होम /न्यूज /नॉलेज /क्या है NMC बिल, आखिर डॉक्टर क्यों कर रहे हैं इसका विरोध

क्या है NMC बिल, आखिर डॉक्टर क्यों कर रहे हैं इसका विरोध

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन NMC बिल के विरोध में है.

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन NMC बिल के विरोध में है.

नेशनल मेडिकल कमीशन बिल राज्यसभा में भी पास हो गया है, लेकिन इसका अमेंडमेंट लोकसभा से फिर पास होना है. जानते हैं कि क्या ...अधिक पढ़ें

    देश में डॉक्टरों की कमी का मुद्दा हमेशा से रहा है, लेकिन इस दिशा में सुधार हो रहे हैं. फिर भी सवाल बना हुआ है कि किस गति से. गांवों में आज भी डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है, जिसके चलते स्वास्थ्य सुधार की मुहिम के आंकड़े मज़बूत नहीं हैं. इसी से संबंधित नेशनल मेडिकल कमीशन बिल यानी एनएमसी बिल राज्यसभा से भी पास हो गया है लेकिन अमेंडमेंट होने के कारण अभी इसे लोकसभा से दोबारा पास करवाना होगा. अगर ये बिल कानून बना तो कम्युनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स यानी सीएचपी के लिए लाइसेंसी व्यवस्था होगी,  जानते हैं कि क्या है ये बिल और क्यों डॉक्टरों का एक वर्ग इसका ​विरोध कर रहा है.

    पढ़ें : कौन और कैसे हैं नए विप्रो प्रमुख रिशाद प्रेमजी

    अगर एनएमसी बिल कानून बन जाता है तो सीएचपी को प्राथमिक स्वास्थ्य की दिशा में आधुनिक इलाज की प्रैक्टिस करने का हक मिलेगा, जो अब तक सिर्फ एमबीबीएस डिग्रीधारकों के पास ही था. आख़िर इस तरह के कानून की ज़रूरत के पीछे क्या कहानी है? और गांवों में स्वास्थ्य सुधार को लेकर आंकड़े क्या हालात दर्शाते हैं?

    कुछ ऐसे हैं हालात
    विश्व स्वास्थ्य संगठन के हिसाब से प्रति हज़ार मरीज़ों पर एक डॉक्टर होना आदर्श अनुपात है, लेकिन भारत में 1596 मरीज़ों पर एक डॉक्टर है. ज़ाहिर है ये सिर्फ ओवरव्यू है, ग्रामीण इलाकों में तो हालत और खराब हैं. क्वालिफाइड डॉक्टर शहरों में प्रैक्टिस करने में यकीन रखते हैं इसलिए गांवों में अच्छे डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है. स्वास्थ्य क्षेत्र में मानव संसाधन की भारी कमी के चलते दो राज्यों ने पहल की थी, जिसकी तर्ज़ पर और राज्य भी आगे बढ़े.

    ज़रूरी जानकारियों, सूचनाओं और दिलचस्प सवालों के जवाब देती और खबरों के लिए क्लिक करें नॉलेज@न्यूज़18 हिंदी

    indian doctors, india health data, india rural health report, national medical commission bill, new law, भारतीय डॉक्टर, भारत स्वास्थ्य आंकड़े, भारत ग्रामीण स्वास्थ्य डेटा, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल, नया कानून
    ग्रामीण स्वास्थ्य पर आई एक रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश में सबसे खराब हालात की बात सामने आई थी. (फाइल फोटो)


    डिप्लोमा ने सुधारा हेल्थ रिपोर्ट कार्ड
    मध्य प्रदेश से अलग होकर 2001 में बने राज्य छत्तीसगढ़ के हिस्से में उस समय सिर्फ एक मेडिकल कॉलेज आया था और बहुत कम डॉक्टर. ऐसे में स्वास्थ्य समस्याओं से जूझने के लिए छत्तीसगढ़ ने प्राथमिक स्वास्थ्य की दिशा में सुधार के लिए तीन साल का डिप्लोमा कोर्स शुरू किया था और डिप्लोमाधारकों को ग्रामीण मेडिकल असिस्टेंट के तौर पर भर्ती किया था. इसी तरह, असम में 2005 में साढ़े तीन साल के कोर्स को पास करने वालों को कम्युनिटी हेल्थ वर्कर के तौर पर भर्ती किए जाने का सिलसिला शुरू हुआ. इन कोशिशों का नतीजा ये हुआ कि दोनों राज्यों में ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर सामान्य से ज़्यादा काबू पाया गया.

