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शिवसेना को बुलंदियों तक पहुंचाने में अहम है 'सामना' का रोल, उद्धव के बाद अब कौन लेगा जिम्मेदारी

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Updated: November 29, 2019, 2:37 PM IST
शिवसेना को बुलंदियों तक पहुंचाने में अहम है 'सामना' का रोल, उद्धव के बाद अब कौन लेगा जिम्मेदारी
बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद से उद्धव ठाकरे ही सामना के संपादक पद पर रहे हैं.

बीते एक महीने में महाराष्ट्र (Maharashtra) में सरकार (Government) बनाने को लेकर हुई उठापटक के दौरान सामना (Saamana Newspaper) खूब चर्चा में रहा है. इस अखबार के एडिटोरियल को ही शिवसेना का आधिकारिक स्टैंड माना जाता है. लेकिन ये परंपरा कैसे बनी? कहानी बेहद दिलचस्प है.

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  • Last Updated: November 29, 2019, 2:37 PM IST
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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने शिवसेना मुखपत्र 'सामना' (Saamana) के संपादक पद से इस्तीफा दे दिया है. अब लोगों को इस अखबार में उद्धव ठाकरे का नाम संपादक के तौर पर नहीं दिखाई देगा. अभी संजय राउत अखबार के कार्यकारी संपादक हैं. बीते एक महीने में महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर हुई उठापटक के दौरान सामना खूब चर्चा में रहा है. इस अखबार के एडिटोरियल को ही शिवसेना का आधिकारिक स्टैंड माना जाता है. लेकिन ये परंपरा कैसे बनी? कहानी बेहद दिलचस्प है.

1988 में हुई शुरुआत
दैनिक सामना पढ़ना महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में लोगों की आदत में शुमार है. साल 1988 में इस अखबार की शुरुआत बालासाहेब ठाकरे ने इस तर्क के साथ की थी जो करवरेज उनकी पार्टी को मिलनी चाहिए वो नहीं मिल पाती है. और उन्हें और ज्यादा दुख इस बात का भी था कि जिस मराठी मानुष की लड़ाई वो लड़ रहे हैं, उसी मराठी भाषा के अखबार भी उनकी आलोचना करते हैं.

तेजी से मिली लोकप्रियता

दिलचस्प रूप से जब इसकी शुरुआत हुई तो शिवसेना कार्यकर्ताओं के अलावा दूसरे लोगों ने भी इसे हाथोंहाथ लिया. सामना सफल मुखपत्र का परिचायक बन गया. देश में शायद ही कोई दूसरा मुखपत्र हो जिसकी इतनी चर्चा होती है. 90 के शुरुआती दशक में इस अखबार की लोकप्रियता मुंबई इतनी बढ़ गई थी कि लोग टीवी देखने के अलावा इसे जरूर पढ़ना पसंद करते थे.

शिवसैनिकों के साथ बाल ठाकरे का संवाद
सामना उन शिवसैनिकों के लिए एक कनेक्शन के तौर पर भी काम करता था जो सीधे तौर पर बाल ठाकरे के संपर्क में नहीं थे. यहां तक कि पार्टी के नेताओं के लिए सामना वैचारिक अस्त्र भी मुहैया कराता था. अखबार के जरिए ही पार्टी के नेता ये जान पाते थे कि उनका नेता (बाल ठाकरे) आखिर सोचता क्या है?
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इसका एक उदाहरण मनोहर जोशी के वक्तव्य से निकाला जा सकता है. मनोहर जोशी ने बाल ठाकरे की मृत्यु के थोड़ी ही देर बाद एक न्यूज चैनल से इंटरव्यू में कहा था कि शिवसेना में किसी मुद्दे पर बहस नहीं होती थी. बाल ठाकरे ने जो कह दिया, बस वही पार्टी लाइन होती थी. सामान्य तौर पर बाल ठाकरे सामना के जरिए ही अपनी बातें समर्थकों और विरोधियों तक पहुंचाते थे.

न्यूज मीडिया में रिसेप्शन
आप अब भी देखिए तकरीबन ऐसा ही होता है. सामना के एडिटोरियल में जो भी छपता है सामान्य तौर पर सभी मीडिया संस्थान उसे ही पार्टी का स्टैंड मानते हैं. ये बाल ठाकरे के जमाने से होता आ रहा है. तब भी अखबार सामना के एडिटोरियल को बाल ठाकरे का वर्जन मानते थे और वास्तविकता में ऐसा होता भी था.

कई और अखबार
हालांकि ऐसा नहीं है महाराष्ट्र में शिवसेना का ही मुखपत्र छपता है. पीजैन्ट्स एंड वर्कर्स पार्टी (PWP) का भी मुखपत्र निकलता है. विलास राव देशमुख का भी लातूर से एकमत अखबार निकलता था. कमल किशोर कदम का लोकपत्र और दर्दा परिवार का अखबार लोकमत भी शामिल है. पवार परिवार भी सकाल की बड़ी रिडरशिप की वजह से काफी मदद पाता है.

सामना की रिपोर्ट्स सरकारी नीतियों और जनहित के मुद्दों पर बिल्कुल निष्पक्ष तरीके से प्रकाशित की जाती रही हैं. हां, जब बात पार्टी की आती है तब ये अखबार 'गुड जर्नलिजम' को बाय भी कह देता है. बाल ठाकरे किसी भी रिपोर्टर से मुश्किल से ही बात करते थे इस वजह से वक्त के साथ सामना उनकी आवाज बनकर उभरता चला गया.

प्रेस कॉन्फ्रेंस और बाल ठाकरे
बाल ठाकरे ने कभी दूसरे अखबारों और मीडिया चैनलों की परवाह नहीं की. उनका मानना था कि मीडिया उनकी निगेटिव इमेज पेश करता है. बाल ठाकरे सामना में अपने लिखे हुए एडिरोयल को ही अपना सही वर्जन मानते थे. और शायद यही कारण है कि बाल ठाकरे प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते थे. अगर कभी किसी मुद्दे पर कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस होती भी थी तो पार्टी के दूसरे महत्वपूर्ण नेता उसमें जाते थे.

संजय राउत


माना जाता है कि सामना की रिडरशिप 6 लाख कॉपी के आस-पास है. इसके तीन एडिशन मुंबई, औरंगाबाद और पुणे से छपते हैं. सामना के एक्जिक्यटिव एडिटर संजय राउत हैं. लेकिन ये मानना कि एडिटोरियल लाइन वो तय करते हैं बिल्कुल गलत होगा. मोटे तौर पर इसकी एडिटोरियल लाइन बाल ठाकरे तय करते रहे, फिर उद्धव तय करते हैं. हालांकि यह ठीक बात है कि संजय राउत इस अखबार की आत्मा को समझते हैं और शायद यही कारण है कि वो शिवसेना के सबसे भरोसेमंद प्रवक्ता हैं.

(फर्स्टपोस्ट के लेख से इनपुट के साथ)
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First published: November 29, 2019, 2:00 PM IST
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