क्या बच्चों के लिए अलग रास्ता बना रहा है कोरोना वायरस?

क्या बच्चों के लिए अलग रास्ता बना रहा है कोरोना वायरस?
प्रतीकात्मक तस्वीर इंडियनएक्सप्रेस से साभार.

छोटे बच्चों में होने वाली एक जानलेवा बीमारी और कोरोना वायरस संक्रमण के बीच क्या संबंध है? क्या कोई संबंध है भी या नहीं? इस बारे में विशेषज्ञ अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन चिंता की बात ये है कि ऐसे मामले हाल में सामने आए हैं, जिनमें तेज़ बुखार और रक्तनलिकाओं में सूजन जैसे लक्षणों के बाद अस्पताल में भर्ती किए गए बच्चों में कोविड 19 की पुष्टि भी हुई.

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अब तक यही माना जा रहा है कि कोरोना वायरस (Corona Virus) वयस्कों, खास तौर से उम्रदराज़ वयस्कों और कमज़ोर इम्यूनिटी (Immunity) वालों को ही ज़्यादातर प्रभावित कर रहा है और बच्चों को इससे बहुत कम खतरा है. लेकिन पिछले कुछ हफ्तों के आंकड़े देखें तो अमेरिका (USA), यूके, फ्रांस, इटली (Italy), स्पेन और स्विटज़रलैंड में करीब 100 ऐसे मामले आए, जिनमें बच्चों में कावासाकी सिंड्रोम (Kawasaki Syndrome) जैसे लक्षण पाए गए. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जांच कर रहा है कि इस सिंड्रोम का कोविड 19 (Covid 19) संक्रमण से क्या संबंध है.

क्या है कावासाकी सिंड्रोम?
यह एक ऐसी बीमारी है जिससे रक्तनलिकाएं (Blood Vessels), हृदय और अन्य अंग प्रभावित होते हैं. तेज़ बुखार, लो ब्लड प्रेशर, खराशें और सांस में मुश्किल इसके लक्षण (Symptoms) के तौर पर सामान्य रूप से पांच साल से कम उम्र के बच्चों में दिखते हैं. लेकिन, भारत (India) में यह बीमारी इस उम्र से बड़े बच्चों में भी देखी गई है. हृयूमैटिक फीवर (Rheumatic Fever) के बाद यह सबसे बड़ा कारण है, जो बच्चों में दिल के रोग (Heart Disease) पैदा करता है.

भारत में स्थिति नाज़ुक है?



कावासाकी सिंड्रोम 5 साल से कम के प्रति 1 लाख बच्चों में 150 को औसतन होता है. ग्लोबल कार्डियोलॉजी साइंस की एक स्टडी की मानें तो भारत में स्थिति खराब इसलिए है कि बड़े स्तर पर इस रोग की पहचान नहीं हो पाती. दूसरी तरफ, लड़के इस रोग की चपेट में ज़्यादा आते देखे गए हैं क्योंकि लड़कों और लड़कियों में यह रोग होने का अनुपात भारत में 1.5:1 है. हालांकि अब तक भारत में कोरोना दौर में इस सिंड्रोम का कोई मामला डिटेक्ट होने की खबर नहीं है.



अब तक क्या है तस्वीर?
यूरोप और अमेरिका में इस नए सिंड्रोम से पीड़ित जो बच्चे अस्पतालों में भर्ती हुए, उनमें से कई में कोरोना वायरस की पुष्टि हुई लेकिन कुछ बच्चों में नहीं भी हुई. इसके तीन मतलब निकाले जा रहे हैं कि सिंड्रोम कोविड 19 से संबंधित नहीं है या जिन बच्चों की जांच में वायरस नहीं मिला, जांच तक वह नष्ट हो गया या ये कि जिन बच्चों की जांच में वायरस नहीं मिला, संभवत: वह जांच रिपोर्ट सही नहीं थी.

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भारत में बच्चों में कावासाकी सिंड्रोम की पहचान न हो पाने से जोखिम के हालात हो सकते हैं. (फाइल फोटो)


“इन बच्चों में कोविड 19 संक्रमण की प्रतिक्रिया के तौर पर गंभीर जलन देखी गई लेकिन जैसा कि वयस्कों में देखा जा चुका है, इन बच्चों में फेफड़ों की कोई गंभीर बीमारी नहीं दिखी.” गार्जियन ने यह बात कैम्ब्रिज की एक बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. नाज़िमा पठान के हवाले से लिखी.

चीन के डेटा को समझना होगा
हालांकि बच्चे कोविड 19 संक्रमण को लेकर कम संवेदनशील माने गए हैं, लेकिन चीन के डेटा को समझना चाहिए. चीन के सीडीसी के शुरुआती डेटा में कहा गया था कि बच्चे इस बीमारी की चपेट में नहीं हैं और 13 फीसदी कन्फर्म केसों में कोई लक्षण नहीं दिखे. इसके बाद जब कन्फर्म और संदिग्ध केसों को मिलाकर डेटा सामने आया तो कहा गया कि 6 से 10 साल के करीब एक तिहाई बच्चे एसिम्प्टोमैटिक नज़र आए.

इसका मतलब क्या है? गुरुग्राम स्थित मेदांता मेडिसिटी के डॉक्टर यतीन मेहता की मानें तो बच्चों में भले ही कोविड 19 के गंभीर लक्षण न विकसित हों, लेकिन इनके ज़रिये संक्रमण दूसरों में फैलने की आशंका कम नहीं होती. इस पूरे मुद्दे पर एचटी की विस्तृत रिपोर्ट यह भी कहती है कि गंभीर लक्षणों के चलते जितने लोग अस्पतालों में भर्ती हुए हैं, उनमें बच्चे सिर्फ 1 फीसदी रहे हैं.

बच्चों में ये लक्षण दिखें तो नज़रअंदाज़ न करें
बच्चों के चेहरे या शरीर पर पीलापन, छूने पर असामान्य रूप से ठंडापन, सांस लेने में तकलीफ, सांस अटककर लेने या हांफने के साथ लेने की समस्या, होंठों पर नीलापन, किसी किस्म का दौरा पड़ने, बेतरह सुस्ती या निष्क्रियता, ज़ोर से दबाने पर भी न जाने वाले रैशेज़ या दर्दनाक रोने जैसे लक्षण नज़र आएं तो फौरन ​डॉक्टरी सलाह लें.

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