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पराली जलने से दिल्ली में कैसे छा जाती है ज़हरीली और काली धुंध?

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Updated: October 31, 2019, 9:06 PM IST
पराली जलने से दिल्ली में कैसे छा जाती है ज़हरीली और काली धुंध?
न्यूज़18 क्रिएटिव

दिल्ली (Delhi) की हवा की क्वालिटी (AQI) खराब होने की खबरों के बीच जानें कि कैसे होती है ये समस्या और क्यों इस पर काबू पाना मुश्किल रहा है.

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  • Last Updated: October 31, 2019, 9:06 PM IST
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नई दिल्ली. दिल्ली की सीमा से जुड़े प्रदेशों के किसानों के पराली जलाने के बाद दिल्ली, एनसीआर (NCR) और आसपास के शहरों की हवा ज़हरीली (Air Pollution) हो जाने की खबरें आप तक पहुंच रही हैं. दिल्ली में हवा की क्वालिटी (Air Quality) के लिहाज़ से यह साल का वो वक्त है जब दिल्ली में हवा सबसे ज्यादा प्रदूषित होने लगती है. लोग नाक और मुंह पर मास्क लगाने को मजबूर हो जाते हैं. माना जा रहा है कि एक बार फिर लोग सांस और आंखों की समस्याओं की चपेट में आएंगे. पिछले तीन सालों से दिल्ली की ये काली धुंध (Black Smog) दुनिया भर में सुर्खियों में रही है. इन हालात में दीवाली (Diwali) की आतिशबाज़ी से समस्या और बढ़ती है. आइए जानें कि क्या और कितनी विकराल है ये समस्या.

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दिल्ली के काले कोहरे की वजह
मानसून के खत्म होने के बाद से सर्दियों के आगमन के साथ ही दिल्ली सहित उत्तर भारत में हवा स्थिर हो जाती है. ऐसे में जब पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के इलाकों में किसान पराली जलाते हैं तो वह धुंआ कहीं न जाकर इसी वातावरण में रह जाता है और हवा की नमी के साथ भारी होने के साथ ही उत्तर भारत पर एक मोटी परत के तौर पर फैल जाता है.

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पिछले कुछ सालों से कोहरे की इस परत में सर्दियों की शुरुआत में दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों के लोग जीने को मजबूर हैं. इस साल भी एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च के अनुसार दिल्ली में हवा की क्वालिटी बेहद खराब हो चुकी है. हालांकि दिल्ली में खराब हवा का यह एकमात्र कारण नहीं है. बढ़ते वाहन और दूसरी वजहें भी हैं लेकिन आसपास के राज्यों में पराली का जलाया जाना दिल्ली के वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण जरूर माना जाता है.

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कोशिशें हुईं लेकिन नाकाम क्यों रहीं?
पराली जलाए जाने पर बैन रहा है और कई बार इस मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल दखल दे चुका है लेकिन पराली जलाया जाना बिना किसी रुकावट के जारी है. पिछले साल नवंबर में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने राज्यों को इस समस्या के समाधान के लिए सुझाव मांगे थे. ट्रिब्यूनल चाहता था कि राज्य बताएं कि इसे कैसे रोका जा सकता है? ताकि किसानों को इंसेंटिव और इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर असिस्टेंस देकर इस पर रोक लगाई जा सके. लेकिन तमाम प्रयास जो किसानों के पराली जलाने को रोकने के लिए किए गए किसी काम नहीं आए. लेकिन कोई भी प्रयास इस दिशा में कारगर नहीं रहा है.

हालांकि NGT इस तरह से पराली का जलाया जाना 2015 में बैन कर चुका है. लेकिन किसानों का मानना है कि अगली फसल के लिए खेतों को तैयार करने का यह उनके लिए सबसे सस्ता तरीका है. ऐसा करने से केवल 15 दिन में यह खेत अगली फसल के लिए तैयार हो जाते हैं. किसानों की दलील रही है कि अगर वे बची हुई पराली को खेतों से खुद हटाएं तो ऐसा करने में उन्हें 5 हज़ार रुपये प्रति एकड़ का खर्च आएगा.

क्या ये मशीनी खेती का खामियाज़ा है?
हर साल किसान हज़ारों एकड़ खेती की जमीन पर आग लगा देते हैं. ऐसा वे धान की फसल के कटने के बाद बची हुई पराली को खत्म करने के लिए करते हैं. लेकिन उनके ऐसा करने के बाद ज्यादातर उत्तर भारत पर काली धुंध की एक मोटी परत बिछ जाती है. इस धुंध की जो सैटेलाइट तस्वीरें आई थीं, उनमें साफ दिखता था कि पराली जलाने के तुरंत बाद ही उत्तर भारत को इस काले कोहरे ने अपनी जद में ले लिया था.

किसान पहले से ही पराली जलाते आए हैं. लेकिन हाल में यह चलन मशीनी खेती के चलते ज्यादा बढ़ा है. क्योंकि पहले पराली का दूसरे कृषि और घरेलू कामों में इस्तेमाल हो जाता था. लेकिन अब मशीनों से कटाई के चलते ऐसा नहीं हो पाता है.

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First published: October 31, 2019, 8:13 PM IST
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