?



भारतीय युवाओं पर न लगाएं आरोप!
अस्ल में, दुनिया भर में या पश्चिम में इस तरह के ज़्यादा अध्ययन हुए हैं इसलिए वहां की मिलेनियल्स आबादी को लेकर ज़्यादा सुनने पढ़ने को मिलता है. विकसित देशों में इस जनरेशन में यह प्रवृत्ति देखी गई कि ये परिवारों, सामाजिक संस्कारों और जीवन के पुराने मूल्यों की कद्र नही करते, लेकिन क्या भारतीय युवा भी ऐसे ही हैं? इस सवाल को खोलता एक लेख द हिंदू ने प्रकाशित किया था जिसमें साफ कहा गया कि दुनिया की इस आबादी के गुण दोषों के समकक्ष भारतीय मिलेनियल्स के बारे में राय नहीं बनाना चाहिए.

दुनिया की तुलना में भारत की यही आबादी आलसी या गफलत की शिकार नहीं कही जा सकती. यहां पैरेंट्स और परिवारों को लेकर मिलेनियल्स में एक चिंता और समझ के साथ उन्हें साथ लेकर चलने की सोच कायम है, ज़िम्मेदारी का एहसास है और मूल्यों की फिक्र है. इसका मतलब ये नहीं है कि भारतीय मिलेनियल्स को पिछड़ा कहा जा सकता है. इन मूल्यों के साथ ही तकनीक, विज्ञान और कौशल के गुणों से भरपूर ये पीढ़ी ज़्यादा ईमानदार और बेहतर व्यवस्था की पक्षधर दिखती है.

देश के लिए नई उम्मीद कही जा रही इस पीढ़ी के माइंड सेट को लेकर परंपरावादी नज़रिए से सोचने के बजाय ज़रूरत है कि इस पीढ़ी की वास्तविक क्षमताओं और संभावनाओं को तलाशने के लिए गंभीर शोध होने चाहिए.


नई दुनिया बनाएंगे यही मिलेनियल्स?
हालांकि इस पीढ़ी को लेकर बहस जारी है, फिर भी कुछ गंभीर किताबें इस विषय पर लिखी जा चुकी हैं. रेजिना लटरेल और कैरेन मैकग्रा लिखित द मिलेनियल माइंडसेट ऐसी ही एक किताब है, जिसमें न सिर्फ इस पीढ़ी के कई लोगों बल्कि पुरानी पीढ़ियों के कुछ लोगों से बातचीत कर दो जनरेशन के बीच में एक आपसी समझ बनाने की दिशा में कोशिश की गई है. इस किताब को गलतफहमियां मिटाने वाली और टीचरों, अभिभावकों और बुजुर्गों के साथ इस नई जनरेशन के सामंजस्य को समझाने की वाली कोशिश करार दिया गया.

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दुनिया की इस युवा आबादी के गुण दोषों के समकक्ष भारतीय मिलेनियल्स के बारे में राय नहीं बनाना चाहिए.


इस किताब के बारे में ये भी कहा गया है कि इसे पढ़कर आप इस नौजवान पीढ़ी को बुर्जुआ चश्मे से देखना छोड़कर उसे आलसी, स्वार्थी और अपने आप में मगन कहना छोड़ेंगे और समझना सीखेंगे कि ये पीढ़ी कितनी आशावादी, ऊर्जावान, परोपकारी और आदर्शों को जीने की ख्वाहिश रखने वाली है. इस तरह के और भी शोध हो रहे हैं जिनमें इस पीढ़ी को कई एंगलों से दर्ज किया जा रहा है. आखिरकार कहा जा सकता है कि इस पीढ़ी का माइंडसेट नया और काफी हद तक क्रिएटिव है इसलिए इसे खारिज करने की आदत छोड़ना चाहिए.

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First published: September 11, 2019, 5:05 PM IST
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