ग्रीनलैंड में गड़ा है आखिर कौन सा खज़ाना, जिस पर है अमेरिका की नज़र

अमेरिका (USA) ग्रीनलैंड क्यों खरीदना चाहता है? अमेरिका की चाहत अलग, लेकिन क्या ग्रीनलैंड (Greenland) बिकने को तैयार है? बिका तो कितने में बिकेगा ग्रीनलैंड? डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान से शुरू हुई इस चर्चा में पांच ज़रूरी सवालों के जवाब.

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Updated: August 18, 2019, 2:26 PM IST
ग्रीनलैंड में गड़ा है आखिर कौन सा खज़ाना, जिस पर है अमेरिका की नज़र
ग्रीनलैंड द्वीप की तस्वीर. फाइल फोटो.
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Updated: August 18, 2019, 2:26 PM IST
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने हाल में ग्रीनलैंड द्वीप को खरीदने की इच्छा ज़ाहिर की. ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जो फिलहाल डेनमार्क (Denmark) का भूभाग है. नाम का खेल देखिए कि आइसलैंड (Iceland) नाम का द्वीप हरा भरा है और ग्रीनलैंड बर्फ की सफेद चादर से ढंका हुआ है. साथ ही, इस द्वीप की भौगोलिक परिस्थितयां ऐसी हैं कि यहां बहुत कम आबादी रहती है. ऐसे में ट्रंप या अमेरिका की इस द्वीप को खरीदने की इच्छा से सवाल उठता है कि आखिर इससे वह क्या हासिल करना चाहता है और क्या वाकई ग्रीनलैंड खरीदा जा सकता है. ऐसे ही पांच ज़रूरी सवालों के जवाब इस रपट में जानिए.

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1. ग्रीनलैंड क्यों चाहता है अमेरिका?
एक ऐसा द्वीप, जिसका 80 फीसदी हिस्सा ग्लेशियरों से ढंका (Glaciers) है और जहां 60 हज़ार से भी कम लोग रहते हैं, इस पर अमेरिका की नज़र क्यों गड़ी हुई है? ये एक जायज़ सवाल है, जिसका जवाब अब तक ट्रंप ने नहीं दिया है, लेकिन जानकारों के (Experts Analysis) हवाले से सीएनएन ने ऐसे ही ज़रूरी सवालों के जवाब खोजे हैं. आइए जानें कि आखिर क्यों अमेरिका की निगाहें इस द्वीप पर गड़ी हुई हैं.

सबसे पहली बात तो यही है कि ग्रीनलैंड के बारे में विशेषज्ञ मानते हैं कि यहां अपार प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं. लौह अयस्क, सीसा, ज़िंक, हीरा, सोना और यूरेनियम व तेल जैसे दुनिया के दुर्लभ तत्वों के इस द्वीप पर होने की भरपूर संभावनाएं जताई जा चुकी हैं. दूसरी बात ये है कि इस द्वीप की प्राकृतिक संपदा अब तक अछूती है. नासा ने इसी साल यह पाया था कि ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण ग्रीनलैंड के इतिहास में ग्लेशियर पिघलने की दो सबसे बड़ी घटनाएं हुईं. ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते बर्फ पिघलती है, तो यहां खनिजों व प्राकृतिक तत्वों का खनन आसान भी हो सकता है.

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ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते बर्फ पिघलती है, तो ग्रीनलैंड में खनन आसान हो सकता है.

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राजनीतिक महत्व भी है
एक और अहम बात यह है कि अमेरिका के लिए यह द्वीप भौगोलिक व राजनीतिक नज़रिए से भी खासा अहम है. वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी एक रपट में लिखा :

आर्कटिक सर्कल के उत्तर में 750 मील पर स्थित इस द्वीप पर अमेरिकी बैलेस्टिक मिसाइल के अर्ली वॉर्निंग सिस्टम का रडार स्टेशन मौजूद है. इस बेस को अमेरिकी वायुसेना और उत्तर अमेरिकी एयरोस्पेस डिफेंड कमांड अपने अधिकार में रखते हुए इस्तेमाल भी करते हैं.


और, ट्रंप की महत्वाकांक्षा
इस द्वीप को खरीदने की सिर्फ इच्छा नहीं बल्कि उनकी महत्वाकांक्षा भी दर्शाती है. ट्रंप खुद को इतिहास के पन्नों में अमर करना चाहते हैं, इसलिए वह इस तरह की कोशिश में जुटे हैं. अगर अमेरिका उनके कार्यकाल में ग्रीनलैंड खरीद पाने में कामयाब हुआ, तो यह घटना ट्रंप को तो अमर कर ही देगी, साथ ही अमेरिका के इतिहास में वह सबसे कामयाब राष्ट्रपतियों की सूची में शामिल भी हो सकेंगे.

