वो मुस्लिम नेता, जिसने सबसे पहले किया था आर्टिकल 370 का विरोध

पहली बार संविधान में आर्टिकल 370 को शामिल करने का मसौदा पेश किया गया तब संविधान निर्मात्री सभा में मौजूद पूर्व स्वतंत्रता सेनानी और मुस्लिम लीग के पूर्व नेता ने इसके औचित्य पर सवाल खड़ा किया था. पढ़ें कि उस नेता को आप कितना और कैसे जानते हैं.

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: August 6, 2019, 6:41 PM IST
वो मुस्लिम नेता, जिसने सबसे पहले किया था आर्टिकल 370 का विरोध
डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ हसरत मोहानी. (चित्र: साभार विकिपीडिया)
Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: August 6, 2019, 6:41 PM IST
जम्मू-कश्मीर राज्य को दो हिस्सों में तोड़कर दो अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने के फैसले के बाद लगातार अनुच्छेद 370 (Article 370) को लेकर बहस जारी है. आर्टिकल 370 के इतिहास से जुड़ी तमाम जानकारियां न्यूज़18 आप तक लगातार पहुंचा रहा है. असल में, यह संविधान की वह अनुच्छेद रहा है, जो शुरूआत से ही विवादों में रहा. इसके औचित्य, स्वरूप एवं प्रभाव को लेकर हमेशा सवाल किए जाते रहे. 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू हुआ था, लेकिन उससे पहले संविधान निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी, तब 1949 में एक मुस्लिम नेता ने इस आर्टिकल की व्यवस्था को लेकर सबसे पहले सवाल खड़े किए थे. उस पूरे घटनाक्रम को लेकर जानिए इतिहास के पन्नों से एक प्रामाणिक कहानी.

ये भी पढ़ें : लद्दाख 1989 में ही बन सकता था केंद्रशासित प्रदेश, लेकिन...

वो मुस्लिम नेता थे मौलाना हसरत मोहानी, जिन्होंने सबसे पहले आर्टिकल 370 की व्यवस्था को लेकर सवालिया निशान लगाया था. हिंदी कवि और लेखक अशोक कुमार पांडेय लिखित किताब कश्मीरनामा में इस बात का ज़िक्र है कि संविधान सभा में 17 अक्टूबर 1949 को जब अनुच्छेद 306, जिसे बाद में 370 के नाम से जाना गया, का मसौदा पेश किया, तो मोहानी सबसे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने सवाल किया था 'संविधान में आर्टिकल 370 की क्या ज़रूरत है? ये भेदभाव क्यों?'

मोहानी को ये मिला था जवाब

मोहानी के इस सवाल का जवाब जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह के दीवान रह चुके गोपालस्वामी आयंगर ने दिया था, जो उस वक्त बगैर किसी मंत्रालय के मंत्री थे और जवाहरलाल नेहरू के बेहद करीबी माने जाते थे. जम्मू यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी अमिताभ मट्टू के द हिंदू में लिखे गए लेख के मुताबिक़ आयंगर ने मोहानी को जवाब देते हुए कहा था, 'इसके पीछे कई कारण हैं, जिनके चलते कश्मीर बाकी रियासतों से अलग है और फिलहाल एकीकरण की स्थिति वहां परिपक्व नहीं है. कश्मीर पर भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध हो चुका है और हालात अब भी नाज़ुक हैं. साथ ही, इस राज्य के कुछ हिस्सों में विद्रोही और शत्रु अपना हक जमाने की कोशिश कर रहे हैं...'

ज़रूरी जानकारियों, सूचनाओं और दिलचस्प सवालों के जवाब देती और खबरों के लिए क्लिक करें नॉलेज@न्यूज़18 हिंदी

who is hasrat mohani, article 370, article 370 history, jammu kashmir history, constitution facts, हसरत मोहानी कौन हैं, आर्टिकल 370, आर्टिकल 370 इतिहास, जम्मू कश्मीर इतिहास, संविधान फैक्ट
मोहानी ने संविधान निर्माण के बाद हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था.

Loading...

क्या हुआ था इस जवाब के बाद?
आयंगर ने असल में, और विस्तार से ये जवाब दिया था, जिसके बाद संविधान सभा में किसी और ने इस व्यवस्था को लेकर कोई विरोध दर्ज नहीं करवाया था. लेकिन, मोहानी विरोध में बने हुए थे. नॉर्थलाइन्स के ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता के लेख में उल्लेख है कि मोहानी ने भविष्यवाणी के अंदाज़ में कहा था, 'विशेष राज्य के दर्जे के चलते कश्मीर को बाद में आज़ादी मिल पाएगी'. इसी तरह की बातों को लेकर मोहानी ने संविधान निर्माण के बाद हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था और संविधान निर्माण में पाखंड या कपट के आरोप लगाए थे.

ये भी पढ़ें : अमेरिका ने हिरोशिमा पर परमाणु हमले का फैसला क्यों और कैसे किया?

मोहानी को आप बेशक जानते हैं
चौंकिए नहीं, मौलाना हसरत मोहानी को आप संविधान सभा के सदस्य या स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में शायद कम जानते हों, लेकिन एक शायर के तौर पर आप उन्हें ज़रूर जानते हैं. अगर नाम न भी सुना हो तो उनकी लिखी ग़ज़लों या शायरी से ज़रूर वाकिफ़ होंगे. 'चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है..', ये ग़ज़ल जो आपने गुलाम अली की आवाज़ में सुनी है, ये और ऐसी ही बेहतरीन शायरी करने वाले शायर कोई और नहीं यही हसरत मोहानी थे, जो शिक्षाविद, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, मुस्लिम लीग नेता, भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक और इतिहासकार के रूप में भी जाने जाते हैं.

who is hasrat mohani, article 370, article 370 history, jammu kashmir history, constitution facts, हसरत मोहानी कौन हैं, आर्टिकल 370, आर्टिकल 370 इतिहास, जम्मू कश्मीर इतिहास, संविधान फैक्ट
'इंकलाब ज़िंदाबाद' नारा हसरत मोहानी ने दिया था.


मोहानी की दो यादें हमेशा अपने साथ रखें
हसरत मोहानी से जुड़े दो फैक्ट हमेशा आपके काम आएंगे. भारतीय इतिहास और भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी चर्चा में आप कम से कम दो बार मोहानी का नाम ज़रूर ले सकते हैं. पहला तो ये कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जो नारे सबसे ज़्यादा गूंजे, उनमें से एक 'इंकलाब ज़िंदाबाद' था और ये नारा हसरत मोहानी ने दिया था. और दूसरा ये कि 1921 में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के अधिवेशन के अध्यक्ष के तौर पर 'आज़ादी ए कामिल' यानी 'पूर्ण स्वराज्य' का नारा या विचार देने वाले सबसे पहले स्वतंत्रता सेनानी मोहानी ही थे. इन दो तथ्यों के लिए आपको मोहानी को हमेशा याद रखना चाहिए.

ये भी पढ़ें:


अब पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का क्या होगा?


कश्मीर में तो खरीद लेंगे लेकिन यहां अब भी नहीं ले सकते जमीन

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए नॉलेज से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: August 6, 2019, 5:29 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...