जानें कैसे काम करती है नेपाल की संसद, नक्शे को कानून बना भी लिया तो क्या होगा

जानें कैसे काम करती है नेपाल की संसद, नक्शे को कानून बना भी लिया तो क्या होगा
नेपाल एक जमाने में डरा रहता था कि कहीं तिब्बत के बाद चीन उसके देश पर कब्जा ना कर ले. अब वो खुद जाकर चीन की गोदी में बैठ चुका है

नेपाल की संसद भी भारत की ही तरह दो सदनों की है. कोई भी कानून दोनों सदनों से दो-तिहाई बहुमत से पास कराना होता है. फिर ये मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास पहुंचता है. नेपाल के दोनों सदनों में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का बहुमत है. लेकिन असल सवाल ये भी है कि नक्शा संबंधी संविधान संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति मुहर भी लगा देती हैं तो उससे उसे कुछ खास नहीं हासिल होने वाला

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नेपाल की संसद ने नए राजनीतिक नक्शे से संबंधित दूसरा संविधान संशोधन विधेयक दोनों सदनों से पास करके राष्ट्रपति के पास भेज दिया है. अब ये देखना होगा कि नेपाल की राष्ट्रपति का रुख इस पर क्या होता है लेकिन नये राजनीतिक नक्शा को कानून का रूप देने के बाद भी नेपाल इस मामले में कुछ ज्यादा कर नहीं पाएगा.

पहले हम नेपाल की संसद के बारे में जानते हैं. पिछले दो दशक में नेपाल की संसद में कई बार बदलाव आए हैं. उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं. वर्ष 2015 में नया संविधान बनने के बाद अब नेपाल की पूरी तरह राजशाही से आजाद होकर गणराज्य बन चुका हैं. वैसे नेपाल की संसद और कानून का ढांचा लगभग वैसा ही है, जैसा भारत का.

नेपाल की संसद के भी दो सदन
नेपाल की संसद के दो हाउस हैं, एक निचला सदन और एक ऊपरी सदन. निचला सदन को प्रतिनिधि सभा कहा जाता है, ये करीब करीब लोकसभा की तरह है. असली ताकत इसी के पास निहित है लेकिन कोई भी कानून बनाने के लिए इसे ऊपरी सदन यानि राष्ट्रीय सभा पर आश्रित रहना पड़ता है. जब भी कोई विधेयक लाया जाता है तो जरूरी होता है कि नेपाल के दोनों सदन उसे दो-तिहाई बहुमत से पास करें.
दोनों सदनों से पारित होने के बाद विधेयक का क्या होता है


इसके बाद विधेयक को राष्ट्रपति को भेजा जाता है. संविधान के अनुसार राष्ट्रपति का दर्जा नेपाल सरकार में सबसे ऊपर है, वो सेना के सभी अंगों का सुप्रीम कमांडर है लेकिन असली शक्तियां प्रधानमंत्री के पास होती हैं. कोई भी प्रस्ताव अगर राष्ट्रपति के पास जब दोनों सदनों से पारित होकर आता है, तो उसे एक हफ्ते के भीतर उसे फैसला ले लेना चाहिए या उसे वापस लौटा देना चाहिए. अगर राष्ट्रपति ने दोनों सदनों से होकर आए विधेयक पर अपनी मुहर लगा दी तो वो कानून बन जाता है.

नेपाल की प्रतिनिधि सभा, जहां नक्शा संविधान संशोधन विधेयक भारी बहुमत से पास हो गया


क्या है नेपाल की संसद की सियासी तस्वीर
वैसे अगर नेपाल की सियासी तस्वीर देखें तो वहां दोनों सदनों में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का बहुमत है. निचला सदन यानि प्रतिनिधि सभा में 275 सदस्य होते हैं. जिस पार्टी के 174 सदस्य होते हैं, वो सरकार बना सकती है. निचले सदन में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के ठीक 174 सदस्य ही हैं. यानि वो काफी नाजुक स्थिति में है. जो खबरें नेपाल से आती रहती हैं, उसके अनुसार सत्तारूढ़ पार्टी में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को लेकर अक्सर असंतोष की खबरें आती रही हैं.

