कौन हैं नीमा तेंजिन, जिन्हें तिरंगे और तिब्बती झंडे में लपेटकर दी गई अंतिम विदाई

कौन हैं नीमा तेंजिन, जिन्हें तिरंगे और तिब्बती झंडे में लपेटकर दी गई अंतिम विदाई
नीमा तेंजिन को श्रद्धां​जलि देते राम माधव.

India-China Stand-Off: पूर्वी लद्दाख (Eastern Ladakh) में भारत और चीन करीब चार महीनों से सीमा तनाव (Border Tension) के हालात में हैं. दोनों देशों के बीच कई स्तरों की बातचीत (India-China Talks) बेनतीजा रह चुकी है. ऐसे में चुशूल सेक्टर में पैंगोंग त्सो झील (Pangong Tso Lake) के पास चीनी सैनिकों को खदेड़ने में तेंजिन का शहीद होना एक साझा संस्कृति की कहानी है.

  • News18India
  • Last Updated: September 9, 2020, 7:44 AM IST
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भारत माता की जय... जय तिब्बत... विकास रेजिमेंट (Vikas Battalion) ज़िंदाबाद... इन नारों के साथ ही बंदूकों से हवाई फायर हुए और एक सैनिक की अंतिम विदाई पर उसे पूरे सैन्य सम्मान (Army Customs) से नवाज़ा गया. कोई सैनिक शहीद होता है, तो उसे यह सम्मान मिलता ही है, तो इसमें खास बात क्या है? खास बात यह है कि लद्दाख में भारत की सीमाओं (Line of Actual Control) की रक्षा करते हुए शहीद होने वाला यह सैनिक अस्ल में, तिब्बती शख्स (Indo-Tibetan Soldier) सूबेदार नीमा तेंजिन था.

नीमा तेंजिन ने पैंगोंग त्सो झील के दक्षिणी किनारे पर भारतीय सीमा की हिफाज़त के लिए चीनी सैनिकों का सामना किया और पिछले हफ्ते इस इलाके में हुए हिंसक संघर्ष में नीमा ने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया. नीमा के अंतिम संस्कार के लिए भाजपा नेता राम माधव लद्दाख पहुंचे और कहा कि उनका बलिदान ज़ाया नहीं जाएगा. सूबेदार नीमा तेंजिन और उनकी तैनाती जिस एसएफएफ में थी, उसके बारे में कुछ ज़रूरी बातें जानना चाहिए.

दो झंडों में लपेटे गए नीमा
लद्दाख के चुशूल सेक्टर में पैंगोंग त्सो के पास अहम इलाके से चीनी सेना को खदेड़ने के लिए भारती आर्मी ने जो अहम ऑपरेशन बीते 29 व 30 अगस्त की रात चलाया था, उसमें सूबेदार नीमा शहीद हुए. बीते सोमवार को एस्टैब्लिशमेंट 22 के नाम से जानी जाने वाली 7 SFF की 7 विकास बटालियन के इस जांबाज़ सैनिक को जब अंतिम विदाई दी गई तो तिरंगे के साथ ही नीमा के पार्थिव शरीर को तिब्बती झंडे में लपेटा गया.
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तिब्बती रिफ्यूजी थे नीमा
भारत के लिए जान देने वाले नीमा को भारतीय ही कहना उचित है, लेकिन उनका संबंध उस तिब्बती रिफ्यूजी समुदाय से था, जो चीन की ज़्यादतियों के चलते 1962 के भारत चीन युद्ध के बाद भारत आ बसे थे. यही नहीं, नीमा और उनका समुदाय भारत को ही अपना घर मानते रहे. अंतिम संस्कार के स्थान से जो वीडियो सामने आए, उनके मुताबिक SFF के एक ट्रक में नीमा के पार्थिव शरीर को लेह में स्थित सोनमलिंग तिब्बती रिफ्यूजी शिविर ले जाया गया था.

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हिमाचल में भी दी गई विदाई
51 वर्षीय सैनिक नीमा को लद्दाख में अंतिम संस्कार के दौरान बंदूकों की सलामी दी गई और इस दौरान उनके समुदाय ने भारत और तिब्बत दोनों भूमियों की जयकार की. अंतिम संस्कार बौद्ध रीतियों और मंत्रों के साथ हुआ. लद्दाख के अलावा हिमाचल प्रदेश के मैकलॉडगंज में भी नीमा को श्रद्धांजलि देने के लिए एक कैंडल मार्च निकालकर लोगों ने कमांडो नीमा को अलविदा कहा.

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एसएफएफ के बारे में भी जानिए
नीमा तेंजिन जिस सुरक्षा यूनिट के सदस्य थे, उस स्पेशल फ्रंटियर फोर्स का गठन 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध के बाद किया गया था. उस समय हज़ारों तिब्बती रिफ्यूजी चीन की यातनाओं से आहत होकर भारत पहुंचे थे. भारत में उन्हें आश्रय के साथ ही सुरक्षा में अहम भूमिका देने के लिए SFF का गठन किया गया था. हालांकि, बाद में यह केवल तिब्बतियों की यूनिट नहीं रह गई.

कई तरह के मिलिट्री ऑपरेशनों में SFF अहम भूमिका निभा चुकी है. पुरुषों व महिलाओं दोनों को समाहित करने वाली इस यूनिट ने 1971 के युद्ध से लेकर 1999 के कारगिल युद्ध तक काफी अहम ज़िम्मेदारियां निभाई हैं. इस यूनिट की सात बटालियन हैं और यह सीधे कैबिनेट सचिवालय के अंतर्गत है, जो भारतीय आर्मी के साथ मिलकर काम करती है. आर्मी के मेजर जनरल रैंक अफसर को इस यूनिट में आईजी के तौर पर मुखिया बनाया जाता है.
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