महामारी-नस्लीय हिंसा: अमेरिका में 100 साल बाद कैसे दोहराया गया इतिहास?

अमेरिका में अश्वेत फिर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं- (File Photo)

अमेरिका में अश्वेत फिर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं- (File Photo)

Black Lives Matter : Covid-19 का कहर और अमेरिका में श्वेत-अश्वेत नस्लीय हिंसा (Racial Violence) का दौर जारी है. मई में जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद नस्लवाद के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के बाद अब दूसरा दौर जैकब पर हमले के बाद जारी है. ऐसे में जानिए कि सौ साल पहले भी क्या यही का यही घटनाक्रम हुआ था? क्या यह अमेरिकी इतिहास में 'देजा वू' है?

  • News18India
  • Last Updated: August 28, 2020, 6:36 AM IST
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अफ्रीकी अमेरिकी जॉर्ज फ्लॉयड (George Floyd) की मौत के बाद 26 मई से अमेरिका में नस्लभेद के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भड़के थे और अब फिर विस्कॉन्सिन (Wisconsin) में एक और अश्वेत जैकब ब्लेक (Jacob Blake) के खिलाफ पुलिस हिंसा (Police violence) के बाद विरोध प्रदर्शन तेज़ हैं. यहां तक कि विस्कॉन्सिन में इमरजेंसी (Emergency) तक घोषित की गई. ये सब, तब हो रहा है जब अमेरिका और पूरी दुनिया कोरोना वायरस (Corona Virus) वैश्विक महामारी की चपेट में बुरी तरह है. आपको जानकर हैरानी हो सकती है कि यही 101 साल पहले भी हुआ था!

पहले विश्वयुद्ध के आखिरी दो सालों में पूरी दुनिया के सामने स्पैनिश फ्लू नाम की महामारी का संकट था. दुनिया में करीब 5 करोड़ और अमेरिका में करीब 6,75,000 जानें लेने वाली इस महामारी के समय में ही नस्लीय हिंसा के बाद विरोध प्रदर्शनों का दौर भड़का था और तब भी अमेरिका को नागरिक सुरक्षा के दो मोर्चों पर जूझने की चुनौती पेश आई थी.

अमेरिका में नस्लभेद का ज़हर सदियों पुराना रहा है. जब जब भी मानवाधिकारों का सवाल उठा, हिंसा के प्रसंग भी दिखाई दिए. ऐसा ही 1919 में हुआ था, जब गर्मी के मौसम के दौरान भारी प्रदर्शन और हिंसा का आलम था, जिसे 'रेड समर' के नाम से जाना जाता है. तब और अब के दृश्य कितने मेल खाते हैं और कैसे इन्हें समझना चाहिए? देखें.



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स्पैनिश फ्लू 1918 के दौरान एक इलाज सेंटर. (File Photo)

इन्फ्लुएंज़ा-18 और कोविड-19
पहले विश्व युद्ध के दौरान जब सैनिक मोर्चे से लौटे तो 1918 में फ्लू फैलना शुरू हुआ. आज की तरह तब भी यह लाइलाज संक्रमण था, जिसकी कोई दवा या वैक्सीन नहीं थी. आइसोलेशन, क्वारंटीन, साफ सफाई, भीड़ न जुटाना और मास्क पहनने जैसे तरीके ही इससे बचाव के तरीके थे, जैसे मौजूदा कोविड 19 के हालात में हैं.

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उस समय फ्लू कैसे और कहां से फैला था, इसकी सही जानकारी नहीं है लेकिन कुछ इतिहासकार इस पर सहमत हैं कि यह युद्ध के दौरान कई देशों का प्रोपेगैंडा था. तब और अब में यही अंतर है कि इस बार महामारी के चीन से शुरू होने के तथ्य मौजूद हैं.

'रेड समर' 1919 : नस्ली हिंसा
उस साल महामारी अमेरिका में तीसरे दौर में थी. 27 जुलाई को कुछ अश्वेत टीनेजर मिशिगन झील में नहाने गए थे. उस वक्त श्वेतों-अश्वेतों के बीच सामाजिक भेदभाव काफी हुआ करते थे इसलिए दोनों समुदाय अलग और दूर ही रहा करते थे. झील के बहाव में अठखेली करते हुए जब 17 वर्षीय यूजीन विलियम्स श्वेत तैराकों के काफी करीब पहुंचा, तो जॉर्ज स्टॉबर नाम के युवक ने उस पर पत्थर फेंककर हमले किए और यूजीन डूबकर मर गया.

एक अश्वेत पुलिस अफसर ने स्टॉबर को रोकने की कोशिश की थी, तब एक श्वेत अफसर ने उसे रोक दिया था. तनाव पैदा हुआ और इस अन्याय की खबर फैल गई. महामारी के दौरान जब भीड़ के इकट्ठे न होने के निर्देश थे, तब अफ्रीकी अमेरिकी सड़कों पर निकले और विरोध ज़ाहिर किया. इन प्रदर्शनों से हिंसा भड़की. तनाव और फैला तो श्वेत लोगों की भीड़ ने अश्वेतों की बस्तियों में उत्पात मचाया, हत्याएं कीं और अश्वेतों के घर फूंक डाले गए.

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अमेरिका में प्रदर्शनकारी और पुलिस आमने सामने. (File Photo)


दूसरी तरफ, 19 जुलाई से 24 जुलाई 1919 के बीच वॉशिंग्टन में भी नस्लीय हिंसा हुई थी. अमेरिकी श्रम विभाग में नीग्रो अर्थशास्त्र के निदेशक डॉ. हाएन्स की मानें तो साल 1919 में 1 जनवरी से 14 सितंबर के बीच श्वेतों की भीड़ ने कम से कम 43 अफ्रीकी अमेरिकियों को मॉब लिंचिंग का शिकार बनाया. प्रशासन इन मामलों में जायज़ एक्शन लेने में बेरुखी ही दिखाता रहा.

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अमेरिका में नस्लीय हिंसा के ताज़ा घटनाक्रमों को देखा जाए तो जॉर्ज फ्लॉयड एक पुलिस अफसर की ज़्यादती से मारा गया और जैकब ब्लेक भी पुलिसकर्मियों की गोलियों से गंभीर हालत में है. मिनेसॅटा यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर सेज मैथियू कहते हैं कि 1919 की हिंसा कई मायनों में वर्तमान की तुलना में हल्की थी क्योंकि अब ये नस्लीय हिंसा रोज़मर्रा के बर्ताव का हिस्सा है.

वहीं, 100 साल के अंतराल के बाद नस्लीय हिंसा, महामारी और खराब अर्थव्यवस्था की दो एक जैसी स्थितियों को समझने के लिए थोड़ा सतर्क रहना चाहिए. 'रेड समर' पर एक चर्चित किताब के लेखक कैमरून मैकव्हर्टर के मुताबिक संकट के समय मानवीय बर्ताव में समानता दिखेगी. लोग निराश, हताश, तनावग्रस्त होते हैं तो एक प्रेशर पॉइंट बनता है. इस विश्लेषण से यह भी तय है कि शासन और प्रशासन भी एक ही ढंग से बर्ताव करता है.
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