निचले और ऊपरी सदन में स्थिति
निचले सदन में विपक्ष में नेपाल कांग्रेस के पास 63 सदस्य हैं तो जनता समाजवादी पार्टी, नेपाल के 34. वहीं ऊपरी सदन यानि राष्ट्रीय सभा में 59 सदस्य होते हैं. इसमें 56 सदस्य नेपाल के सात राज्यों से चुनकर आते हैं और तीन राष्ट्रपति के जरिए नामित होते हैं. राष्ट्रीय सभा में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के 50 सदस्य हैं यानि बंपर बहुमत.

ये नेपाल की राष्ट्रपति बिंदिया देवी भंडारी हैं. नेपाल में राष्ट्रपति संवैधानिक तौर पर देश का मुखिया होता है. नक्शा संशोधन विधेयक दोनों सदनों से पारित होने के बाद उनके पास पहुंच गया है. अब इस पर उनके फैसले का इंतजार है


राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होती है
अब नेपाल का नक्शा संबंधी संशोधन विधेयक दोनों सदनों द्वारा भारी बहुमत से पारित होने के बाद राष्ट्रपति बिंदिया देवी भंडारी के पास पहुंचा है. बिंदिया काफी अनुभवी नेता रही हैं. वो पांच साल पहले राष्ट्रपति बनने से पहले नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की शीर्ष नेताओं में थीं. टाइम उन्हें दुनिया की सबसे ताकतवर महिलाओं की सूची में 52 नंबर पर रख चुका है. अंदाज यही है कि राष्ट्रपति इस नक्शा विधेयक पर मुहर लगा देंगी और ये कानून का रूप ले लेगा.

अगर नक्शा कानून बन भी गया तो क्या होगा
अब असल सवाल ये है कि अगर नेपाल ने अपने नए पालिटिकल मैप को कानूनी जामा पहना दिया तो क्या होगा. उसका जवाब है-कुछ नहीं. भारत के बहुत से इलाकों को पाकिस्तान अपने राजनीतिक नक्शे में दिखाता रहा है और भारत अपने. इसी तरह चीन और भारत के बीच स्थिति है. अब यही स्थिति नेपाल और भारत की होगी. पाकिस्तान और चीन के साथ भारत का सीमा विवाद देश के आजाद होने के बाद से ही चल रहा है. जिस देश का जहां पर कब्जा है, वही स्थिति यथावत बनी हुई है.

बातचीत की टेबल पर आना ही होगा
कहा जा सकता है कि नेपाल अपने नक्शे में भारत नियंत्रित कुछ इलाकों को बेशक शामिल कर ले लेकिन उसे इस मामले को सुलझाने के लिए बातचीत की टेबल पर आना ही होगा. हां, इसे लेकर सीमा पर जहां ये विवादित स्थल हैं, वहां पर तनाव की स्थिति बनती रहेगी. इससे ज्यादा कुछ नहीं होगा. नेपाल का ये कदम प्रतीकात्मक और अपने देश की अंदरूनी राजनीति और अंसतोष से निपटने के लिए ज्यादा लगता है.

नेपाल ने दोस्ती नहीं रखने का संकेत दे दिया है
रही बात अंतरराष्ट्रीय दबाव की, तो इसका कोई असर नहीं पड़ता. ये हम ग्लोबल पालिटिक्स और देशों के बीच होने वाली राजनीति के अलावा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन मामलों को उठाने के बाद होने वाले हश्र के तौर पर देख ही रहे हैं. हां, ये कह सकते हैं कि इसके जरिए नेपाल ने दो संदेश दिए हैं-पहला ये कि अब वो भारत की परवाह नहीं करता और दूसरा ये भारत के साथ दोस्ती वाला दर्जा उसे रास नहीं आ रहा. अपने हितों के लिए वो चीन की ओर झुकना चाह रहा है.

इसका परिणाम क्या होगा
बेशक चीन इस समय बड़े पैमाने पर नेपाल में निवेश कर रहा होगा. नेपाल इसी के चलते बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट के लिए चीन के साथ भी हो लेकिन चीन के मोटे कर्ज में डूबने के बाद तमाम देशों की हालत अब हम देख ही रहे हैं. भारत ने तो 70 सालों में नेपाल को बहुत सस्ते या मुफ्त में सामानों की आपूर्ति के साथ समय समय पर मदद की है लेकिन चीन से ऐसी मदद उसके लिए मुश्किल और महंगी ही होगी. आज भी भारत तमाम तनाव के बाद भी उसके लिए रोजाना की लाइफ लाइन बना हुआ है.

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