क्या वाकई कोरोना में कारगर है रेमडेसिवीर, जिसका निर्यात भारत सरकार ने रोका

इस समय 04 भारतीय कंपनियां बड़े पैमाने पर ये दवा बना रही हैं लेकिन भारत में कोरोना के प्रकोप के बीच इसकी बेतहाशा मांग है.

इस समय 04 भारतीय कंपनियां बड़े पैमाने पर ये दवा बना रही हैं लेकिन भारत में कोरोना के प्रकोप के बीच इसकी बेतहाशा मांग है.

भारत सरकार ने जबरदस्त मांग और कमी के चलते कोरोना में असरदार साबित हो रही है रेमडेसिवीर दवा के निर्यात को रोक दिया. 04 भारतीय कंपनियां इसे बनाकर 126 देशों में भेजती थीं. जानते हैं कि कितनी कारगर ये दवा और इसके बारे में क्या कहा जा रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 13, 2021, 12:41 AM IST
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कोरोना के दूसरी लहर के प्रचंड प्रकोप के बाद एक दवा की जबरदस्त कालाबाजारी हो रही है. वो बाजार से गायब हो गई और उसकी मांग जबरदस्त तौर पर बढ़ रही है. ये दवा है रेमडेसिवीर, जिसका निर्यात भारत सरकार ने रोक दिया. क्यों ये दवा इस महामारी में इतनी उपयोगी बन रही है और दुनिया में इसका उत्पादन अकेला भारत ही कर रहा है क्या.

रेमडेसिवीर ड्रग्स का इस्तेमाल पहले हेपेटाइटिस सी के इलाज में हुआ, लेकिन असल में ये तब ज्यादा चर्चा में आई, जब 2014 में इबोला अफ्रीकी देशों में महामारी बनकर फैला. उसके इलाज में इसका इस्तेमाल हुआ. ये उसमें असरदार भी दिखी. दरअसल ये एक एंटीवायरल दवा है.

जब कोरोना पहली लहर के तौर पर दुनिया में आया तो उसके प्रकोप के बीच कई देशों में इसका इस्तेमाल हुआ और इसके सकारात्मक नतीजे मिले. हालांकि वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन अब भी कोरोना की दवा के तौर पर इसे मान्यता नहीं देता लेकिन कोरोना रोगियों पर जब इस्तेमाल किया गया तो उनके ठीक होने का अनुपात अच्छा खासा रहा.

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देश में कितनी कंपनियां इसे बनाती हैं

उसके बाद ही इसकी मांग बढ़नी शुरू हुई. अमेरिका की कंपनी गिलिएड साइंसेस के पास इसका पेटेंट है. उसने चार भारतीय कंपनियों से इसे बनाने का एग्रीमेंट किया, वो कंपनियां हैं-सिप्ला, हेटेरो लैब्स, जुबलिएंट लाइफसाइंसेस और मिलान. ये चारों कंपनियां बड़े पैमाने पर उसे बनाती हैं और दुनिया के तकरीबन 126 देशों को इसका निर्यात करती हैं.

मूल तौर पर ये एंटी वायरल दवा है. जिसका वर्ष 2014 में इबोला से निपटने में इस्तेमाल हुआ. फिर मर्व और सार्स में भी ये असरदार पाई गई.




क्या ये महंगी दवा है

ये मंहगी दवा है, जिसकी कीमत भारतीय बाजार में करीब 4800 रुपये है लेकिन कालाबाजार में ये कहीं ज्यादा ऊंची कीमत में बेचा जा रही थी. तभी भारतीय सरकार ने इस दवा के बाहर भेजे जाने पर रोक लगा दी ताकि पहले इससे घरेलू जरूरतें पूरी की जा सकें. वैसे पाकिस्तान की एक कंपनी के अलावा बांग्लादेश की कुछ फार्मा कंपनियां भी इसे बना रही हैं.

कैसे काम करती है

कोई भी वायरस जब इंसानी शरीर में जाता है तो वह अपने आपको मज़बूत करने के लिए ख़ुद को रेप्लीकेट यानी अपनी दूसरी प्रतियां तैयार करता है. और ये इंसान के शरीर की कोशिकाओं में होता है. लेकिन इस प्रक्रिया में वायरस को एक एंजाइम की ज़रूरत होती है. ये दवा इसी एंजाइम पर हमला करके वायरस के रास्ते में एक तरह का रोड़ा बनती है.

