क्या है पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट का मकसद और क्या यह कामयाब होगा?

मरियम नवाज़ और बिलावल भुट्टो एक मंच पर.
मरियम नवाज़ और बिलावल भुट्टो एक मंच पर.

घोर विरोधी रहे भुट्टो और शरीफ (Bhuttos & Sharifs) सुर में सुर मिलाकर खड़े हुए हैं और पाकिस्तानी आर्मी (Pakistan Army) की कठपुतली इमरान खान सरकार (Imran Khan Government) को कोस रहे हैं, लेकिन क्या सेना के सामने टिक सकेंगे? हां, तो कैसे और कितनी देर?

  • News18India
  • Last Updated: October 29, 2020, 10:02 AM IST
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पाकिस्तान में हालांकि लोकतांत्रिक सरकार (Democracy in Pakistan) है, लेकिन यह साफ तौर पर माना जाता है कि आर्मी की कठपुतली (Army Controlled Government) से ज़्यादा अब भी नहीं है. कई विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि आर्मी के चंगुल से मुक्त लोकतंत्र पाकिस्तान में बहाल नहीं है. इसी मुद्दे को केंद्र में रखकर सितंबर 2020 में पाकिस्तान की 11 सियासी पार्टियों (Pakistan Political Parties) ने एक मोर्चा बनाया और ऐसा पहली बार हुआ कि पाकिस्तान की दो प्रमुख विरोधी पार्टियां एकजुट हुईं. इस मोर्चे को पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (Pakistan Democratic Movement) का नाम दिया गया है.

जमीअत उलेमा ए इस्लाम के नेता फज़ल उर रहमान ने जो PDM बनाया, उसमें बिलावल भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और फिलहाल नवाज़ शरीफ की बेटी मरयम नवाज़ की अगुवाई वाली पाकिस्तान मुस्लिम लीग का शामिल होना बड़ी खबर रही. इसके बावजूद, इस मूवमेंट को लेकर भारत में काफी कम रुझान देखा गया. जानिए कि यह मोर्चा कैसे और किस मक़सद की तरफ आगे बढ़ने की तैयारी में है.

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कितना अहम है ये मूवमेंट?
भुट्टो और शरीफ के एकजुट होने की वजह से यह पाकिस्तान सरकार के खिलाफ अहम लामबंदी है. इसके अलावा, इसकी अहमियत ये भी है ​कि बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के क्षेत्रीय नेता और पार्टियां इस मोर्चे से जुड़ी हैं, जिन्हें पाकिस्तानी आर्मी क्षेत्रीय स्वायत्तता की मांग पर निशाना बना चुकी है. अहम बात यह भी है कि यह मूवमेंट पंजाब के गुजरांवाला, कराची और क्वेटा में हाल में महत्वपूर्ण रैलियां भी कर चुका है.

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जमीयत उलेमा के नेता मौलाना फज़ल उर्रहमान.


भारत के पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने एक अंग्रेज़ी दैनिक में हाल ही “The ferment next door” शीर्षक से लिखे ​लेख में कहा कि यह पहली बार हुआ है कि सियासत में हाशिये पर रखे गए पंजाबी हिस्से को तवज्जो और जुड़ाव मिला है. सरन के ही मुताबिक :

एक खास राजनीतिक हलचल शुरू होती है और समर्थन की ताकत जुटाती है, तो माना जा सकता है कि पाकिस्तानी शासन व्यवस्था के हिसाब से यह महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है और यह भी देखना चाहिए कि यह कैसे भारत समेत अन्य देशों के साथ जुड़ाव कायम करती है.


ताकत ही कमज़ोरी है?
एक तरफ, इस मूवमेंट ने प्रधानमंत्री इमरान खान को सियासी तौर पर अलग थलग करके रख देने का रुख अपनाया है, तो दूसरी तरफ, खान की सरपरस्त आर्मी की विश्वसनीयता पर भी लांछन लगाने शुरू किए हैं. PDM ने यह कामयाबी भी हासिल कर ली है कि वो मौजूदा सरकार और आर्मी के दखल के खिलाफ तमाम असंतुष्ट पार्टियों को एक मंच पर ला सकी है. लेकिन, सरन के मुताबिक PDM की यही एकजुटता जहां उसकी ताकत दिखाई दे रही है, वास्तविक कमज़ोरी भी साबित होगी.

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क्या है PDM का असली मकसद?
भ्रष्टाचार के केसों में फंसे नवाज़ शरीफ लंदन से अपने भाषण में साफ तौर पर आर्मी प्रमुख कमर जावेद बाजवा और आईएसआई प्रमुख फैज़ हमीद को निशाना बना चुके हैं. शरीफ साफ कह चुके हैं कि आर्मी के खिलाफ आंदोलन छेड़ा जा चुका है, जो यह हौसला और संभावना रखता है कि वो पाकिस्तान सत्ता में आर्मी के नाजायज़ दबाव और प्रभाव को उखाड़ फेंके. सरन ने भी माना है कि राजनीतिक एकजुटता, सत्ता में वापसी के साथ ही इस मूवमेंट का असली मकसद पाकिस्तान की ताकतवर आर्मी को सत्ता से बेदखल करना है.

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क्या कामयाब हो पाएगा PDM?
सेना के खिलाफ विपक्ष के एकजुट होने का इतिहास पाकिस्तान में पुराना है. 1960 के दशक में अयूब खान के खिलाफ हो या 1980 के दशक में ज़िया उल हक़ के विरुद्ध, इसके साथ ही, इस तरह के विपक्ष गठजोड़ जुल्फिकार अली भुट्टो की लोकतांत्रिक सरकार तक के खिलाफ बनते रहे हैं. इनका सीधा लेना देना इस बार के मोर्चे से नहीं है लेकिन कुछ समानताओं के कारण कहा जा रहा है कि इस मूवमेंट के सामने चुनौतियां काफी होंगी.

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न्यूज़18 क्रिएटिव


* हो सकता है कि PDM बार बार नाम लेकर आरोप लगाने की रणनीति से एक माहौल बना सके, लेकिन यह दबाव क्या काफी होगा? जब अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था, तब जनरल अशफाक परवेज़ कयानी के खिलाफ भी आलोचना और बगावत जैसे मुद्दे खड़े थे, लेकिन उनका भी कुछ नहीं बिगड़ा था.
* कई पार्टियों को एकजुट करना तो ठीक है लेकिन मूवमेंट को बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी.
* एक चुनौती यह भी होगी कि पाकिस्तान में कोविड 19 की दूसरी लहर और ज़्यादा कहर न ढाए इस​के लिए ध्यान रखना होगा कि PDM की रैलियां और गतिविधियां किस तरह आयोजित हों.
* पाकिस्तान से भाग चुके शरीफ ने जिस तरह बाजवा और फैज़ का नाम लेकर सीधे आलोचना कर दी है, वो दांव उल्टा भी पड़ता दिख रहा है. विशेषज्ञों के मुताबिक पाकिस्तान में ऐसा कदम 'मेरी बिल्ली मुझी से म्याऊं' कहावत जैसा है. शरीफ के बयान से उनकी पार्टी के साथ ही PDM भी अब डैमेज कंट्रोल मोड में आ गई है.

कुल मिलाकर स्थिति यह है कि पीएम इमरान खान चेतावनी दे चुके हैं कि PDM के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है. तो, यह चैलेंज भी मोर्चे के सामने है कि वो उस देश में, जहां सेना के हाथ में शक्ति का केंद्र है, वहां सैन्य दमन या सरकारी प्रतिबंधों से बच सके या देर तक लड़ सके.
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