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मुस्लिम कवियों को कृष्ण से इतना ज़बरदस्त प्रेम क्यों रहा?

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष.

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष.

कृष्ण (Lord Krishna) प्रेम सिखाते हैं और धर्म से परे जाकर (Beyond Religion) हमें उनसे प्रेम करना सीखना चाहिए. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (Krishna Janmashtami) के मौके पर पढ़ें मुस्लिम कवियों (Muslim Poets) ने कृष्ण से प्रेम को किस किस तरह से ज़ाहिर किया.

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एक किस्सा कहा जाता है कि सूरदास (Soor Das) अपने एक शागिर्द के साथ पदयात्रा में थे, तब शागिर्द ने उनसे पूछा 'बाबा, इस समय में सबसे बड़ा कवि कौन है?' सूरदास ने मुस्कुराकर उत्तर दिया 'हौं ही हौं' यानी हम ही हैं. तब शागिर्द ने प्रतिप्रश्न किया 'और बाबा तुलसीदास?' (Tulasi Das) तब सूर ने उस शागिर्द के कंधे पर हाथ रखकर कहा 'ऊ तो भक्त है'. ये फर्क एक स्तर पर राम और कृष्ण (Rama & Krishna) का भी फर्क समझाता है. राम के साथ भक्ति की भावना जुड़ती है लेकिन कृष्ण के साथ बरबस ही प्रेम जुड़ता है. कवि प्रेमी होता है, बजाय भक्त के. और धर्म, जाति जैसी किसी हद को प्रेम नहीं मानता इसलिए कृष्ण के प्रेमियों (Krishna Lovers) में मुस्लिम कवियों की संख्या कम नहीं रही.

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भारत में इस्लाम (Islam in India) के प्रभावी ढंग से प्रसार का इतिहास कुछ हज़ार साल पहले से शुरू होता है. यहीं से मुस्लिम कवियों में कृष्ण प्रेम के बीज देखने को मिलते हैं. अमीर खुसरो (Amir Khusro) के समय से शायरी अर्थात कविता में कृष्ण प्रेम की एक धारा जो फूटी तो सदियों तक उसकी लहरें ज़ोर मारती दिखीं. आइए जानें उन कुछ महत्वपूर्ण मुस्लिम कवियों के बारे में जिन्होंने कृष्ण प्रेम की बेहतरीन​ मिसालें (Poetry on Krishna) अपनी कविता में सौंपीं.

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भक्ति आंदोलन और सूफ़ीवाद
उन कवियों के बारे में जानने से पहले ये भी ज़रूरी है कि आप साहित्य के इतिहास के उस हिस्से से वाकिफ़ हों जहां प्रेम की धारा फूटने का स्रोत है. 14वीं सदी के आसपास से हिंदोस्तान की कविता में भक्तिकाल का उदय माना जाता है और इसी के आसपास, संभवत: कुछ पहले से कविता में सूफ़ीवाद की स्थापना होती है. सूफ़ी कवि वास्तव में प्रेमी कवि थे और इनकी कविताओं में रहस्यवाद मुख्य था. यानी कविता एक स्तर पर सांसारिक प्रेम की भावना से ओतप्रोत दिखती है तो दूसरे स्तर पर आध्यात्मिक प्रेम का अनुभव भी देती है.

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अमीर खुसरो का कृष्ण प्रेम
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के सबसे चहेते शागिर्द माने गए अमीर खुसरो के साथ कृष्ण प्रेम का एक किस्सा जुड़ा है. कहा जाता है कि औलिया के सपने में कृष्ण ने दर्शन दिए थे और उसके बाद औलिया ने खुसरो से कृष्ण के लिए कुछ रचने को कहा था. इसी प्रेरणा से खुसरो ने एक कालजयी रचना रची 'छाप तिलक सब छीन ली रे मोसे नैना मिलाइ के'. इस रचना में आपको सीधे कृष्ण का नाम नहीं मिलेगा लेकिन छवियां मिलेंगी जिससे आप यकीन करेंगे कि खुसरो ने यह रचना कृष्ण को समर्पित की थी. इस रचना का ये अंश देखें : 'री सखी मैं जो गई थी पनिया भरन को, छीन झपट मोरी मटकी पटकी मोसे नैना मिलाइ के.’

