हर्ड इम्यूनिटी पर ​नई रिसर्च : कोविड 19 थमने में दो साल तो लगेंगे

हर्ड इम्यूनिटी पर ​नई रिसर्च : कोविड 19 थमने में दो साल तो लगेंगे
भारत में कुछ इलाकों में लॉकडाउन में ढील दी गई है. फाइल फोटो.

न्यूज़18 ने आपको पहले बताया था कि क्या होती है ​हर्ड इम्यूनिटी और भारत में क्यों थ्योरी दी गई कि कोरोना वायरस पर काबू के लिए यही रास्ता है. अब विशेषज्ञों ने इस थ्योरी को दुनिया भर के लिए ज़रूरी माना है. जानिए कि वैश्विक महामारी का दूसरे दौर को लेकर क्या चेतावनियां हैं और क्या वाकई यह थ्योरी कारगर है?

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दुनिया में कोरोना वायरस (Corona Virus) से अब तक 34 लाख से ज़्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं और 2 लाख 44 हज़ार से ज़्यादा जानें जा चुकी हैं. क्या इससे भी खराब स्थिति और कोई हो सकती है? एक नई रिसर्च (New Research) में चेतावनी दी गई है कि महामारी (Pandemic) का दूसरा दौर आना तय है, जो और घातक हो सकता है. साथ ही, कहा गया है कि महामारी को थमने में कम से कम दो साल का वक्त तो लगेगा ही.

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हर्ड इम्यूनिटी (Herd Immunity) को लेकर हुई इस नई रिसर्च में दावा किया गया है कि कोविड 19 (Covid 19) महामारी पर तब तक काबू नहीं पाया जा सकेगा, जब तक दुनिया की करीब 70 फीसदी आबादी संक्रमित (Infection) होकर या किसी तरह से वायरस के खिलाफ इम्यूनिटी विकसित नहीं कर लेगी. और इस प्राकृतिक प्रक्रिया में दो साल का समय लगने का आंकलन किया गया है. इस बारे में दिलचस्प पहलुओं के साथ ही ये भी जानें कि इस थ्योरी में कितना दम है.



रिसर्च : दूसरा दौर आएगा
अमेरिका की मिनेसॅटा यूनिवर्सिटी के संक्रामक रोग रिसर्च केंद्र के शोधकर्ताओं ने 300 साल के इतिहास में फ्लू संबंधी बड़ी महामारियों को लेकर अध्ययन किया. सीबीएस न्यूज़ और अटलांटा जर्नल में प्रकाशित खबरों के मुताबिक रिसर्च में पाया गया कि पहले दौर के छह महीने के बाद तकरीबन हर महामारी का दूसरा दौर आता है, जो ज़्यादा घातक साबित होता है. करीब दो सालों तक और भी दौर आते हैं, लेकिन बाद के दौर अपेक्षाकृत कम असरकारी होते हैं.

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हर्ड इम्यूनिटी के लिए आबादी के बड़े हिस्से को संक्रमित होकर वायरस के खिलाफ प्रतिरोध क्षमता पैदा करना होती है. फाइल फोटो.


अभी तो बहुत कम है हर्ड इम्यूनिटी!
रिपोर्ट में कहा गया है कि महामारी का समय डेढ़ से दो साल तक का होता ही है क्योंकि हर्ड इम्यूनिटी विकसित होने में इतना समय लग ही जाता है. मौजूदा कोविड 19 के मामले में 60 से 70 फीसदी आबादी में इम्यूनिटी विकसित होने में दो साल तो लगेंगे ही क्योंकि अभी दुनिया में सिर्फ 34 लाख संक्रमण मामले हैं, जो कि कुल आबादी का बहुत छोटा हिस्सा है.

मुश्किल वक्त के लिए रहें तैयार
वैज्ञानिकों को हालांकि अभी यह नहीं पता है कि एक बार कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाला व्यक्ति क्या भविष्य के लिए इम्यून हो जाएगा या उसकी यह इम्यूनिटी कितने समय की होगी. दूसरी ओर, सीडीसी के निदेशक रॉबर्ट रेडफील्ड पहले ही चेता चुके हैं कि महामारी के दूसरे दौर के लिए तैयार रहें क्योंकि यह पहले दौर से ज़्यादा जानलेवा साबित हो सकता है.

अब सवाल हर्ड इम्यूनिटी थ्योरी पर
इससे पहले भारत में हर्ड इम्यूनिटी के आधार पर ही संक्रमण पर काबू पाए जाने की थ्योरी दी गई थी. भारतीय वैज्ञानिकों ने कहा था कि भारत की करीब 60 फीसदी आबादी को संक्रमित होकर वायरस के खिलाफ इम्यूनिटी विकसित करना होगी. लेकिन हर्ड इम्यूनिटी की थ्योरी पर सवाल खड़े करते हुए फॉरेन पॉलिसी की रिपोर्ट कहती है कि यह थ्योरी विवादित है जिसे यूके पहले ही खारिज कर चुका है.

बगैर वैक्सीन यह संभव नहीं
हर्ड इम्यूनिटी को बगैर वैक्सीन के नामुमकिन करार देते हुए यह रिपोर्ट कहती है कि इससे हेल्थ सिस्टम ध्वस्त हो जाएगा और वायरस से मौतों की दर बढ़ेगी. भारत जैसे युवा आबादी वाले गरीब देशों में यह थ्योरी इसलिए कारगर नहीं होगी क्योंकि :

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न्यूज़18 क्रिएटिव


1: अव्वल तो विशेषज्ञों को ही कोविड 19 की इम्यूनिटी के बारे में ज़्यादा पता नहीं है कि यह कितने समय तक रहेगी या इससे कितनी सुरक्षा मिलेगी और क्या दोबारा संक्रमण होगा या नहीं.
2: भारत के लिए यह थ्योरी अनुमान के चलते दी गई है क्योंकि माना गया है कि यहां की ज़्यादातर आबादी युवा है इसलिए संक्रमण को झेल जाएगी और गंभीर स्थिति नहीं होगी.
3: अंतत: हर्ड इम्यूनिटी को एकमात्र रणनीति के तौर पर मान्यता नहीं दी जा सकती. स्वास्थ्य प्रणाली की क्षमता, ज़्यादा टेस्टिंग, प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर सहयोग, हाई रिस्क से आबादी की सुरक्षा और अन्य ज़रूरी उपायों के साथ जब तक मज़बूत तंत्र तैयार न हो, हर्ड इम्यूनिटी भरोसे लायक रणनीति नहीं है.

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