• Home
  • »
  • News
  • »
  • knowledge
  • »
  • आंधी बनकर उभरी स्वतंत्र पार्टी कैसे एक झटके में हो गई खत्म?

आंधी बनकर उभरी स्वतंत्र पार्टी कैसे एक झटके में हो गई खत्म?

स्वतंत्र पार्टी के संस्थापक भारत रत्न से सम्मानित राजगोपालाचारी.

स्वतंत्र पार्टी के संस्थापक भारत रत्न से सम्मानित राजगोपालाचारी.

भारत के लोकतंत्र में उदारवादी समाजवाद का विचार लेकर पैदा हुई सी राजगोपालाचारी की पॉलिटिकल पार्टी, जो Pt. Nehru के विचार और नीतियों के खिलाफ थी. जानिए​ कि जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ शुरू हुई, नेहरू की Congress के सामने अपने उठान पर आई स्वतंत्र पार्टी कैसे इंदिरा गांधी की कांग्रेस के समय कैसे ढह गई.

  • Share this:
61 साल पहले एक राजनीतिक पार्टी (Political Party) का उदय इसलिए हुआ था क्योंकि लोकतंत्र के लिए मज़बूत विपक्ष की ज़रूरत महसूस की गई थी. भारत के आखिरी गवर्नर जनरल रहे भारत रत्न (Bharat Ratna) चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के साथ एनजी रंगा और मीनू मसानी जैसे दिग्गजों के साथ स्थापित हुई स्वतंत्र पार्टी (Swatantra Party) जिस रफ्तार से उभरी थी, सिर्फ 15 सालों में उसी तेज़ झटके के साथ खत्म भी हो गई. जानिए इस पार्टी के चढ़ाव और उतार की कम सुनी लेकिन अहम कहानी.

राजनीतिक स्थितियों में कांग्रेस का वर्चस्व चुनावी सफलताओं का नतीजा नहीं, बल्कि इतिहास का नतीजा है. लेकिन, अब यह वर्चस्व सत्ता के मद में संसदीय लोकतंत्र को तबाह करने की तरफ है. इस लोकतंत्र को बचाने के लिए पर्दे के पीछे वाले विपक्ष की नहीं बल्कि खुले तौर पर सामने आने वाले विपक्ष की ज़रूरत है.


राजाजी के नाम से मशहूर रहे राजगोपालाचारी ने यह बात इसलिए कही क्योंकि 1957 के चुनावों में कांग्रेस की स्थिति और मज़बूत हुई और विपक्ष नाम का रह गया था. दूसरी तरफ, इस चुनाव से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के वामपंथी समाजवाद की तरफ झुकाव को लेकर माना जा रहा था, कि कांग्रेस को इसका नुकसान होगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं. ऐसे में, राजाजी ने अपने साथियों के साथ मिलकर एक नई राष्ट्रवादी पार्टी का गठन करने का विचार किया और 4 जून 1959 को स्वतंत्र पार्टी गठित हुई.

political history, c rajagopalachari, jawaharlal nehru, indira gandhi, congress history, political alliance, राजनीति इतिहास, सी राजगोपालाचारी, जवाहरलाल नेहरू, कांग्रेस इतिहास
महात्मा गांधी के साथ सी राजगोपालाचारी का यादगार चित्र.


क्या थीं स्वतंत्र पार्टी के उठान की वजहें?
1. नेहरूवादी समाजवाद को नकारना, जिसका झुकाव कथित तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा की तरफ हो गया था.
2. स्वतंत्र पार्टी में राजगोपालाचारी समेत वो नेता शामिल थे, जिनका जनसामान्य के बीच आधार और प्रभाव था.
3. इस पार्टी के कई नेता प्रधानमंत्री पद तक के चेहरे के तौर पर देखे गए थे.
4. बिहार, उड़ीसा के राजघरानों द्वारा बनाई गई पार्टियां स्वतंत्र पार्टी में शामिल हुईं और 1967 में इन राज्यों में स्वतंत्र पार्टी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर मुख्य विपक्ष में आई. इसके बाद राजस्थान के राजघराने इस पार्टी से जुड़े. महारानी गायत्री देवी का शामिल होना बड़ी घटना थी.
5. इस पार्टी में गुजरात में भाईलालभाई पटेल जैसे नेता ज़मीन तैयार कर रहे थे तो तमिलनाडु में कामराज और गणेशन की क्षेत्रीय पार्टियां स्वतंत्र पार्टी में विलय हो रही थीं. वहीं, आंध्र में एनजी रंगा का करिश्माई नेतृत्व स्वतंत्र पार्टी को मज़बूत कर रहा था.
6. स्वतंत्र पार्टी आज़ादी के 20 साल बाद भी गरीबी, अशिक्षा जैसी समस्याओं को मुद्दा बना रही थी और किसानों, छोटे कामगारों और निम्न व मध्यम वर्ग की आवाज़ बनने की कोशिश कर रही थी. सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ भी लोगों को जागरूक किया जा रहा था.

कैसे नज़र आया स्वतंत्र पार्टी का उठान?
1959 में पार्टी के गठन के बाद पहला चुनाव 1962 का था. इस चुनाव में नई बनी स्वतंत्र पार्टी ने 18 लोकसभा सीटें जीतीं. बिहार, राजस्थान, गुजरात और उड़ीसा में कांग्रेस के मुकाबले स्वतंत्र पार्टी मुख्य विपक्ष के तौर पर उभरी. इसके बाद 1967 के चुनाव में स्वतंत्र पार्टी और कामयाब हुई क्योंकि 44 लोकसभा सीटें जीती. इस दौरान कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस पार्टी को माना जाने लगा था, लेकिन अगले चुनाव में क्या हुआ कि यह पार्टी फिर अस्तित्व को बचा नहीं सकी?

