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हर बार सितंबर में क्यों रुलाने लगते हैं प्याज़ के दाम?

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: September 24, 2019, 4:15 PM IST
हर बार सितंबर में क्यों रुलाने लगते हैं प्याज़ के दाम?
न्यूज़18 क्रिएटिव

प्याज़ के दामों (Onion Price) के बढ़ने की कहानी इस साल की ही नहीं, अमूमन हर बार की है. आपको जानना चाहिए कि व्यवस्थाओं (Onion Market) में कहां क्या खामियां हैं, जिनका बोझ आपकी जेब पर पड़ता है.

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  • Last Updated: September 24, 2019, 4:15 PM IST
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गुज़रते हुए मॉनसून (Monsoon) में आपकी थाली का ज़ायका सादा रह जाता है या फिर थाली की कीमत (Food Price) बढ़ जाती है. जी हां, अगर आप बीते कुछ सालों को याद करें तो आपको एहसास होगा कि कुछ सब्ज़ियों खासकर प्याज़ के दाम (Onion Prices) अगस्त से अक्टूबर के बीच बार बार रुलाते रहे हैं. ऐसा क्यों होता है? प्याज़ के दाम इस बार इस कदर बढ़ रहे हैं कि केंद्र सरकार (Central Government) 22 रुपये किलो की कीमत पर प्याज़ बेचने पर मजबूर है और भारी भीड़ को देखते हुए ये कहना भी मुश्किल है कि सबकी मांग की पूर्ति (Demand & Supply) इस तरह हो जाएगी.

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प्याज़ की फसल (Onion Crop), मौसम और प्याज़ के व्यापार से जुड़े कुछ पेंच ऐसे हैं, जिन्हें आप समझेंगे तो जानेंगे कि प्याज़ की कीमतों में इज़ाफा होने की वजहें (Price Rise Reasons) क्या होती हैं और क्यों इन्हीं खास दिनों यानी दीवाली (Diwali) से ऐन एक दो महीने पहले तक दाम क्यों बढ़े रहते हैं. देश के कई राज्यों में प्याज़ की कीमतें आसमान छूने को बेताब हो उठी हैं और बाज़ार में (Onion Market) प्याज़ के दाम 80 से 90 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं. ऐसे में आपको जानना चाहिए कि अगस्त, सितंबर और अक्टूबर में प्याज़ क्यों रुलाता है.

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इस साल प्याज़ का उत्पादन पिछले साल की तुलना में तकरीबन आधा रह गया है.


बाज़ार और भंडारण
मार्च व अप्रैल में प्याज़ की फसल तैयार होकर बाज़ार में आना शुरू होती है और भंडारण के लिए सरकारी व गैर सरकारी इंतज़ाम किए जाते हैं. गर्मियों के मौसम में प्याज़ के दाम बंपर आवक के कारण तुलनात्मक रूप से काफी कम हो जाते हैं. फिर बारिश के मौसम की शुरूआत तक भंडारों से आपूर्ति शुरू होती है. भंडारण की व्यवस्था बड़े पैमाने पर उच्च स्तरीय न होने के कारण शुरूआती बरसात और नमी के कारण ही स्टोर किया गया प्याज़ बड़ी मात्रा में सड़ जाता है.

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हर बार बारिश के अनुसार फसल कितनी होगी, ये भी तय होता है. पिछले कुछ सालों के आंकड़े बताते हैं कि प्याज़ का उत्पादन अनियमित रहा है. 2015 में 38 लाख क्विंटल से ज़्यादा प्याज़ की आवक थी तो 2016 में 65 लाख क्विंटल से ज़्यादा. पिछले साल यानी 2018 में साढ़े 60 लाख क्विंटल प्याज़ की आवक रही लेकिन इस साल सितंबर तक साढ़े 31 लाख क्विंटल ही आवक हुई है. साफ है कि इस साल प्याज़ का उत्पादन पिछले साल की तुलना में तकरीबन आधा रह गया है.

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पिछले 5 सालों में सितंबर का संकट
सरकारी डेटा की मानें तो सितंबर के महीने में प्याज़ के दामों का संकट बढ़ जाता है. औसत के मुताबिक सितंबर में 6 से साढ़े 6 लाख मीट्रिक टन प्याज़ का कारोबार होता है. 2015 में सूखे और अनियमित बारिश की वजह से सिर्फ 3.4 मीट्रिक टन की आवक रही थी इसलिए तब प्याज़ के दाम बेतहाशा बढ़े थे. इस साल 22 सितंबर तक इस महीने सिर्फ 3.1 मीट्रिक टन प्याज़ बाज़ार में आया है और दाम आप देख सकते हैं कि 80 से 90 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुके हैं.