    ग्रामीण क्षेत्रों में बुखार, डायरिया, पेट दर्द, संक्रमण जैसी बीमारियों के साथ ही, मलेरिया, डेंगू, टाइफाइड जैसी बीमारियां आम तौर से देखी जाती हैं. इसके साथ ही, नॉर्मल डिलीवरी के लिए बेहतर व्यवस्थाओं पर इस कार्यक्रम के तहत ज़ोर दिया गया. फलस्वरूप असम के ग्रामीण क्षेत्रों में बने मेडिकल सब सेंटरों में जहां 2010 में नॉर्मल डिलीवरी की दर दस फीसदी थी, वह 2013 में 93 फीसदी तक पहुंची.

    इन दो राज्यों के अलावा महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जैसे अति पिछड़े ग्रामीण इलाके में भी इस तरह की शुरुआत की गई. हिमाचल प्रदेश के गांवों में भी इस तरह की कोशिशें हुईं, जिसके नतीजे बेहतर दिखाई दिए.

    कई देशों में प्रचलित है ये तरीका
    गांवों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य कार्यकताओं या डिप्लोमा वाले डॉक्टरों को पहुंचाने का तरीका कई देशों में कारगर​ सिद्ध हुआ है. चीन में 1960 के दशक में इस तरह का स्वास्थ्य सुधार ढांचा बनाया गया था. नतीजा ये है कि अब हर गांव में कम से कम एक डॉक्टर 15 मिनट की वॉकिंग दूरी पर हमेशा उपलब्ध है. इसी तरह क्यूबा में इन डॉक्टरों को 'क्रांतिकारी डॉक्टर' नाम दिया गया. यहां दुनिया की सबसे बेहतर जीवन दर है यानी यहां औसत उम्र 80 साल है.

    indian doctors, india health data, india rural health report, national medical commission bill, new law, भारतीय डॉक्टर, भारत स्वास्थ्य आंकड़े, भारत ग्रामीण स्वास्थ्य डेटा, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल, नया कानून
    गांवों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य कार्यकताओं का तरीका कई देशों में कारगर​ सिद्ध हुआ.


    इनके अलावा फिलीपींस और थाईलैंड में ग्रामीण स्तर पर ट्रेंड स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और स्थानीय सामुदायिक डॉक्टरों की सेवाएं चलन में हैं.

    भारत में पहले था ये सिस्टम
    आज़ादी से पहले भारत में भी ये सिस्टम था. एमबीबीएस डॉक्टर बहुत कम होते थे और लाइसेंसी डॉक्टर ज़्यादा. लाइसेंसी डॉक्टरों के लिए साढ़े तीन साल की पढ़ाई लाज़िमी होती थी, जबकि एमबीबीएस के लिए साढ़े पांच साल का कोर्स था. 1946 में भोरे समिति की रिपोर्ट बताती थी कि उस समय देश में कुल 47 हज़ार 524 पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनर थे जिनमें से साढ़े 17 हज़ार एमबीबीएस और करीब 30 हज़ार लाइसेंसी थे. इसी समिति ने लाइसेंसियों को प्रतिबंधित किए जाने का फैसला किया था.

    तो क्यों हो रहा है विरोध?
    इस बात पर तो कोई दोराय नहीं है कि गांवों तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने और डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने की ज़रूरत है. अब जो एनएमसी बिल लोकसभा में पास हुआ है, उसके ज़रिए सीएचपी व्यवस्था लागू हो सकेगी. ऐसे में, भारतीय मेडिकल एसोसिएशन और रेज़ीडेंट डॉक्टरों के संगठन इस​ बिल के विरोध में हैं. उनका कहना है कि इस तरह के कानून से ग्रामीण भारत में खराब क्वालिटी के यानी कम प्रशिक्षित डॉक्टर पहुंचेंगे, जिससे स्वास्थ्य सुधार नहीं बल्कि खतरा होगा.

    ये भी पढ़ें: 24 साल पहले आज ही के दिन बजा था पहला मोबाइल फोन, ये हुई थी बातचीत


    आख़िर खुदकुशी क्यों करते हैं लोग?

    Tags: Doctor, Health, Health News, Medical, Medical bill

    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज

    अधिक पढ़ें