तो 'राष्ट्रपति सिस्टम' होता और भारत होता 'यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया'

तो 'राष्ट्रपति सिस्टम' होता और भारत होता 'यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया'
भारत का संसद भवन.

राजस्थान सियासी संकट (Rajasthan Political Crisis) के समय में लोकसभा सदस्य शशि थरूर (Shashi Tharoor) ने एक लेख में संसद प्रणाली पर सवाल खड़े कर 'प्रेसिडेंशियल सिस्टम' की वकालत की है. इस मुद्दे पर क्या पहले भी चर्चा हुई है? राष्ट्रप​ति सिस्टम (Presidential System) की ज़रूरत क्यों है? ये भी जानें कि कैसे भारत इस सिस्टम को अपनाते-अपनाते रह गया.

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भारत में लोकतंत्र (Democracy) के तहत संसदीय सिस्टम को न केवल हमारे नेता ठीक से समझते हैं बल्कि अब जनता भी. आज़ादी के बाद से चुनाव आधारित संसद (Indian Parliament) का ही तरीका देश में प्रचलित रहा है. समय समय पर विचार होता रहा है कि क्या भारत में संसदीय लोकतंत्र की जगह राष्ट्रपति सिस्टम वाला लोकतंत्र ज़्यादा कारगर होगा! फिर यह मुद्दा चर्चा में है क्योंकि कांग्रेस (Congress) पार्टी के सांसद शशि थरूर ने एक लेख लिखकर राष्ट्रपति सिस्टम को भारत के लिए ज़रूरी बताया है.

ब्रिटिश से हमने जो संसदीय सिस्टम नक़ल के तौर पर लिया था, वो भारतीय स्थितियों में कारगर नहीं रहा. संसदीय सिस्टम ने हमें नाकाम कर दिया. अब समय है कि हम बदलाव की मांग करें.
शशि थरूर


पहले भी राष्ट्रपति सिस्टम के पक्ष में रह चुके थरूर ने एक ट्वीट करते हुए राजस्थान में बने राजनीतिक संकट और कई राज्यों में पिछले दिनों रही राजनीतिक उथल पुथल के हवाले से राष्ट्रपति सिस्टम की वकालत की है और कई कारणों से साबित किया है कि संसदीय सिस्टम क्यों बदला जाना चाहिए. पहले थरूर की दलीलें जानिए और फिर दोनों सिस्टमों के कॉंसेप्ट समझिए.
क्या हैं थरूर की दलीलें?


कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन, मध्य प्रदेश में राजनीतिक ड्रामे के बाद कांग्रेस की सरकार का गिरना, महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर हुए जोड़ तोड़ और राजस्थान के हालिया राजनीतिक संकट के सदंर्भ में थरूर ने संसदीय सिस्टम की नाकामी कुछ बिंदुओं में इस तरह बताई है :

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शशि थरूर ने ट्विटर पर एक वीडियो के ज़रिये लोकतंत्र के मुद्दे को छेड़ा.


* इस व्यवस्था ने हमें नाकाबिल लोग विधायिका में दिए, जो सिर्फ सत्ता के लिए चुनाव को रास्ता समझते हैं.
* ये ढुलमुल बहुमत पर आधारित सरकारें बनाती है, जिसमें राजनीति पर फोकस रहता है, नीतियों या प्रदर्शन पर नहीं.
* स्थिति ये हो गई कि सरकारें सत्ता बचाए रखने पर फोकस रखती हैं, बजाय बेहतर व्यवस्था बनाने के.
* इस सिस्टम ने लोगों का वोट करने की प्राथमिकता व्यक्ति के बजाय पार्टी को वोट करने की बनाई.
* गठबंधनों के चलते इस सिस्टम का लचर रवैया, जनप्रतिनिधियों के स्वार्थ और निजी हित बड़े हो गए.

राष्ट्रपति सिस्टम क्यों है विकल्प?
तिरुवनंतपुरम से चुने गए सांसद थरूर ने संसदीय सिस्टम की नाकामियों के साथ राष्ट्रपति सिस्टम के फायदे भी बताए. पहला तो ये कि ऐसे​ सिस्टम में, गठबंधन या सरकार को बचाए रखने में नहीं बल्कि ऊर्जा सरकार चलाने में लगेगी. लोग जिसे सरकार चलाने लायक समझेंगे, उस व्यक्ति को सीधे चुन सकेंगे. इस सिस्टम में राष्ट्रपति वास्तव में भारतीयों के बहुमत वाला होगा न कि बहुमत पाने वाली किसी पार्टी का कोई सदस्य.

