क्या हैं फीवर क्लीनिक, जो मुंबई और दक्षिण में हिट रहे लेकिन दिल्ली में नहीं

क्या हैं फीवर क्लीनिक, जो मुंबई और दक्षिण में हिट रहे लेकिन दिल्ली में नहीं
महाराष्ट्र और दक्षिणी राज्यों में बेहद कामयाब साबित हुए फीवर क्लीनिक.

दुनिया की तरह देश में Coronavirus संक्रमित ज़्यादातर मरीज़ एसिम्प्टोमैटिक पाए गए और दुनिया से अलग भारत में Death Rate कम रही. ऐसे में, Fever Clinics की भूमिका और अहम है, ताकि स्क्रीनिंग के ज़रिये शुरूआती Covid Symptoms के समय ही मरीज़ की पहचान हो सके. जानिए​ कि बेहद प्रभावित राज्यों में कैसे इन क्लीनिकों से मदद मिली.

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Maharashtra में Dharavi जैसी बड़ी घनी स्लम में Corona Virus महामारी पर काबू पाने के लिए फीवर क्लीनिक खास रणनीति के तौर पर सामने आए, लेकिन Delhi में इस कॉंसेप्ट को तरजीह नहीं मिली. इसी तरह, दक्षिणी राज्यों में भी फीवर क्लीनिक ने उल्लेखनीय कहानी लिखी लेकिन Andhra Pradesh में इस विचार को खारिज किया गया. भारत के अहम राज्यों में फीवर क्लीनिकों ने किस तरह Covid-19 के खिलाफ जंग लड़ने में मदद की? पहले ये जानते हैं कि फीवर क्लीनिक क्या हैं और कैसे यह सेट अप हुआ.

क्या है फीवर क्लीनिक सिस्टम?
देश के तमाम राज्यों में कोविड 19 महामारी से जूझने के लिए इस बीमारी के मरीज़ों के लिए खास अस्पताल बनाए गए. लेकिन इन अस्पतालों पर मामूली लक्षणों वाले या कोरोना जैसे लक्षणों वाले किसी और बीमारी के मरीज़ न दाखिल हों और कोरोना के मरीज़ों की पहचान भी की जा सके, इस मकसद से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बीते 7 अप्रैल को फीवर क्लीनिकों का सुझाव दिया था.

इन क्लीनिकों में बुखार जैसे लक्षणों की जांच किए जाने के बाद कोरोना के मरीज़ों की पहचान करना आसान हुआ और गंभीर मरीज़ों को कोविड केयर सेंटरों या अस्पतालों में भेजा जा सका. महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में इन क्लीनिकों ने अहम भूमिका निभाई, लेकिन कुछ राज्य इस विचार से परहेज़ करते नज़र आए.
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फीवर कैंपों या क्लीनिकों में स्क्रीनिंग ने मरीज़ों को पहचानने में बड़ी भूमिका निभाई.


कैसे होते हैं फीवर क्लीनिक?
हालांकि इस शब्द या विचार को अलग अलग राज्यों ने अलग ढंग से समझा और लागू किया, फिर भी मोटे तौर पर एक फीवर क्लीनिक में एक मेडिकल अफसर, एक लैब तकनीशियन और कम से कम एक स्टाफ होता है. जब मंत्रालय ने फीवर क्लीनिकों का सुझाव दिया था, तब देश में सिर्फ 4421 कुल केस थे और अब जबकि कुल केस 9 लाख के आंकड़े के करीब हैं, तब फीवर क्लीनिकों की अहमियत और बढ़ती है.

दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में फीवर क्लीनिकों की क्या भूमिका रही, इस बारे में द प्रिंट ने कई विशेषज्ञों से बातचीत पर आधारित एक रिपोर्ट छापी, जिसमें कई अहम तथ्य उभरकर सामने आए.

मुंबई : गेमचेंजर साबित हुए फीवर क्लीनिक
बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के डेटा की मानें तो 7 जुलाई तक महानगरी में 443 सक्रिय फीवर क्लीनिक थे, जहां करीब 28 हज़ार मरीज़ों की स्क्रीनिंग की जा चुकी थी. इनमें से 6 हज़ार से ज़्यादा मरीज़ों के टेस्ट किए गए थे. इन आंकड़ों में प्राइवेट डिस्पेंसरियों और डोर टू डोर सर्वे की स्क्रीनिंग शामिल नहीं है.

धारावी जैसी घनी बस्तियों में मरीज़ों को पहचानना बड़ी चुनौती था. ऐसे में कंटेनमेंट ज़ोन के आसपास संक्रमण को पहचानने और समय पर उसे सही इलाज देने के मकसद से इन क्लीनिकों का काफी योगदान रहा. मुंबई में हर फीवर क्लीनिक में छह लोगों की टीम रही. इन क्लीनिकों की वजह से एक तो अस्पतालों पर बोझ कम पड़ा, तो कोविड टेस्ट किए जाने में सुविधा हुई और लक्षणों को शुरूआती समय में जाना जा सका.


