तलाक के बाद महाश्वेता देवी ने क्यों की थी खुदकुशी की कोशिश?

तीन साल पहले 28 जुलाई 2016 को दुनिया को अलविदा कहने वाली प्रतिष्ठित नारीवादी लेखिका महाश्वेता देवी का जीवन अपने आप में नारीवाद की मिसाल बना. शादी, तलाक, डिप्रेशन, फिर शादी, फिर तलाक के बीच संघर्षों का सिलसिला लगातार ऐसे जारी रहा.

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: July 28, 2019, 6:09 PM IST
तलाक के बाद महाश्वेता देवी ने क्यों की थी खुदकुशी की कोशिश?
महाश्वेता देवी. फाइल फोटो.
Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: July 28, 2019, 6:09 PM IST
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन पर एक उपन्यास लिखना था. यह उनके जीवन का पहला उपन्यास होने वाला था. उन्होंने झांसी की रानी पर उपलब्ध तमाम इतिहास पढ़ा, लेकिन झांसी की रानी के भीतर और झांकने का मन था. उस क़िरदार में छुपी एक संपूर्ण नारी और उसके मन को खोजना था. लिहाज़ा तय किया कि बंगाल से झांसी की यात्रा की जाए और स्थानीय लोगों की श्रुति परंपरा में जो अनछुई कहानियां हैं, जानी जाएं. ये फ़ैसला आसान इसलिए नहीं था क्योंकि शादी को कुछ ही बरस हुए थे और एक छोटे बालक की मां थीं, महाश्वेता देवी. इसके बावजूद अपने बच्चे को पिता के साथ छोड़कर, इधर-उधर से कुछ पैसे जुटाकर महाश्वेता सफ़र पर निकलीं.

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बुंदेले हरबोलों ही नहीं, बल्कि बुंदेलखंड के आम लोगों से कहानियां सुनने के बाद झांसी की रानी के नारी चरित्र और जीवन पर महाश्वेता का पहला उपन्यास छपा 'झांसिर रानी'. इस बांग्ला उपन्यास को हाथों हाथ लिया गया और महाश्वेता धीरे धीरे मशहूर होने लगीं. इससे पहले, हुआ ये था कि 1946 में ग्रैजुएशन के बाद 1947 में महाश्वेता ने बिजोन भट्टाचार्य से शादी की थी. इस शादी को लेकर महाश्वेता के परिवार में विरोध हुआ था, लेकिन विद्रोही स्वभाव महाश्वेता को अपनी शर्तों पर जीने से कौन रोक सकता था.

बिजोन अस्ल में, ऋत्विक घटक की फिल्मों के लिए काम कर चुके थे और बंगाल में भारतीय जन नाट्य यानी इप्टा के संस्थापकों में से एक थे. खुद एक नाटककार की हैसियत से बिजोन का कद बड़ा था और महाश्वेता ने उनसे शादी करने के बाद, उनके साथ जीकर अपने लेखकीय जीवन के आयाम खोजे. बाद में, कुछ इंटरव्यूज़ में महाश्वेता ने खुद कहा कि बिजोन के प्रभाव से उनमें प्रगतिशीलता, लेखन और आंदोलनों को लेकर एक समझ पैदा हुई, जिसने दूर तक उनका साथ निभाया.

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साल 2018 में जयंती के मौके पर गूगल ने महाश्वेती देवी को डूडल के ज़रिए ऐसे श्रद्धांजलि दी थी.


सेल्स गर्ल से ट्यूटर तक... ज़िम्मेदारियां
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शादी के बाद महाश्वेता और बिजोन को एक संकट भरी ज़िंदगी से गुज़रना पड़ा. बिजाने चूंकि कम्युनिस्ट पार्टी से भी जुड़े थे इसलिए उस समय कम्युनिस्टों और उनके हितैषियों के प्रति सख़्ती बरती जा रही थी. बिजोन को कहीं काम नहीं मिल रहा था. ऐसे में, परिवार चलाने के लिए महाश्वेता को कई तरह के काम करने पर मजबूर होना पड़ा. कभी दरवाज़े दरवाज़े जाकर सेल्सगर्ल के तौर पर काम किया, तो कभी टीचर बनीं. कभी किसी रिसर्च के लिए बंदरों को जुटाने का काम किया तो कभी प्राइवेट ट्यूशन. इसी दौरान डाक व तार विभाग में क्लर्क की नौकरी लगी.

अच्छे दिन की एक उम्मीद जगी, लेकिन कुछ ही देर में ग़ायब हो गई. महाश्वेता पर कम्युनिस्ट होने के इल्ज़ाम लगाकर उन्हें इस सरकारी नौकरी से निकाल दिया गया. फिर वही संघर्ष. इस दौरान महाश्वेता अपना पहला उपन्यास लिखने की तरफ बढ़ीं और इसके बाद उन्हें लेखन की ऐसी प्रेरणा मिली कि उनकी ज़िंदगी में पहली प्राथमिकता उनका काम होता चला गया.

