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क्या वाकई 'रामपुर के सरकार' हैं कद्दावर नेता आज़म खान?

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Updated: September 26, 2019, 6:54 AM IST
क्या वाकई 'रामपुर के सरकार' हैं कद्दावर नेता आज़म खान?
रामपुर से सांसद आज़म खान. फाइल फोटो.

कभी उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के मुस्लिमों (Muslims) के मसीहा कहे गए तो कभी सेक्युलर आज़म खान (Azam Khan) का राजनीति में क्या कद है? दस अनसुने किस्सों में आज़म खान की बायोग्राफी.

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रामपुर. अपनी भैंस से लेकर संसद (Parliament) में बहस तक आप आज़म खान के तेवरों से वाकिफ़ रहे हैं लेकिन आज़म खान का पूरा व्यक्तित्व बहुत से दिलचस्प वाकयों को छुपाए हुए है. उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट (Rampur) से सांसद चुने गए खान नौ बार विधानसभा चुनाव (Assembly Election) जीत चुके हैं. उप्र में समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) की सरकार में अहम भूमिकाएं निभा चुके हैं और आजकल भारतीय जनता पार्टी सरकार (BJP Government) उनके खिलाफ जो मुकदमे दायर कर रही है, उनके कारण चर्चा में हैं. आज़म खान के व्यक्तित्व, कद और जीवन का खुलासा करतीं कुछ दिलचस्प बातें जानें.

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कतराते हैं या घबराते हैं अफसर?
असल में सपा के कद्दावर नेता (SP Leader) आज़म खान की छवि दबंग नेता की रही है और राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि उनके इसी दबंग एटिट्यूड के चलते ब्यूरोक्रेसी (Bureaucracy) उन्हें नापसंद करती रही है. सपा सरकार के वक्त खान ने रामपुर में डॉक्टरों की फीस की राशि तय करवा दी थी, तो वहीं गोश्त बाज़ार (Meat market) में गोश्त के दाम भी फिक्स करवा दिए थे. अपनी दबंगई के दम पर अपने कायदे बनवाने के इस एटिट्यूड के कारण अफसरों का एक बड़ा वर्ग उनसे कन्नी काटता रहा.

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लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जब सेलिब्रिटी और पूर्व सांसद जया प्रदा को चुनाव मैदान में उतारा तो खान ने 1 लाख से ज़्यादा वोटों से जीत दर्ज की.


क्यों कहे जाते हैं रामपुर के सरकार?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत को समझने वाले पत्रकारों और विशेषज्ञों की मानें तो आज़म खान ने रामपुर को उत्तर प्रदेश का सबसे खूबसूरत शहर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. दबंग सियासी छवि के साथ ही लगातार जीतने और नामी उम्मीदवारों को हराने जैसी कई वजहों से खान को एक बड़ा वर्ग 'रामपुर के सरकार' के तौर पर भी संबोधित करता है.
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कद्दावरों से लिया लोहा
आज़म खान अपने सियासी करियर में नामचीनों से लोहा लेने में कभी पीछे नहीं रहे. कांग्रेस ने जब रामपुर के नवाब खानदान के वारिसों को टिकट दिया तब भी खान ने बाज़ी मारी और बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जब सेलिब्रिटी और पूर्व सांसद जया प्रदा को चुनाव मैदान में उतारा तो खान ने 1 लाख से ज़्यादा वोटों से जीत दर्ज की. स्थानीय स्तर हो या प्रदेश स्तर, आज़म खान अपनी ताकत और रसूख साबित करने में कभी कतराए नहीं.

विवादों से चोली दामन का साथ
रैलियों और बयानों में निजी टिप्पणियां और अभद्र भाषा के इस्तेमाल के आरोप आज़म खान पर अक्सर लगते रहे. इसके अलावा भड़काने वाले या सांप्रदायिक बयानों को लेकर भी वो आलोचना के शिकार हुए. 'ताजमहल को वक्फ बोर्ड के सुपुर्द किया जाना चाहिए, बजाय आर्कियोलॉजिकल सर्वे जैसी संस्था को सौंपने के' या 'कारगिल की चोटियों को जीतने वाले फौजी मुस्लिम थे, न कि हिंदू', ऐसे कई बयानों के कारण खान समय समय पर फंसते हुए भी नज़र आए.

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मुलायम सिंह यादव के करीबी माने जाने वाले आज़म ने सपा के भीतर भी बाग़ी तेवरों से परहेज़ नहीं किया.