तमिलनाडु : बड़े हिट रहे ये कैंप
13 जुलाई दोपहर तक राज्य में कुल कन्फर्म केस 1 लाख 38 हज़ार से ज़्यादा ​थे, जिनमें से चेन्नई में ही 77,338 केस थे. दक्षिण भारत के सबसे बड़े हॉटस्पॉट के तौर पर उभरे चेन्नई में 8 मई से बनना शुरू हुए फीवर कैंप कुल 13,723 तक हो गए, जहां सरकारी डेटा के मुताबिक 5 जुलाई तक पौने नौ लाख लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी थी. इनमें से 10,569 Covid-19 मरीज़ मिले.

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एशिया की सबसे बड़ी स्लम है धारावी.


राज्य के स्वास्थ्य सचिव डॉ जे राधाकृष्णन ने फीवर क्लीनिकों को बड़ा कामयाब बताया. वहीं, राज्य के मुख्य सचिव ने सभी ज़िला कलेक्टरों को 'फीवर क्लीनिक मॉडल' को अपनाने के निर्देश दिए थे.

कर्नाटक : समय से आइसोलेट किए जा सके लोग
राजधानी बेंगलूरु में 8 जुलाई तक इन क्लीनिकों में 25 हज़ार से ज़्यादा लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी थी, जिनमें से पॉज़िटिव पाए गए 26 लोगों को फौरन क्वारंटाइन किया जा सका. फीवर क्लीनिकों की शुरूआत करने वाले पहले राज्य कर्नाटक में 5 जुलाई तक के डेटा के मुातबिक करीब 35 फीसदी मरीज़ लक्षण वाले थे. साथ ही, ज़्यादातर केस फीवर क्लीनिकों की मदद से पाए गए.

एक अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट कहती है कि सरकारी स्तर पर 31 फीवर क्लीनिक बनाए गए लेकिन निजी तौर पर भी अस्पतालों ने फ्लू कॉर्नर बनाए. बेंगलूरु के 198 वार्डों में करीब 25 हज़ार लोग इन क्लीनिकों तक पहुंचे. हालांकि इन क्लीनिकों से कुछ डॉक्टर असहमत दिखे. कर्नाटक कोविड कमेटी में महामारी विशेषज्ञ गिरिधर बाबू की मानें तो महामारी के समय में गैर संक्रमितों और संक्रमितों का एक ही जगह पर पहुंचना खतरनाक साबित हो सकता है.

दिल्ली : मोहल्ला क्लीनिकों को मिली तरजीह
राष्ट्रीय राजधानी में 484 मोहल्ला क्लीनिक आधारभूत स्वास्थ्य सुविधा के तौर पर कार्यरत रहे और वो पहले पॉइंट बने, जहां से मरीज़ों को कोविड 19 टेस्ट के लिए रेफर किया गया. इन क्लीनिकों में एक डॉक्टर, एक नर्स, एक फार्मासिस्ट और एक मल्टी वर्कर तैनात रहता है. सरकारी स्तर पर ये भी दावा किया गया कि यहां तैनात डॉक्टर कोरोना वायरस के लक्षणों और टेस्ट के लिए रेफर करने के लिए ट्रेंड है.

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फीवर क्लीनिक शुरू करने वाला पहला राज्य कर्नाटक रहा.


दिल्ली के स्वास्थ्य विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया कि यहां अलग से फीवर क्लीनिकों की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि मोहल्ला क्लीनिकों का सेट अप पहले से था. हालांकि आरएमएल और कुछ और निजी अस्पतालों में फ्लू कॉर्नर ज़रूर बनाए गए, जहां बुखार के मरीज़ों की स्क्रीनिंग की जाती रही. दूसरी ओर, सर गंगाराम अस्पताल में जो फीवर क्लीनिक बनाया गया था, वह बाद में कोविड इमरजेंसी वार्ड में तब्दील हो गया.

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आंध्र प्रदेश : खारिज किया गया कॉंसेप्ट
एक तरफ तेलंगाना ने अपने ढंग से फीवर क्लीनिक को लागू किया यानी अस्पतालों में जो ओपीडी वार्ड थे, उन्हें इस सुविधा में तब्दील किया गया. वहीं, आंध्र प्रदेश में महामारी में मुफ्त इलाज के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र के संयुक्त प्रयासों से शहरी स्वास्थ्य केंद्र बनाए गए. इसके अलावा, यहां गंभीर रोगियों को इलाज में प्राथमिकता के लिए ओपीडी में संदिग्ध कोविड मरीज़ों को देखा जा रहा है.

दूसरी तरफ, आंध्र के अतिरिक्त मुख्य सचिव के हवाले से लिखा गया है कि फीवर क्लीनिक का कॉंसेप्ट ब्यूरोक्रेटिक ज़्यादा है. लगातार निगरानी की ज़रूरत ज़्यादा है, जिसके लिए आंध्र में मोबाइल क्लीनिक संचालित हो रहे हैं. प्रशासन और सरकारी स्तर पर इस कॉंसेप्ट को खारिज किए जाने के बावजूद राज्य में कहीं कहीं फीवर क्लीनिकों की सुविधा दी गई है.
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