2. क्या वाकई ग्रीनलैंड बिकाऊ है?
ट्रंप के इस तरह की इच्छा जताने के बाद देश की सरकार ने एक ट्वीट किया, जिसमें कहा गया 'ग्रीनलैंड खनिज संपदा, शुद्ध पानी और बर्फ, जलीय जीवन और रिन्यूएबल ऊर्जा का कुदरती स्रोत तो है ही, एडवेंचर पर्यटन के लिए भी मशहूर है... हम व्यापार के लिए खुली मानसिकता रखते हैं लेकिन बिक्री के लिए नहीं.'



ग्रीनलैंड अस्ल में डेनमार्क के अधिकारक्षेत्र में आता है, लेकिन वहां एक स्वायत्त सरकार है. डेनमार्क ने 1979 में इस द्वीप का शासन संभाला था, लेकिन 2008 में एक संशोधन के बाद द्वीप को और अधिक स्वायत्ता दी गई.

3. क्या इस तरह की बात फितूर है?
डेनमार्क के एक इतिहासकार टेग कार्स्टेड की मानें तो ग्रीनलैंड को खरीदने की कोशिश अमेरिका पहले भी कर चुका है. 1946 में, संयुक्त राष्ट्र की एक बैठक में तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन के कार्यकाल में राज्य सचिव जेम्स बायर्न्स ने डेनमार्क के विदेश मंत्री के साथ ग्रीनलैंड को खरीदने के सिलसिले में चर्चा की थी. इतिहास ये भी बताता है कि करीब 80 साल पहले जब अमेरिका ने अलास्का को खरीदा था, तब भी अमेरिका ग्रीनलैंड को खरीदना चाहता था.

4. इससे पहले भी अमेरिका खरीद चुका है कई द्वीप
साल 1867 में रूस से 72 लाख डॉलर में अमेरिका ने अलास्का खरीदा था. उस वक्त इस डील की बेहद आलोचना हुई थी और तत्कालीन राष्ट्रपति को इतिहासकारों ने 'मूर्ख' तक लिख दिया गया था. 1898 में अमेरिका ने स्पेन से 20 मिलियन डॉलर में फिलीपीन द्वीप और 1917 में डेनमार्क से 25 मिलियन डॉलर में वर्जिन आइलैंड खरीदा था.

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ग्रीनलैंड स्थित थ्यूल एयरबेस पर नासा का एक रिसर्च एयरक्राफ्ट. यह एयरबेस अमेरिकी कमांड में है.


इससे पहले का भी इतिहास है जब अमेरिका ने दूसरे देशों से भूमि अधिग्रहण किया था. 1803 में फ्रांस से अमेरिका ने लुइज़ियाना भूभाग खरीदा था, जो वर्तमान में अमेरिका का करीब एक चौथाई भाग है. लेकिन ये बहुत पुरानी बातें हैं और पिछले करीब सौ सालों में अमेरिका ने विदेशों से इस तरह का कोई बड़ा भूमि अधिग्रहण नहीं किया है.

5. बिका तो क्या कीमत होगी ग्रीनलैंड की?
हालांकि डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ही अमेरिका की इस इच्छा को स्वप्न बता चुके हैं, लेकिन फिर भी भविष्य में अगर इस द्वीप का सौदा हुआ, तो दुनिया के सबसे बड़े इस द्वीप की क्या कीमत अमेरिका चुकाएगा? इस प्रश्न का कोई सटीक जवाब नहीं है, लेकिन एक अनुमानित आंकड़ा ज़रूर है जो काफी सटीक लगता है. यूएस के आर्काइव में सुरक्षित दस्तावेज़ों के हवाले से कहा गया है कि 1946 में अमेरिका ने जब डेनमार्क के सामने ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव रखा था, तब सोने के तौर पर 100 मिलियन डॉलर की कीमत कोट की थी.

अब अगर इसी आंकड़े को वर्तमान अर्थव्यवस्था और मुद्रास्फीति के आधार पर समझें तो यह कीमत 1.3 अरब डॉलर के करीब बैठती है. दूसरी बात है कि तब अमेरिका ने यह रकम सोने के रूप में देने की पेशकश की थी लेकिन अब क्या पेशकश होगी? यह कहना मुश्किल है क्योंकि फिलहाल तो ऐसी किसी डील पर ही सवालिया निशान लगा हुआ है.

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First published: August 18, 2019, 1:57 PM IST
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