कितने बढ़ गए हैं देश भर में दाम?
देश भर में प्याज़ की मांग के मुताबिक आपूर्ति का संकट खड़ा हो चुका है. पश्चिम बंगाल में मार्च में प्याज़ की जो कीमत थी, कोलकाता में सितंबर महीने में 100 और मालदा में 115 फीसदी तक बढ़ चुकी है. भारतीय कृषि विभाग के डेटा के आंकड़ों की मानें तो पूरे देश में हाल में एक महीने के अंदर प्याज़ के दाम 47 फीसदी तक उछल चुके हैं और उछाल जारी है.

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तो क्या मौसम है विलेन?
भारत में खेती बहुत हद तक मौसम यानी बरसात पर ही आधारित है. समय से और सही अनुपात में अगर बारिश हो तो तमाम फसलें अच्छी हो सकती हैं लेकिन पिछले कुछ सालों में लगातार जलवायु परिवर्तन होने के कारण बारिश अनियमित हुई है इसलिए कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ जैसी स्थितियां बनी हैं. इस बार भी प्याज़ के प्रमुख उत्पादक कई राज्यों में बारिश की मार रही है. कहीं देर से हुई तो कहीं ज़रूरत से ज़्यादा तो कहीं बहुत कम.

इसका असर अब होगा ये कि अक्टूबर से दिसंबर के बीच प्याज़ की फसल की बुवाई के समय मुश्किलें आएंगी और बारिश के असर को देखते हुए बुवाई प्रभावित होगी. फिर मार्च और अप्रैल में प्याज़ की फसल तैयार होगी और बाज़ार व भंडारण के लिए जाएगी. यही हर साल होता है.

आयात निर्यात का गणित
प्याज़ की आपूर्ति के संकट को देखते हुए प्याज़ के निर्यात को कम करने के मकसद से सरकार ने प्याज़ के लिए एक्सपोर्ट की शर्तें कड़ी कर दी हैं यानी मिनिमम एक्सपोर्ट प्राइस को बढ़ा दिया गया है. दूसरी ओर, चीन, अफगानिस्तान और मिस्र जैसे देशों से प्याज़ के आयात को लेकर भी खबरें हैं लेकिन ये आयात होता भी है तो अक्टूबर के दूसरे हफ्ते के बाद तक ही दामों में राहत मिल पाएगी. दो साल पहले 2017 में भी ऐसा हुआ था कि भारत अप्रैल से जुलाई के महीने में प्याज़ का निर्यात 56 फीसदी ज़्यादा कर रहा था और सितंबर से नवंबर के बीच दूसरे देशों से प्याज़ मंगा रहा था.

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पंजाब में होलसेल बाज़ार में 15-20 रुपये प्रति किलो से प्याज़ के दाम 48 रुपये प्रतिकिलो तक पहुंच गए हैं. किसान, दुकानदार और ग्राहक सभी परेशान हैं.


काला बाज़ारी भी है बड़ी समस्या
मॉनसून के उतार के मौसम में प्याज़ के रुलाने की कहानी के आखिर में ये भी जानें कि देश में प्याज़ का स्टॉक व्यापारी बड़े स्तर पर करते हैं और मांग बढ़ने के बाद ज़्यादा दामों पर प्याज़ बाज़ार में छोड़ते हैं. चंडीगढ़ के एक होलसेलर के हवाले से न्यूज़18 की खबर में कहा गया है कि 'प्याज़ को दबाकर रख लेना मुसीबत बढ़ाता है. होलसेल में 15-20 रुपये प्रति किलो से प्याज़ के दाम 48 रुपये प्रतिकिलो तक पहुंच गए हैं तो सरकार को इस तरह के गलत भंडारण को लेकर निर्णायक कदम उठाने चाहिए'.

ये भी गौरतलब है कि केंद्र सरकार प्याज़ का एक स्टॉक रखती है. इस साल रखे गए 56 हज़ार टन का स्टॉक था, उसमें से अब तक 16 हज़ार टन खाली हो चुका है.

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First published: September 24, 2019, 3:07 PM IST
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