सूफ़ी काल के कुछ और कृष्ण प्रेमी
ओडिशा राज्य के राज्यपाल रह चुके गांधीवादी विश्वंभर नाथ पांडे ने अपने एक लेख में सूफ़ीवाद की तुलना वेदांत के साथ करते हुए दर्ज किया कि सईद सुल्तान एक कवि हुए जिन्होंने 'नबी बंगश' नामक ग्रंथ में कृष्ण को इस्लाम की मान्यताओं के हिसाब से नबी का खिताब बख्शा. पांडे के इस लेख में अली रज़ा नामक कवि का उल्लेख भी है जिन्होंने राधा और कृष्ण के प्रेम पर काफी लिखा था. सूफ़ी कवि अकबर शाह के ज़िक्र के साथ ही पांडे के अनुसार बंगाल के सुल्तान रहे नाज़िर शाह और सुल्तान हुसैन शाह ने पहली बार महाभारत और भागवत पुराण का बांग्ला में अनुवाद करवाया था.

रसखान को कौन नहीं जानता!
दिल्ली की उठापटक से खिन्न रसखान ने वृंदावन और मथुरा को ही अपना घर इसलिए बना लिया था क्योंकि वह कृष्ण प्रेम में ही गिरफ्तार थे. उनकी कविताओं को कई आलोचक व विद्वान सूरदास की रचनाओं के समकक्ष मानते हैं. सईद इब्राहीम उर्फ रसखान के बारे में यह भी उल्लेख है कि उन्होंने भगवद्गीता का अनुवाद फारसी में किया था. रसखान की रचनओं के कारण ही जर्मन हिन्दी विद्वान डा. लोथार लुत्से को सूरदास पंचशती वर्ष पर एक लेख में कहना पड़ा :

भक्ति आन्दोलन शुरू से ही एक लोकतांत्रिक आन्दोलन रहा. हालांकि इसके आराध्य हिन्दू मान्यताओं के अवतार थे लेकिन यह आंदोलन कभी संकीर्ण साम्प्रदायिकता की ओर नहीं झुका. ऐसा होता तो 1558 के करीब पैदा हुए एक मुस्लिम रसखान के लिए ब्रजभाषा की उत्कृष्ट वैष्णव कविताएं लिख पाना शायद संभव न होता.


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रीतिकाल के आलम शेख
रीतिकालीन कवि आलम शेख ने ‘आलम केलि’, 'स्याम स्नेही’ और 'माधवानल-काम-कंदला’ आदि ग्रंथों की रचना की. ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है कि आलम हिंदू थे जो मुसलमान बन गए. शुक्ल का मानना रहा कि प्रेम की तन्मयता के नज़रिए से आलम को ‘रसखान’ के साथ जोड़ा जाना चाहिए. आलम के कृष्ण काव्य की कुछ पंक्तियां देखें :

पालने खेलत नंद-ललन छलन बलि,
गोद लै लै ललना करति मोद गान है..

‘आलम’ सुकवि पल पल मैया पावै सुख,
पोषति पीयूष सुकरत पय पान है.

रहीम ने भी रची कृष्ण कविता
दरबार के कवि भी कहे गए अब्दुल रहीम खानेखाना को तुलसीदास का गहरा दोस्त भी कहा जाता है. हालांकि रहीम अपने नीतिपरक दोहों और अन्य काव्य के लिए ज़्यादा जाने गए लेकिन उन्होंने समय समय पर कृष्ण काव्य भी रचा. उनकी कृष्ण संबंधी रचनाओं के अंश देखें :

जिहि रहीम मन आपुनों, कीन्हों चतुर चकोर
निसि बासर लाग्यो रहे, कृष्ण चन्द्र की ओर.

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देश भर में उल्लास के साथ मनाया जा रहा है जन्माष्टमी का त्योहार.


ललित कलित माला का जवाहर जड़ा था
चपल चखन वाला चांदनी में खड़ा था
कटितर निच मेला पीत सेला नवेला
अलिबिन अलबेला ‘श्याम’ मेरा अकेला.

नज़ीर अकबराबादी दूसरे रसखान थे?
रीतिकाल का समय जहां खत्म हो रहा था, वहां नज़ीर अकबराबादी का कृष्ण प्रेम मिसाल के तौर पर दर्ज दिखता है. राधा के साथ मीरा के कृष्ण प्रेम की जिस तरह तुलना की जाती है, वैसे ही नज़ीर के कृष्ण काव्य की तुलना रसखान से किए जाने की गुंजाइशें निकाली जाती हैं. उनकी एक प्रसिद्ध कृष्ण प्रेम रचना देखें :

तू सबका ख़ुदा, सब तुझ पे फ़िदा, अल्ला हो ग़नी, अल्ला हो ग़नी
है कृष्ण कन्हैया, नंद लला, अल्ला हो ग़नी, अल्ला हो ग़नी
तालिब है तेरी रहमत का, बन्दए नाचीज़ नज़ीर तेरा
तू बहरे करम है नंदलला, ऐ सल्ले अला, अल्ला हो ग़नी, अल्ला हो ग़नी