महागठबंधन की राजनीति में उलझी स्वतंत्र पार्टी
1971 के चुनाव से पहले 1969 के दौरान कांग्रेस के दो धड़े हो चुके थे. कामराज कांग्रेस ओ के मुख्य थे और साबित करना चाहते थे कि इंदिरा गांधी की कांग्रेस नहीं बल्कि उनकी कांग्रेस पार्टी असली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस है. इसके बाद पूरे विपक्ष ने एकजुट होकर एक महागठबंधन बनाने का ऐलान किया ताकि इंदिरा गांधी के खिलाफ मिलकर मुकाबला किया जा सके.

राजाजी को कामराज से कोई मुश्किल नहीं थी इसलिए उन्होंने अपनी पार्टी को महागठबंधन का​ हिस्सा बनने की रज़ामंदी दी. स्वतंत्र पार्टी के इतिहास पर स्वराज्य पत्रिका के विस्तृत लेख के मुताबिक इसके बाद महागठबंधन में सीटों का बंटवारा शुरू हुआ. मीनू मसानी और नारायण दांडेकर को स्वतंत्र पार्टी की तरफ से डील करने के लिए अधिकार दिए गए. इसी बीच एक तहलका मचा और इस गठबंधन की जान निकल गई.


'इंदिरा हटाओ' नारा और स्वतंत्र पार्टी का दांव
महागठबंधन बन ही रहा था कि अचानक जनसंघ के अटलबिहारी वाजपेयी, कांग्रेस ओ के रामसुभग सिंह, संयुक्त समाजवादी पार्टी के जॉर्ज फर्नांडीज़ व मधु लिमये जैसे नेताओं ने गठबंधन के कॉमन मिनिमम प्रोग्राम को गैरज़रूरी बताते हुए इंदिरा हटाओ के नारे की ज़रूरत बताई. मसानी और दांडेकर ने काफी कोशिश की कि कांग्रेस ओ कॉमन प्रोग्राम पर कायम रहे क्योंकि एक निगेटिव नारा उतना कारगर नहीं होगा जितना कि साझा कार्यक्रम लेकिन कोई नहीं माना.

political history, c rajagopalachari, jawaharlal nehru, indira gandhi, congress history, political alliance, राजनीति इतिहास, सी राजगोपालाचारी, जवाहरलाल नेहरू, कांग्रेस इतिहास
इंदिरा हटाओ के नारे को लेकर 1971 के चुनाव में विपक्ष में टूटन पड़ गई थी. फाइल फोटो.


राजाजी को इस बारे में बताने और स्वतंत्र पार्टी के गठबंधन के साथ नहीं बल्कि अकेले चुनाव लड़ने का विचार रखने के लिए मसानी ने राजाजी से मुलाकात करना चाही लेकिन उनसे पहले कामराज ने राजाजी से मिलकर उन्हें 'इंदिरा हटाओ' पर राज़ी कर लिया. मसानी की बात नहीं मानी गई और स्वतंत्र पार्टी बगैर कॉमन प्रोग्राम के गठबंधन के साथ चुनाव लड़ी.

नतीजे ने सबका दिल तोड़ दिया
1971 के चुनाव में स्वतंत्र पार्टी को सिर्फ 8 सीटें हाथ लगीं तो सबका दिल टूट गया. मसानी ने इस्तीफा दे दिया और राजाजी व स्वतंत्र पार्टी की कई कोशिशों के बाद भी वह वापस नहीं आए बल्कि कुछ ही समय में उन्होंने सक्रिय राजनीति से भी संन्यास ले लिया. 25 दिसंबर 1972 को राजाजी के निधन के साथ ही स्वतंत्र पार्टी का भी खात्मा हो गया था लेकिन अगले दो सालों में तीन अध्यक्षों के साथ यह पार्टी और ज़िंदा रही.

कांग्रेस के ही खिलाफ 1974 में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाली पार्टी भारतीय लोक दल में स्वतंत्र पार्टी के कई सदस्य शामिल हुए और 4 अगस्त 1974 को औपचारिक रूप से स्वतंत्र पार्टी खत्म हो गई.

क्या कुछ निशान रहे बाकी?
कहा जा सकता है कि स्वतंत्र पार्टी को बनाने वाले ही उसके पतन के ज़िम्मेदार रहे लेकिन यह भी है कि स्वतंत्र पार्टी का विचार एक धरोहर छोड़ गया. इस पार्टी के खत्म होने के 17 साल बाद कांग्रेस पार्टी के ही समय में पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने उन नीतियों को अपनाया, जिनकी वकालत कभी स्वतंत्र पार्टी किया करती थी. साथ ही, आंध्र प्रदेश में 2006 में गठित की गई लोक सत्ता पार्टी के संस्थापक एनजेपी नारायण मानते रहे हैं कि उनकी पार्टी बड़े अर्थों में स्वतंत्र पार्टी का ही आधुनिक संस्करण है.

ये भी पढ़ें :-

भारत के IT महानगर की जुदा कहानी, जानिए कैसे COVID-19 से बचा बेंगलूरु

इम्यूनिटी, सोशल डिस्टेंसिंग और आत्मनिर्भर भारत : सबका जवाब है 'साइकिल'

पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज