क्यों अमेरिकी प्रेसिडेंशियल चुनाव में डिबेट है खास? क्या वाकई इसका असर पड़ता है?

इस बार का राष्ट्रपति (President) पद का मुकाबला वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) और डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बिडेन (Joe Biden) के बीच में हो रहा है. दोनों के बीच पहली औपचारिक बहस हो चुकी है. ऐसे में राष्ट्रपति चुनाव की चर्चाएं परवान चढ़ने लगी हैं. दोनों पक्षों से पहली बहस को जीतने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन माना जा रहा है कि आने वाले समय में मुकबला कड़ा हो सकता है.
इस बार का राष्ट्रपति (President) पद का मुकाबला वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) और डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बिडेन (Joe Biden) के बीच में हो रहा है. दोनों के बीच पहली औपचारिक बहस हो चुकी है. ऐसे में राष्ट्रपति चुनाव की चर्चाएं परवान चढ़ने लगी हैं. दोनों पक्षों से पहली बहस को जीतने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन माना जा रहा है कि आने वाले समय में मुकबला कड़ा हो सकता है.

US Elections 2020 presidential debate: पोल्स के मुताबिक पहली प्रेसिडेंशियल डिबेट के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald trump) करीबी प्रतिद्वंद्वी जो बाइडेन (Joe Biden) से पिछड़ गए हैं. हालांकि लोगों ने सर्वे में कहा कि इससे खराब डिबेट कभी नहीं देखी गई.

  • News18India
  • Last Updated: October 5, 2020, 5:01 PM IST
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साल था 1960, जब अमेरिका (USA) के लोगों ने राष्ट्रपति चुनाव (US President Election) के लिए डिबेट पहली बार टीवी पर देखा और सुना. इस डिबेट में बगैर मेकअप के रिचर्ड निक्सन (Richard Nixon) के पसीने छूटते दिखे थे तो दूसरी तरफ जवान और उत्साहित जॉन एफ कैनेडी (John F Kennedy). इतिहासकारों ने माना कि टीवी पर डिबेट के प्रसारण (Debate Broadcast) ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे को खासा प्रभावित किया था. इसके बाद से डिबेट से राष्ट्रपति चुनाव पर क्या और कितना असर पड़ता है, इस पर बाकायदा अध्ययन (Research & Study) हुए.

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव 2020 में पहली डिबेट में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की खासी किरकरी होने और जो बाइडेन को डिबेट से बढ़त मिलने की खबरें आ चुकी हैं. यह तो तय है कि राष्ट्रपति चुनाव से पहले होने वाले इस डिबेट का काफी असर वोटरों के मन और राय पर पड़ता है. लेकिन किस तरह से? इस बारे में ज़रूरी ब्योरों से पहले आपको जानना चाहिए कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनावों की प्रक्रिया में ये डिबेट आखिर बला क्या है.

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कैनेडी और निक्सन के बीच डिबेट का ऐतिहासिक चित्र विकिमीडिया कॉमन्स से साभार.

क्या होता है प्रेसिडेंशियल डिबेट?
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया के दौरान जो दो सबसे प्रमुख कैंडिडेट उभरकर आते हैं, उन दोनों के बीच कई मुद्दों पर एक विचार विमर्श और बहस होती है, जिससे देश और दुनिया संबंधी नीतियों को लेकर दोनों के नज़रिये को समझने में मदद मिलती है.​ पिछले कुछ समय से यह डिबेट डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी के कैंडिडेट्स के बीच होती रही है. इस डिबेट से जुड़ी कुछ खास जानकारियां इस तरह हैं :

* डिबेट में समय के सबसे विवादास्पद, चर्चित और अहम मुद्दों पर बहस होती है.
* डिबेट का प्रावधान संविधान के तहत अनिवार्य नहीं है लेकिन अब इन्हें चुनाव की एक आंतरिक और अहम प्रक्रिया माना जाता है.
* डिबेट का मुख्य लक्ष्य कैंडिडेट्स के बारे में समझ उनके लिए बनाना है, जो शुरूआती वोटर हैं या कैंडिडेट्स को लेकर अनजान.
* डिबेट की बारी चुनावी प्रक्रिया के अंतिम चरण में आती है.
* डिबेट को एक या कुछ पत्रकार मिलकर संचालित करते रहे हैं, और कभी कभी मौजूद जनता भी सवाल पूछती रही है.
* 1960 में पहली बार टीवी पर डिबेट का प्रसारण हुआ था. तबसे डिबेट का प्रसारण टीवी और रेडियो पर होता रहा है और पिछले कुछ समय से वेब पर भी होता है.
* 2016 में डोनाल्ड ट्रंप और हिलेरी क्लिंटन के बीच हुए डिबेट को रिकॉर्ड 8.4 करोड़ लोगों ने देखा था, जिसमें ऑनलाइन स्ट्रीमिंग की दर्शक संख्या शामिल नहीं थी.

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2016 में क्लिंटन व हिलेरी के बीच डिबेट कार्यक्रम खासा चर्चित रहा था.


लिंकन से हुई थी शुरूआत?
अमेरिका के सबसे खास राष्ट्रपतियों में शुमार अब्राहम लिंकन ने जब राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवारी की थी, तब अपने प्रतिद्वंद्वी स्टीफन डगलस के साथ उन्होंने सात बार बहस की थी. बाद में इन संवादों को लिंकन-डगलस डिबेट्स के नाम से जाना गया. आधुनिक समय में इसी प्रैक्टिस को प्रेसिडेंशियल डिबेट के की भूमिका के तौर पर समझा जाता है. इससे यह समझ बनी थी कि राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवारों को अपने आइडिया, नज़रिये और आलोचनाओं को जनता के बीच लाना चाहिए.

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कैसे घटती गई इन डिबेट्स की अहमियत?
अस्ल में, ​इन डिबेट्स की अहमियत को लेकर पॉलिटिकल पंडितों और विश्लेषकों का मानना अलग अलग रहा है. एक वर्ग मानता है कि आधुनिक समय में ये डिबेट नीति और सिद्धांतों पर सार्थक बहस करने के बजाय मीडिया को हथियार बनाकर सिर्फ मत और मतभेद बताने का मंच रह गए हैं. वोटर जो कुछ रैलियों और चुनाव प्रचारों में सुन पाते हैं, वही इन डिबेट्स में भी दोहराया जाता है. यह वर्ग इन डिबेट्स की उपयोगिता पर सवाल खड़े करता है. लेकिन, इसका दूसरा पक्ष भी है.

वोटरों के लिए उपयोगी हैं डिबेट
विश्लेषकों का एक वर्ग इन डिबेट्स को काफी ज़रूरी प्रक्रिया मानता रहा है. इनके अलावा, Pew रिसर्च सेंटर लगातार इनकी उपयोगिता और असर को लेकर रिसर्च करता रहा है. रिसर्च में पाया गया है कि करीब दो तिहाई वोटर मानते रहे हैं कि किस उम्मीदवार को वोट दिया जाए, यह तय करने के लिए ये डिबेट या तो काफी या फिर किसी न किसी तरह से उपयोगी रहे हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि सिर्फ डिबेट ही चुनाव प्रक्रिया का एक हिस्सा है, जिससे वोटरों का मन तय होता है.

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चुनाव प्रक्रिया में डिबेट की परंपरा लिंकन डगलस बहस से मानी जाती है.


कब कब चुनाव का रुख तय करने वाले रहे डिबेट?
यह एक आंकड़ा है कि पिछले कुछ सालों में डिबेट की व्यूअरशिप कम होती गई है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के आधुनिक इतिहास में ऐसे भी मौके रहे हैं, जब डिबेट्स ने चुनाव परिणामों पर अच्छा खासा असर डाला है. ऐसे कुछ मौकों के बारे में जानना भी रोचक है.

कैनेडी और निक्सन का किस्सा तो आप जान चुके, जिसमें डिबेट ने ही कैनेडी के पक्ष में माहौल बनाने में अहम रोल ​अदा किया था. इसके बाद, रोनाल्ड रीगन ने 1980 में जब राष्ट्रपति जिमी कार्टर को हराया था, तब डिबेट की ही भूमिका मानी गई थी. डिबेट में रीगन ने खुद को एकदम स्पष्ट और 'वन लाइनर' में ही बहुत कुछ कह देने वाला उम्मीदवार साबित किया था, जबकि कार्टर इतिहास की ही चर्चा करते दिखे थे.

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इसी तरह, साल 2000 में डिबेट में अल गोर को गहरी सांस और आह भरते हुए साफ सुना गया. आंखें मलते हुए देखा गया और दूसरी तरफ, उनके प्रतिद्वंद्वी जॉर्ज बुश के बेहतर प्रदर्शन से वोटरों पर खासा प्रभाव पड़ा था. इसी तरह, गेराल्ड फोर्ड की पूर्वी यूरोप के बारे में भ्रामक जानकारियों का पर्दाफाश डिबेट में हो गया था.

बहरहाल, डिबेट की अपनी उपयोगिता है, यह तो स्पष्ट है, लेकिन देखने के नज़रिये पर बहुत कुछ निर्भर करता है. पत्रकार और मीडिया इस डिबेट में एक विजेता और एक लूज़र तलाशने की कोशिश करता है, जबकि वोटर कैंडिडेट के नज़रिये को समझने में दिलचस्पी लेकर बेहतर कैंडिडेट चुनने की कोशिश करते हैं.
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