इसके साथ ही, एक तय समयसीमा के भीतर लोगों को यह अधिकार होगा कि वो अपने चुने हुए राष्ट्रपति को उसके प्रदर्शन के आधार पर आंक सकें, न कि सरकार को बचाए रखने के उसके राजनीतिक कौशल को ही देखते रहें. अब आपको ये भी जानना चाहिए कि क्या इस सिस्टम से निरंकुशता यानी हिटलरशाही जैसा खतरा होगा?

क्या राष्ट्रपति सिस्टम बेलगाम सरकार होगी?
ब्रिटेन के संसदीय सिस्टम और अमेरिका के राष्ट्रपति सिस्टम वाले लोकतंत्रों की तुलना जब भारत में होती है तब राष्ट्रपति सिस्टम को लेकर दो भ्रम ज़रूर चर्चा में आते हैं : एक, इस तरीके से तानाशाही को बल मिलेगा और दूसरे कि इससे भारतीय विविधता को चोट पहुंचेगी. लेकिन ऐसा संभव है या नहीं, इसके लिए हमें तर्क और इतिहास आधारित अध्ययन करना होगा.

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न्यूज़18 क्रिएटिव


जब भारत की सरकारों का इतिहास देखें तो पाएंगे कि आज़ादी के 73 सालों के भीतर संसदीय सिस्टम के बावजूद हम तानाशाही के साथ ही सांप्रदायिक भेदभाव के चलते काफी नुकसान देख चुके हैं. दूसरी तरफ, अमेरिका के 230 सालों के राष्ट्रपति सिस्टम के इतिहास में कभी किसी राष्ट्रपति के तानाशाह होने के सबूत नहीं रहे. विशेषज्ञों के मुताबिक इस भ्रम से ​छूटना ज़रूरी है कि राष्ट्रपति सिस्टम में एक आदमी के हाथ में पूरा नियंत्रण होता है.

इस सिस्टम में राष्ट्रपति हमारे प्रधानमंत्री जैसी व्यवस्था के तहत नहीं होता. उसका राज्य सरकारों पर कोई नियंत्रण नहीं होता. केंद्र में भी, वह विधायिका को नियंत्रित नहीं करता, न ही अकेले कानून या बजट मंज़ूर कर सकता है. अपनी मर्ज़ी से जांच एजेंसियों का इस्तेमाल नहीं कर सकता और न ही विधायिका की मंज़ूरी के बिना अपनी कैबिनेट चुन सकता है.
भानु धमीजा, लेखक - Why India Needs the Presidential System


भारत में संसदीय सिस्टम क्यों?
संविधान का ड्राफ्ट अपनाए जाने के बाद डॉ. बीआर आंबेडकर ने कहा था कि राष्ट्रपति सिस्टम ज़्यादा टिकाऊ होता है लेकिन कम जवाबदेह होता है. हालांकि हुसैन इमाम ने कहा था कि अमेरिका में सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेज़ेंटेटिव के पास हाउस ऑफ कॉमन्स से कहीं ज़्यादा नियंत्रण होता है.

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आंबेडकर ने अमेरिका की तर्ज़ पर 'यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया' का खाका भी पेश किया था और सरदार पटेल ने भी ऐसे सिस्टम की वकालत थी जहां राष्ट्रपति और राज्यपाल सीधे चुने जा सकें. महात्मा गांधी ने कहा था 'अगर भारत इंग्लैंड की नकल करेगा, तो मुझे विश्वास है कि बर्बाद होगा.' यही नहीं, बल्कि 1933 में ब्रिटेन की संसदीय समिति की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि भारत में मौजूदा संसदीय सरकार की कोई ज़रूरत पेश नहीं थी.

देश में संसदीय सिस्टम वाला लोकतंत्र हो, इसका फैसला संविधान सभा नहीं बल्कि जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली संविधान समिति ने किया था. ​अपने लेख में धमीजा ने ये भी लिखा था ​कि आधार सिर्फ यह था कि संसदीय सिस्टम को हमारे नेता 'ठीक से समझते' हैं.
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