यही नहीं, बल्कि नज़ीर के लिए कृष्ण पैगंबर की तरह ही दिखते हैं. नज़ीर ने कृष्णचरित के साथ रासलीला के वर्णन के साथ ही ‘बलदेव जी का मैला’ नामक कविता लिखी, जो कृष्ण के बड़े भाई बलराम पर केंद्रित है. ‘कन्हैया का बालपन’ शीर्षक वाली नज़ीर की कविता भी लोकप्रिय रही.

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अवध के आखिरी नवाब कहे जाने वाले वाजिद अली शाह.


वाजिद अली शाह की कृष्ण से मोहब्बत
उजड़ती लखनऊ रियासत के आख़िरी वारिस वाजिद अली शाह की गिनती भी कृष्ण प्रेमियों में होती है. कहने को नवाब लेकिन फितरत से कवि और कलाकार रहे वाजिद अली शाह ने 1843 में राधा-कृष्ण पर एक नाटक करवाया था. लखनऊ के इतिहास की विशेषज्ञ रोज़ी लेवेलिन जोंस ने ‘द लास्ट किंग ऑफ़ इंडिया’ में लिखा कि वाजिद अली शाह पहले मुसलमान राजा थे जिन्होंने राधा-कृष्ण के नाटक का निर्देशन किया. जोंस के ही मुताबिक शाह के दीवाने उन्हें कई नाम दिया करते थे, जिनमें से एक ‘कन्हैया’ भी था.

और कुछ महत्वपूर्ण कवि
चिंतक, कवि, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और राजनेता रहे मौलाना हसरत मोहानी हों या उर्दू के मशहूर व सम्मानित शायर अली सरदार जाफ़री, कृष्ण प्रेम और कृष्ण के दर्शन को मुस्लिम कवियों में मान्यता हर समय में मिलती रही. जाफ़री का यह क़त्आ देखें :

अगर कृष्ण की तालीम आम हो जाए
तो फित्नगरों का काम तमाम हो जाए
मिटाएं बिरहमन शेख तफ़र्रुकात अपने
ज़माना दोनों घर का गुलाम हो जाए.

इसके अलावा मौलाना ज़फर अली, शाह बरक़तुल्लाह और ताज मुग़लानी जैसे कवियों के नाम भी कृष्ण प्रेम संबंधी कविता से जोड़े जाते हैं. वास्तव में, कृष्ण प्रेम का जो दर्शन तैयार करते हैं, वह धर्म के परे है और इंसान को हर सूरत में प्रेम का रास्ता दिखाने का एक बेजोड़ तरीका है. साहित्य के इतिहास में आप और तलाशेंगे तो ऐसे और भी कवियों के नाम मिलेंगे, जिन्होंने धर्म की सीमाएं लांघकर कृष्ण प्रेम पर कुछ रचा होगा.

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आखिर में एक लोकप्रिय शेर का किस्सा
कृष्ण प्रेम की शायरी की बात हो और इस ​शेर का ज़िक्र न हो तो बात पूरी नहीं होती :

लाम के मानिन्द हैं गेसू मेरे घनश्याम के
वो सभी काफ़िर हैं जो क़ायल नहीं इस लाम के.

अब ये शेर किस शायर का है? इस बारे में कई किस्से प्रचलित हैं. इलाहाबाद में मशहूर है कि फ़िराक़ गोरखपुरी ने ये शेर कहा था, लेकिन मध्य भारत में कई विद्वान मानते हैं कि ये शेर पंडित बृजनारायण चकबस्त ने कहा था. अगर ऐसा है तो इस लेख में इस शेर की ज़रूरत नहीं है. लेकिन, इस शेर के शायरों में दो और नाम लिये जाते हैं. मुसाहिब लखनवी और ताज बीबी. ताज मुग़लानी ही संभवत: वो ताज बीबी हैं जिन्हें इस शेर से जोड़ा जाता है. लेकिन उनका बाकी काव्य देखकर इस शेर को उनका मानने में समस्या होती है. मुसाहिब के पक्ष में भी कई दलीलें हैं लेकिन अब तक कोई एकराय या बहुमत वाली राय नहीं है कि ये शेर अस्ल में है किसका. लेकिन, जिसका भी हो, ये शेर भाषा और प्रेम दोनों ही स्तरों पर इतने कमाल का है कि आप सारी उम्र आनंद ले सकते हैं.

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