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    कैसी है साइकोलॉजिकल ट्रेनिंग, क्यों कश्मीर में आर्मी को दी जा रही है?

    पुलवामा के सीबीएस में दी जा रही है ये ट्रेनिंग.
    पुलवामा के सीबीएस में दी जा रही है ये ट्रेनिंग.

    अगस्त 2019 में उत्तरी राज्य (Jammu & Kashmir) से आर्टिकल 370 खत्म कर उसे दो केंद्रशासित प्रदेशों (UTs) में बांटने के कदम के बाद से ही यहां आर्मी के ऑपरेशनों (Army Operations in Kashmir) सिविलियनों की मौतें न हों, इस पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा है.

    • News18India
    • Last Updated: October 15, 2020, 12:51 PM IST
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    खबरों में कहा गया है कि इस साल 1 जनवरी से कश्मीर घाटी (Kashmir Valley) में 30 सिविलियन मारे जा चुके हैं, जिनमें से 22 की मौत आतंकी हमलों (Terrorist Attacks) में हुई, पांच संघर्ष विराम (Ceasefire) उल्लंघन के चलते हुई फायरिंग में और 3 सिविलियन आंतकियों व आर्मी जवानों के बीच क्रॉस फा​यरिंग (Cross Firing) में. आर्मी ऑपरेशनों (Army Operations) में एक भी सिविलियन के न मारे जाने का दावा किया गया है. इस दावे के पीछे बताया जा रहा है कि आर्मी को जो मनोवैज्ञानिक ट्रेनिंग दी जा रही है, यह उसी का सकारात्मक नतीजा है.

    जम्मू और कश्मीर सीमाओं पर तैनात किए जाने से पहले भारतीय आर्मी के अफसरों और जवानों के लिए साइकोलॉजिकल ट्रेनिंग अनिवार्य करने की तरफ कदम उठाए जाने की खबरें हैं. श्रीनगर से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर पुलवामा ज़िले के ख्रू स्थित कॉर्प्स बैटल स्कूल में यह प्री इंडक्शन कोर्स करना ही होता है अगर पोस्टिंग घाटी या लाइन ऑफ कंट्रोल पर हो. अब इसमें जानने की बात यह है कि यह ट्रेनिंग क्या होती है और क्यों.

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    इससे पहले ये भी जानिए कि डीआरडीओ की एक लैब डिफेंस इंस्टिट्यूट ऑफ साइकोलॉजिकल रिसर्च DIPR की स्टडी के बाद एक मॉड्यूल तैयार किया गया था, जिसके आधार पर मनोवैज्ञानिक ट्रेनिंग का एक कोर्स सोल्जरों के लिए इस साल की शुरूआत से ही जोड़ा गया है. दो तरह के कोर्स हैं, जिनमें से एक 14 दिनों का तो दूसरा 28 दिनों का है.
    किस तरह से कराए जाते हैं कोर्स?
    बैटल स्कूल में 14 दिन का कोर्स उन जवानों और अफसरों के लिए है, जो एलओसी पर पोस्टिंग पाते हैं और 28 दिनों का कोर्स कश्मीर घाटी में पोस्टिंग पाने वालों के लिए है. आर्मी के सीनियर अफसरों के हवाले से खबरों में कहा गया है कि घाटी में आतंकवाद निरोधी ऑपरेशन उन ऑपरेशनों से काफी अलग होता है, जो एलओसी पर रूल ऑफ इंगेजमेंट के तहत होते हैं.

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    एलओसी और घाटी पर तैनात होने वाले सैनिकों के लिए अलग कोर्स हैं.


    इस फर्क को ऐसे समझें कि एलओसी पर तैनात जवानों के लिए आसान है समझना कि जो सीमा पार कर रहा है, वो आतंकवादी भी हो सकता है, लेकिन घाटी के भीतर बसाहटों में हालात काफी संवेदनशील और पेचीदा हो जाते हैं. चूंकि घाटी में आतंकी बस्ती में ही छुपे होते हैं इसलिए उनकी पहचान और खोज काफी मुश्किल होती है और यह खयाल रखना होता है कि आर्मी के ऑपरेशन नागरिकों के लिए दुश्वार न हों.