किताबों की यात्रा या यात्रा की किताबें!
द्रौपदी : उनका यह उपन्यास हिमालय में बसी गुज्जर जनजाति में प्रचलित परंपरा पर आधारित था. एक औरत तीन या चार भाइयों के साथ ब्याही जाती थी लेकिन पत्नी मुख्य तौर पर एक की ही होती थी. बाद में, बाकी भाई अलग अलग शादियां कर सकते थे.
रुदाली : महाश्वेता देवी का यह उपन्यास ग्रामीण इलाकों की, खास तौर से राजस्थान के, उन महिलाओं की जीवन विडंबना दर्शाता है, जिनसे मातम पर जबरन रोने का काम करवाया जाता है.
अरण्येर अधिकार : ये कहानी झारखंड के जंगल के अधिकारों पर आ​धारित थी. इसी तरह महाश्वेता के और साहित्यिक कार्य जैसे हज़ार चौराशीर मां और बाशाई तुदु भी भारत के अलग अलग प्रांतों में चल रहे विभिन्न आंदोलनों से जुड़े रहे थे.

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महाश्वेता देवी ने 100 से अधिक किताबों का लेखन किया. फाइल फोटो.


इन किताबों का ज़िक्र करने के पीछे मक़सद ये समझना है कि महाश्वेता ने यात्राएं करना, आंदोलनों से जुड़ना और यथार्थपरक लेखन को अपना जीवन बना लिया था. इसकी वजह से उनकी निजी ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आते रहे. लेकिन, महाश्वेता ने अपने काम से समझौता न करने का निश्चय किया. नतीजा ये हुआ कि 1962 में बिजोन के साथ उन्होंने तलाक लिया क्योंकि हालात बेहद खराब हो चुके थे. एक तरफ, बिजोन चाहते थे कि महाश्वेता परिवार की तरफ पूरा ध्यान दें और महाश्वेता की प्राथमिकता अपना काम बना रहा.

परंपरा से विद्रोह
ये उस समय महाश्वेता का परंपरा से विद्रोह था. एक आदमी अपने काम को जी-जान देने के लिए परिवार की ज़िम्मेदारियों को दरकिनार हमेशा कर सकता था, लेकिन औरत से अपेक्षा हमेशा यही रहती थी​ कि उसे अगर कुछ अपना काम करना भी है, तो परिवार उसकी पहली ज़िम्मेदारी है, जो उसकी प्राथमिकता में हमेशा रहना चाहिए. लेकिन महाश्वेता ने न केवल अपने मक़सद को तरजीह दी बल्कि अपने 14 साल के बेटे को बिजोन के सुपुर्द कर अपने सफ़र पर आगे बढ़ने का फ़ैसला किया. ये भी महिलाओं की पारंपरिक छवि से अलग था.

लेकिन, ये सारे फ़ैसले महाश्वेता के लिए आसान नहीं थे. उनके सीने में दिल था, धड़कता हुआ. जज़्बात थे, मचलते हुए. ये फ़ैसला उनके लिए भी कम कठोर नहीं था. इसी का नतीजा था कि अगले कई महीनों तक महाश्वेता डिप्रेशन में रहीं. यहां तक कि, उन्होंने खुदकुशी तक की कोशिश की. लेकिन, फिर जीवन मिला तो उन्होंने इसे नये सिरे से जीने की ठानी. बिजोन के साथ जहां रिश्ता खत्म हो रहा था, महाश्वेता तब प्राइवेट छात्र के तौर पर अंग्रेज़ी में मास्टर डिग्री कर रही थीं क्योंकि शादी से पहले वे ग्रैजुएट हो पाई थीं और शादी के तुरंत बाद तमाम ज़िम्मेदारियों के चलते पोस्ट ग्रैजुएशन नहीं कर सकी थीं.

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एक कार्यक्रम के दौरान महाश्वेता देवी की पुरानी तस्वीर. फाइल फोटो.


और कहानी ख़त्म होते-होते हुई
इसके बाद महाश्वेता एक कॉलेज में पढ़ाती रहीं और अपने आंदोलनों व लेखन से लगातार जुड़ी रहीं. ये उनकी प्रसिद्धि का भी दौर था और निजी जीवन में एक और पुरुष की आमद का भी. एक और शादी की लेकिन कुछ ही समय में ये शादी भी 1975 में ख़त्म हो गई. एक इंटरव्यू में महाश्वेता ने कहा था कि 'दूसरी शादी का भी कोई मक़सद या सिरा नज़र नहीं आ रहा था'. इसके बाद अपने निजी जीवन को उन्होंने अपने काम के जीवन के साथ एक कर देने का निश्चय किया.

28 जुलाई 2016 को 90 बरस की उम्र में आखिरी सांस लेने से पहले महाश्वेता ने किस्सों, कहानियों और रिपोर्ताजों यानी साहित्य की दुनिया को एक से एक बेहतरीन किताबें दीं. कभी झांसी की रानी जैसा साहस, कभी द्रौपदी जैसी नियति के करीब, कभी रुदाली... अपनी जीवन यात्रा में महाश्वेता अपनी लिखी किताबों के नारी पात्रों की छवि को वास्तविक जीवन में महसूस करती दिखती रहीं.

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First published: July 28, 2019, 6:07 PM IST
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