जन्मदिन : एमएस सुब्बुलक्ष्मी, जिनकी आवाज़ के मुरीद गांधी और नेहरू भी थे

एमएस सुब्बुलक्ष्मी का यादगार चित्र विकिमीडिया कॉमन्स से साभार.
एमएस सुब्बुलक्ष्मी का यादगार चित्र विकिमीडिया कॉमन्स से साभार.

सरोजिनी नायडू ने जिन्हें 'भारत की बुलबुल' (Nightingale of India) कहा, बड़े गुलाम अली खां ने 'स्वरलक्ष्मी', लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) ने 'तपस्विनी' और विदुषी किशोरी अमोनकर ने 'आठवां सुर' का खिताब दिया, उन सुब्बुलक्ष्मी से जुड़े यादगार किस्से.

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  • Last Updated: September 16, 2020, 3:11 PM IST
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एमएस सुब्बुलक्ष्मी (M.S. Subbulakshmi) को याद करते हुए सबसे खास बात यह ध्यान में रखना ज़रूरी है कि उन्होंने कर्नाटक संगीत (Carnatic Music) में उस वक्त अपनी अमिट पहचान बनाई, जब यह सिर्फ पुरुषों की दुनिया थी. इसमें महिलाएं अघोषित रूप से वर्जित थीं. बहरहाल, सेम्मनगुड़ी श्रीनिवास अय्यर से कर्नाटक संगीत और पंडित नारायण राव व्यास से हिंदोस्तानी संगीत (Indian Classical Music) की शिक्षा लेने वाली सुब्बुलक्ष्मी की आवाज़ जिसने भी सुनी, वो न केवल उनका फैन हुआ बल्कि उनका सम्मान भी करने लगा.

भारत रत्न, एशिया के नोबेल कहे जाने वाले रैमन मैगसेसे (Ramon Magasaysay) जैसे शीर्ष सम्मानों और संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तुति देने वाली पहली भारतीय होने का गौरव अपने नाम करने वाली सुब्बुलक्ष्मी का पहला म्यूज़िक अलबम तब आया था, जब वह सिर्फ दस साल की थीं. इसके बाद उन्होंने मद्रास संगीत अकादमी में जाकर पूरा प्रशिक्षण लिया और सिर्फ मातृभाषा कन्नड़ ही नहीं, कई भाषाओं में गाकर पूरी दुनिया में अपने प्रशंसक बनाए.

कागज़ को माइक बनाकर गाती थीं सुब्बुलक्ष्मी
ग्रामोफोन सुन सुनकर और उस मशीन से प्रभावित होकर बचपन से ही जब सुब्बुलक्ष्मी गाने की प्रैक्टिस करती थीं, तो कागज़ को रोल करके उसे माइक की तरह अपने सामने रखकर गाती थीं. सिर्फ आठ साल की उम्र में उन्होंने कुंभकोणम में महामहम उत्सव के दौरान प्रस्तुति दी थी और तभी संगीत के विद्वानों ने उस नन्ही सी बच्ची की प्रतिभा को भांप लिया था.
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पद्मभूषण के बाद भारत रत्न से सम्मानित की गईं एमएस सुब्बुलक्ष्मी.




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संगीत भरा था बचपन
16 सितंबर 1916 को जन्मीं मदुरई शनमुखावदिवू सुब्बुलक्ष्मी यानी एमएस सुब्बुलक्ष्मी या एमएस अम्मा को घर में प्यार से कुंजम्मा भी कहा जाता था. पारंपरिक देवदासी परिवार और एक प्रसिद्ध वीणावादक के घर जन्मीं सुब्बुलक्ष्मी का बचपन मीनाक्षी मंदिर के बहुत करीब रहकर गुज़रा. उनके पिता के वीणा वादन और गायकी के भी कुछ रिकॉर्ड्स आए थे. सुब्बुलक्ष्मी अपनी मां के साथ कोरस में प्रस्तुतियां देती थीं.

सुब्बुलक्ष्मी गा रही थीं और मन खेल में था
एक इंटरव्यू में सुब्बुलक्ष्मी ने बताया था कि बचपन में उनका पसंदीदा खेल मिट्टी और कीचड़ में घरौंदे बनाने का था. एक दिन जब वो यही खेल रही थीं, तभी कोई उन्हें पास के सेतुपति स्कूल में ले गया और वहां मां के कहने पर करीब 100 लोगों के सामने उन्होंने दो गीत सुनाए. सब उनकी प्रस्तुति पर तालियां बजा रहे थे, लेकिन सुब्बुलक्ष्मी के मन में यही बात थी कि वो कब मिट्टी में लौटकर अपना घरौंदा पूरा बनाएं. यह बालमन उस वक्त संगीत की प्रतिभा और भविष्य में मिलने वाले सम्मानों से अनजान था.