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    ताकि भूलकर भी भूलें नहीं जवान!
    अब जो साइकोलॉजिकल ट्रेनिंग अनिवार्य हुई है, उसका मकसद यही है कि सैनिकों के मन में यह बात पूरी तरह कायम कर दी जाए कि घाटी में रहने वाले अधिकतर लोग नागरिक हैं, आतंकी नहीं. घाटी के भीतर देश की सीमा है, एलओसी नहीं. हमेशा जवानों और अफसरों को यह याद रहे कि मानवाधिकारों का हनन किसी कीमत पर न हो और सर्च ऑपरेशनों या आतंकियों के साथ मुठभेड़ के दौरान सिविलियन आबादी को किसी किस्म का नुकसान और जोखिम नहीं हो.

    ट्रेनिंग का मतलब, कैसे करें बर्ताव?
    इस साइकोलॉजिकल ट्रेनिंग में सिखाया जा रहा है कि सिविलियन्स के साथ आर्मी का बर्ताव किस तरह होना चाहिए. इस ट्रेनिंग में वो नियम सिखाने पर भी ज़ोर है कि फायरिंग कैसे करें, कब करें और बगैर चेतावनी दिए तो कतई न करें. बस्ती के भीतर आतंकियों के सर्च ऑपरेशनों के दौरान होने वाली फायरिंग में यह सुनिश्चित किया जाए कि उससे सिविलियन्स को कोई खतरा न हो.

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    साइकोलॉजिकल ट्रेनिंग में कानून के मूलभूत और आदर्श सिद्धांत को आर्मी के हिसाब से रटाया जा रहा है कि भले ही कोई आतंकी बच जाए लेकिन कोई नागरिक न मारा जाए.

    स्टूडेंट्स और युवाओं के साथ ट्यूनिंग पर ज़ोर
    इस ट्रेनिंग में आर्मी को बताया जा रहा है कि घाटी में युवाओं और छात्रों के आंतकवाद की तरफ रुख करने के ट्रेंड को बदलने और रोकने के लिए ज़रूरी है कि उनके साथ न केवल बेहतर बर्ताव हो बल्कि उनके साथ एक ट्यूनिंग बनाई जाए. घाटी में मानवाधिकारों का खयाल रखते हुए लोगों के साथ बेहतर ढंग से संपर्क बनाए रखना, खासकर स्टूडेंट्स के साथ लगातार अच्छे से मिलने जुलने के तौर तरीके सिखाए जा रहे हैं.

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    आर्मी को सिखाया जा रहा है कि मानवाधिकारों का उल्लंघन न हो.


    आंकड़ों के हिसाब से बताया गया है कि जम्मू और कश्मीर में साल 2018 में 219 युवाओं ने आतंकी समूहों को जॉइन किया था, जबकि 2019 में 119 और इस साल 6 अक्टूबर तक 135 युवा आतंकवाद की राह चुन चुके हैं.

    क्यों ज़रूरी है ट्रेनिंग?
    पिछले साल जब DIPR अधिकारियों ने स्कूल का दौरा किया था, तब कॉम्बैट स्ट्रेस मैनेजमेंट के लिए एक विशेष ट्रेनिंग पर फोकस किए जाने की बात कही गई थी. 150 एकड़ में फैले इस इंस्टिट्यूट में कई फायरिंग रेंज हैं और एक मॉडल गांव भी यहां बसाया गया है ताकि सोल्जरों को ट्रेनिंग के दौरान एक अंदाज़ा दिया जा सके कि किस तहर के हालात पेश आते हैं और किस तरह से काम करना होता है.

    कॉर्प्स बैटल स्कूल में हर महीने करीब 3000 सोल्जरों को ट्रेनिंग दी जाती है जबकि घाटी में हर साल आर्मी करीब 30,000 ऑपरेशनों को अंजाम देती है. सिर्फ आतंकियों के एनकाउंटर ही नहीं बल्कि पेट्रोलिंग और सर्च भी शामिल होते हैं. कुल मिलाकर इस साइकोलॉजिकल ट्रेनिंग में 5 बातों को ज़रूरी तौर पर सिखाया जा रहा है - भरोसा कायम करना, कम से कम फोर्स का इस्तेमाल, निष्पक्षता, ज़रूरत के मुताबिक फोर्स और जस्ट कंडक्ट यानी सिर्फ ज़रूरी और संयमित बर्ताव.
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