अमेरिका में इस दवा का ट्रायल अमेरिका के राष्ट्रीय एलर्जी और संक्रामक रोग संस्थान में हुआ है. जिसमें 1063 लोगों ने भाग लिया था. इनमें से कुछ मरीज़ों को ये ड्रग दी गई. वहीं, कुछ मरीज़ों को पेलेसिबो दी गई.

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हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसको कोरोना की दवा के तौर पर मान्यता नहीं दी है लेकिन कई देशों में इसके नतीजे बहुत अनुकूल मिले हैं और कई साइंस जर्नल में इसे लेकर अध्ययन प्रकाशित हुए हैं.


तब पहली बार इसे कारगर माना गया

पिछले साल दिसंबर महीने में ब्रिटेन स्थित कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने कोरोना वायरस से संक्रमित और दुर्लभ इम्युन सिस्टम वाले एक मरीज को रेमडेसिवीर दवा दी. जिसके बाद मरीज के स्वास्थ्य में जबरदस्त सुधार हुआ. वायरस शरीर से खत्म हो गया. इस अध्ययन को नेचर कम्युनिकेशंस ने प्रकाशित किया. फिर तो भारत सहित कई देशों में रेमडेसिवीर का इस्तेमाल होने लगा. वैज्ञानिकों ने कहा कि दवा तब असरदार होती है, जब संक्रमण के शुरुआती स्टेज में इसे मरीज को दिया जाए.

इबोला के अलावा इन बीमारियों पर असरदार

वैसे तो रेमडेसिवीर को इबोला बीमारी के इलाज में पहचान मिली लेकिन इससे मर्स और सार्स जैसे इंफ्युएंजा बीमारियों के इलाज में भी काफी मदद मिली. एक्सपर्ट मानते हैं कि रेमडेसीवीर कोरोना वायरस को बढ़ने से रोकती है.

जो बातें जर्नल्स में इसके बारे में छपीं

रेमडेसिवीर दवा पर ‘द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ में एक स्टडी प्रकाशित हुई. स्टडी में बताया गया कि अमेरिका, कनाडा, जापान और यूरोप में इस दवा का इस्तेमाल हुआ. 61 मरीजों को यह दवा दी गई. मरीज गंभीर रूप से बीमार थे. इनके शरीर में ऑक्सीजन लेवल कम था. इनमें से 53 की स्टडी की गई. हर मरीज को इस दवा का 10 दिन का कोर्स दिया गया. पहले दिन 200 मिलीग्राम दवा दी गई. अगले नौ दिन तक 100-100 मिलीग्राम. इसके सेवन से 53 में 33 मरीजों का ऑक्सीजन लेवल सुधरा. 23 मरीजों को इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई. बाकी बचे 17 मरीजों की भी हालत इतनी सुधरी कि उन्हें वेंटीलेटर से हटा लिया गया. अलबत्ता 07 मरीजों की मौत भी हुई.

इस स्टडी ने कहा-कोरोना में कारगर

कनाडा की अल्बर्टा यूनिवर्सिटी ने भी इस पर रिसर्च की, जो जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल केमिस्ट्री में छपी. इसमें ये पाया गया कि ये कोरोना वायरस को आगे बढ़ने से रोकती है.हालांकि डब्ल्यूएचओ ने अब तक इसलिए इसे मंजूरी नहीं दी क्योंकि इसके लिए जितने ट्रायल और डाटा की जरूरत होती है, वो नहीं है.

चीन ने ट्रायल रिजेक्ट किया

हालांकि चीन ने रेमडेसिवीर ड्रग्स को ट्रायल के बाद रिजेक्ट कर दिया था. ये भी सही है कि इसके बारे में वाकई डाटा और सही तरह के निष्कर्षों का अभाव है लेकिन भारत में भी अब तक जिन्हें ये दवा दी गई है, उसमें से ज्यादातर कोरोना से ठीक हुए हैं.
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