एक लेख से शुरू हुआ अफेयर
अकादमी में शिक्षा लेने के साथ ही सुब्बुलक्ष्मी कार्यक्रमों में प्रस्तुतियां देने लगी थीं. खबरों की मानें तो 1936 में तमिल साप्ताहिक पत्र के पत्रकार टी सदाशिवम आनंदा विकतन ने सुब्बुलक्ष्मी पर केंद्रित एक लेख लिखा और इसका असर यह हुआ कि लोगों की खासी भीड़ उनके कार्यक्रम सुनने के लिए पहुंचने लगी. यही नहीं, सदाशिवम ने जिस तरह सुब्बुलक्ष्मी का साक्षात्कार लिया और बातचीत की, दोनों के बीच एक रिश्ता बनने लगा.

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हालांकि सदाशिवम के राजनीतिक कनेक्शन बहुत अच्छे थे, फिर भी सुब्बुलक्ष्मी की मां को यह रिश्ता रास नहीं आया था. सुब्बुलक्ष्मी घर छोड़कर शादीशुदा सदाशिवम के घर पहुंच गई थीं. कहा जाता है कि सदाशिवम ने उनकी नायाब प्रतिभा को भांपा ही नहीं, बल्कि तराशा भी था. कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि उन्होंने सुब्बुलक्ष्मी की इंडिविजुएलिटी को खत्म किया, लेकिन यह भी सच है कि मैनेजर और मेंटर के तौर पर सदाशिवम ने उनकी लोकप्रियता और कामयाबी में बड़ी भूमिका निभाई.

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अपनी बेटी राधा के साथ सुब्बुलक्ष्मी.


फिल्मों में सुब्बुलक्ष्मी का आना
वो सदाशिवम ही थे, जिनकी कोशिशों से सुब्बुलक्ष्मी को 1938 में सेवासदनम फिल्म में मुख्य भूमिका के तौर पर डेब्यू मिला था. यह मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास पर बनी तमिल फिल्म थी, जो उस वक्त महिला सशक्तिकरण के लिहाज़ से काफी महत्ववपूर्ण साबित हुई थी. इस फिल्म की सफलता के बाद सुब्बुलक्ष्मी ने और भी कुछ फिल्मों में काम किया था.

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गांधी और नेहरू थे सुब्बुलक्ष्मी के फैन
असल में सुब्बुलक्ष्मी और उनके पति सदाशिवम आज़ादी की लड़ाई में भी अपने स्तर पर योगदान दिया करते थे. सुब्बुलक्ष्मी अपनी गायकी से होने वाली कमाई कस्तूरबा फाउंडेशन को सौंप देती थीं. इसी सिलसिले में उन्हें महात्मा गांधी के संपर्क में आने का मौका मिला था. महात्मा गांधी के शब्दों में :

अगर सुब्बुलक्ष्मी गीत को बोलों के साथ न भी गाए, सिर्फ सुरों में गाए या फिर गाए भी नहीं, सिर्फ उच्चारित ही कर दे, तो भी किसी और के गायन के बजाय मैं उसे सुनना ही पसंद करूंगा.


गांधी जी के कहने पर सुब्बुलक्ष्मी ने रातों रात एक भजन 'हरि तुम हरो' रिकॉर्ड करके उन तक पहुंचवाया था. इससे पहले, सुब्बुलक्ष्मी गांधी जी के प्रिय भजन 'वैष्णव जन' और 'रघुपति राघव राजाराम' भी गा चुकी थीं. (यहां सुनिए मीरा फिल्म का लोकप्रिय भजन 'हरि तुम हरो', सुब्बुलक्ष्मी की आवाज़ में)



यही नहीं, पहले प्रधानमंत्री बने जवाहरलाल नेहरू ने सुब्बुलक्ष्मी से कहा था 'मैं क्या हूं! एक अदना सी प्रधानमंत्री और इस संगीत की मल्लिका के आगे मेरी क्या हैसियत है'. अस्ल में, सुब्बुलक्ष्मी की आखिरी फिल्म मीरा ने उन्हें देशव्यापी पहचान दिलाई थी. 1945 में तमिल के बाद यह फिल्म 1947 में हिंदी में रिलीज़ हुई थी, जिसे नेहरू और माउंटबेटन ने कई नेताओं के साथ देखा था.

उस समय उदयपुर के महाराजा ने भी सुब्बुलक्ष्मी की मीरा फिल्म देखकर इस तरह तारीफ की थी कि इस कल्याणी राग के बदले में वो अपना पूरा साम्राज्य दे सकते थे और अपने हाथी घोड़े सब इस गायिका की सेवा में सौंप सकते थे. ख़ैर सुब्बुलक्ष्मी के किस्से और इतिहास इतना है कि कई किताबों में भी न समा सके.
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