नेपाल-चीन के बीच है खास सड़क, भारत के लिए बन सकती है परेशानी

नेपाल-चीन के बीच है खास सड़क, भारत के लिए बन सकती है परेशानी
चीन नेपाल मैत्री हाईवे के लिए प्रतीकात्मक तस्वीर. विकिकॉमन्स से साभार.

Ladakh में बॉर्डर पर India China Stand Off के चलते जिस तरह तनाव के हालात बने हैं, उस पूरे परिदृश्य में भारत को चौतरफा निगरानी की ज़रूरत पेश आती है. ऐसे में, 500 मील लंबे उस खास Highway पर नज़र रखना अहम है, जो China-Nepal के बीच आवाजाही का मुख्य ज़रिया रहा है.

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तिब्बत की राजधानी Lhasa से Nepal Border पर झांगमू (नेपाल में जिसे खासा कहते हैं) और Kodari तक आने वाली सड़क चीन नेपाल फ्रेंडशिप हाईवे (China Nepal Friendship Highway) के नाम से पुकारी जाती है. 800 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली यह सड़क चीन और नेपाल के बीच व्यापार का मुख्य ज़रिया है. चीन औेर नेपाल के बीच रिश्ते बढ़ाने वाले रूट पर भारत पहले भी चिंता दर्ज करा चुका है और यह सड़क सियासी गलियारों में फिर बेचैनी पैदा कर सकती है.

क्या है चीन नेपाल मैत्री हाईवे?
वास्तव में ये हाईवे दो अलग अलग सड़कों को मिलाने से तैयार होता है. G318 के रूप में मुख्य हाईवे ल्हासा से ल्हात्से तक का सफर करता है और फिर दक्षिण की तरफ घूमकर यह नेपाल बॉर्डर तक पहुंचता है. इस हाईवे का दूसरा हिस्सा ल्हात्से से तिब्बत के पश्चिम में गार स्थित नगारी तक पहुंचता है. ये हिस्सा केवल उन्हीं पर्यटकों के लिए काम आता है जो कैलाश पर्वत या मानसरोवर की यात्रा करते हैं.

यह हाईवे झेल चुका है 2015 का भूकंप
पांच साल पहले आए बड़े भूकंप में नेपाल और तिब्बत दोनों की सीमाओं में इस हाईवे को नुकसान पहुंचा था, जिसके कारण इसे एक साल से ज़्यादा समय तक के लिए बंद कर दिया गया था. 2016 में मरम्मत के बाद चीन और नेपाल के बीच व्यापार के लिए इसे खोला गया था और 2017 तक यह पर्यटकों के लिए खुल सका था.





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नेपाल चीन बॉर्डर पर बसा कस्बा कोडारी. चित्र विकिकॉमन्स से साभार.


इस हाईवे का रूट अहम है
ल्हासा से चलते हुए इस हाईवे पर कई दर्शनीय और पर्यटन स्थल हैं लेकिन भौगोलिक और रणनीतिक रूप से भी इस सड़क का काफी महत्व है. चुशूल में यारलुंग त्सांगपो यानी ब्रह्मपुत्र नदी और यारलुंग घाटी से क्रॉस होने वाला यह हाईवे शिगात्से से आगे चलने पर घाटी के समानांतर हो जाता है. ल्हात्से के आगे चापू के ठीक बाद चीन का नेशनल हाईवे 219 है. यह हाईवे चापू से ब्रह्मपुत्र और गंगा के डिवाइड को पार करते हुए ग्यात्सो ला पास से गुज़रता है.

माउंट एवरेस्ट की झलकियां भी इस हाईवे के रास्ते में हैं. बहरहाल, अरुण नदी के पठारों से होता हुआ यह हाईवे न्यालाम के बाद खासा की चढ़ाई चढ़कर खत्म होता है. यह हाईवे जहां खत्म होता है, वहां चीन और नेपाल के बॉर्डर पर फ्रेंडशिप ब्रिज बना हुआ है. बॉर्डर पर बने कस्बे कोडारी से यह हाईवे एक अलग सड़क के ज़रिये काठमांडू तक आता है, जिसे अर्निको राजमार्ग कहते हैं. यानी फ्रेंडशिप हाईवे और अर्निको हाईवे को जोड़ा जाए तो ल्हासा से काठमांडू तक का एक पूरा रूट तैयार होता है.


चीन और नेपाल के बीच व्यापार का रास्ता
यह हाईवे चीन और नेपाल के बीच व्यापार की लाइफलाइन है. 2015 में भूकंप के समय नेपाल की सीमा को भारत की तरफ से बंद कर दिया गया था और व्यापार भी सस्पेंड था. भूकंप के चलते फंसे नेपाल के लोगों ने उस समय कहा था कि अगर नेपाली नेताओं ने व्यापार के लिए सिर्फ एक देश यानी भारत पर निर्भरता नहीं रखी होती, तो उन्हें ऐसी मोहताजी नहीं देखना पड़ती. भारत के रास्ते बंद किए जाने का नतीजा देख चुके नेपाल ने भूकंप के बाद चीन के साथ व्यापार को इस हाईवे के ज़रिये ज़्यादा तवज्जो दी.

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भारत की नाराज़गी
चीन से संपर्क वाला यह हाईवे कोडारी कस्बे से नेपाल से जुड़ जाता है. कोडारी से काठमांडू तक के हाईवे को भौगोलिक राजनीति का मुद्दा बनाया गया था. नेपाल ने साफ किया था कि भारतीय सीमाओं से घिरा देश है और कोडारी हाईवे का समझौता केवल भारत पर निर्भरता कम करने के लिहाज़ से लिया गया. भारत ने इस पर ऐतराज़ जताया था. तब यूनाइटेड किंगडम में नेपाल के राजदूत ने कहा था :

नेपाल के चीन के साथ समझौते से भारत नाराज़ है. भारत को लगता है कि नेपाल चीन के कदमों में बिछ रहा है लेकिन ऐसा नहीं है. जब ​तक नेपाल में राजा महेंद्र का शासन है, नेपाल कभी कम्युनिस्ट राज्य नहीं बनेगा और न ही चीन का मोहरा.


बहरहाल, नेपाल ने हाल में नक्शा बदलकर और संविधान संशोधन कर सीमाओं के विवाद को जिस तरह ​हवा दी है और दूसरी तरफ, भारत और चीन बॉर्डर पर जिस तरह तनाव बना हुआ है, भारत के लिए ज़रूरी है कि वह चीन नेपाल हाईवे के बारे में इंटेलिजेंस और निगरानी रखे, ताकि चीन नेपाल के कंधे पर रखकर कोई बंदूक न चला सके.
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