क्या वाकई सेक्युलर हैं आज़म खान?
इस बारे में विशेषज्ञों की राय अलग अलग है. द प्रिंट का एक लेख कहता है कि आज़म खान की छवि एक सेक्युलर नेता की रही है क्योंकि भले ही रामपुर की आधी आबादी मुसलमानों की हो लेकिन हिंदुओं के वोट भी उन्हें मिलते रहे हैं. इस लेख में ये भी उल्लेख है कि खान इसलिए भी सेक्युलर छवि बना पाए हैं क्योंकि वो हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी की तरह मुसलमानों के पक्ष के मुद्दे उठाने से बचते रहे हैं.

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दूसरी ओर, पहले बताए गए बयानों के साथ ही कुछ और वाकयों का हवाला देकर इसकी उलट राय रखी जाती है. पुलिस विभाग के कुछ कर्मचारियों ने आरोप लगाया था कि मुज़फ्फरनगर के दंगों के बाद आज़म खान ने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ एक्शन लेने से पुलिस को रोका था. बहरहाल, मुज़फ्फरनगर दंगों के फौरन बाद पुलिस विभाग को भैंसें खोजने के लिए दौड़ाने वाले खान उत्तर प्रदेश के शिया समुदाय की नाराज़गी भी अक्सर झेलते रहे हैं.

महिलाओं के साथ हालिया विवाद
2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा प्रत्याशी जया प्रदा के खिलाफ आज़म खान ने जिस भाषा का प्रयोग किया था, उसे अभद्र करार देते हुए चुनाव आयोग ने उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की थी. इसके अलावा संसद में जुलाई महीने में ट्रिपल तलाक पर चल रही बहस के दौरान उप सभापति रमा देवी को लेकर उन्होंने एक टिप्पणी की थी, जिसके बाद आज़म खान को माफी मांगनी पड़ी थी.

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उप सभापति रमा देवी को लेकर एक टिप्पणी के बाद आज़म खान को माफी मांगनी पड़ी थी.


सपा से पहले चार पार्टियों में रहे आज़म
फ़िलहाल समाजवादी पार्टी के शीर्ष स्तर के नेताओं में शुमार आज़म खान सपा के साथ 1993 में जुड़े थे. उससे पहले खान चार अलग पार्टियों के सदस्य के तौर पर राजनीति में सक्रिय थे. 1980 से 1992 के बीच खान ने चार विधानसभा चुनावों के लिए जनता पार्टी सेक्युलर, लोकदल, जनता दल और जनता पार्टी का दामन थामा था. हालांकि वह हर बार चुनाव जीते ज़रूर थे.

ऐसे हुई थी सियासत की शुरूआत
1970 के दशक में आज़म खान सियासत में आ चुके थे. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जनरल सेक्रेट्री का चुनाव जीतने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति की मुख्यधारा में आने का मन बना लिया था. हालांकि राजनीति में आने से पहले खान ने वकालत भी की. इमरजेंसी के दौरान महीनों तक खान को जेल में बंद किया गया था और जेल में एकान्त कारावास या कालकोठरी में रखे जाने वाले चुनिंदा कैदियों में से एक खान रहे थे.

पत्नी का भी रहा पॉलिटिकल कनेक्शन
1981 में आज़म खान ने एएमयू की स्कॉलर रहीं ताज़ीन फातिमा के साथ शादी की थी. फातिमा पहले प्रोफेसर रह चुकी हैं और अब आज़म खान द्वारा 2006 में स्थापित की गई मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की प्रो चांसलर भी हैं. 2014-15 में फातिमा राज्यसभा की सदस्य बनी थीं. आज़म और ​फातिमा के दो बेटे अब्दुल्ला और अबीद हैं, जिनमें से अब्दुल्ला राजनीति में सक्रिय हो चुके हैं.

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आज़म खान की पत्नी ताज़ीन फातिमा और उनके बेटे भी सियासत से जुड़े हुए हैं.


अपनी पार्टी में भी रहे विद्रोही
मुलायम सिंह यादव के करीबी माने जाने वाले आज़म ने सपा के भीतर भी बाग़ी तेवरों से परहेज़ नहीं किया. अमर सिंह को तवज्जो, जया प्रदा की उम्मीदवारी और कल्याण सिंह के पार्टी में आने की चर्चाओं जैसे मुद्दों पर आज़म ने पार्टी से सीधा टकराव मोल लिया था. बाद में उन्हें पार्टी में मुलायम वापस लेकर आए. ताज़ा घटनाक्रमों में आज़म खान के खिलाफ जो आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं, उन पर भी अखिलेश यादव साफ कह चुके हैं कि उनकी सरकार बनते ही इन तमाम मुकदमों को वापस लिया जाएगा. इस पूरे ब्योरे के बाद आप समझ सकते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में 'रामपुर के दबंग सरकार' की दबंगई का आलम क्या है.

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First published: September 26, 2019, 6:50 AM IST
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