क्यों टूटी थी शकुंतला देवी की शादी? समलैंगिकों पर उन्होंने क्यों लिखी थी किताब?

क्यों टूटी थी शकुंतला देवी की शादी? समलैंगिकों पर उन्होंने क्यों लिखी थी किताब?
शकुंतला देवी के जीवन पर आधारित विद्या बालन स्टारर फिल्म रिलीज़ होने वाली है.

इस महीने के आखिर में ऑनलाइन रिलीज़ होने जा रही शकुंतला देवी की बायोपिक (Shakuntala Devi Biopic) में आप उनके किरदार में विद्या बालन को देखेंगे, लेकिन उससे पहले जानिए कि शकुंतला देवी का निजी जीवन कितना कठिन रहा. कैसे एक समलैंगिक के साथ उनकी शादी तलाक तक पहुंची और यही अनुभव एक ऐतिहासिक किताब के कारण बने.

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क्योंकि विद्या बालन (Vidya Balan) जैसी चर्चित अभिनेत्री किरदार निभा रही हैं या क्योंकि उन्होंने नंबरों की गणना में कंप्यूटर को मात दी थी या क्योंकि उन्होंने आने वाली नस्लों को गणित (Mathematics) आसानी से समझाने के जतन किए थे... ह्यूमन कंप्यूटर (Human Computer) कही जाने वाली शकुंतला देवी को इसलिए याद किया जाना चाहिए क्योंकि वह अपने समय से आगे थीं. समलैंगिकों (Homosexuality) पर उनकी किताब उनकी ज़ाती ज़िंदगी और शादी से मिले अनुभवों के बाद शोध का नतीजा थी.

अलग होने में कोई अनैतिकता नहीं है. दूसरों को अलग होने की इजाज़त न देना अनैतिकता है. अगर किसी के यौन संबंध समाज के कायदों के मुताबिक नहीं हैं, तो वह अनैतिक नहीं है... बल्कि अनैतिक वो हैं, जो उसे अलग होने के कारण सज़ा देते हैं.
शकुंतला देवी, द वर्ल्ड ऑफ होमोसेक्सुअल्स


साल 1977 : जो लेकर आया था सनसनी
डैलास की सदर्न मै​थडिस्ट यूनिवर्सिटी में शकुंतला देवी अपने चमत्कारिक हुनर के कारण चर्चित हो रही थीं. यहां 201 अंकों की एक संख्या का 23वां रूट निकालने में शकुंतला देवी ने सिर्फ 50 सेकंड का समय लिया, जो यूनिवैक कंप्यूटर से तेज़ गणना थी. दुनिया भर में खबरों में आ रही शकुंतला देवी भारत में भी इसी साल सुर्खियों में थीं. लेकिन, गणित नहीं बल्कि खास तौर से अपनी किताब The World Of Homosexuals के कारण.



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शकुंतला देवी की किताब के कवर की तस्वीर ट्विटर से साभार.


साल 1960 : जहां से शुरू हुई थी कहानी
लंदन में प्रोफेसरों और विशेषज्ञों के सामने अपने गणितीय हुनर के प्रदर्शन के बाद भारत लौटीं शकुंतला देवी ने कोलकाता बेस्ड एक आईएएस अफसर पारितोष बनर्जी के साथ शादी की. शादी के बाद उन्हें झटका तब लगा जब बनर्जी के यौन बर्ताव का खुलासा हुआ. उनकी शादी एक 'गे' व्यक्ति से हुई थी और उनकी ज़िंदगी में उथल पुथल मच गई. संवेदना और भावना के स्तर पर उन्होंने किसी तरह अपने आप को फिर संभाला.

शकुंतला देवी ने अपने दुख से ज़्यादा समलैंगिकों की तकलीफों को दुनिया के सामने लाने को मकसद बनाया. भारत में 'गे' समुदाय का अध्ययन करने के साथ ही शकुंतला देवी ने दुनिया भर में समलैंगिकों के अनुभव जाने और दर्ज किए. इन्हीं अनुभवों के आधार पर उन्होंने किताब लिखी. समलैंगिकों की चर्चा को भी अपराध या अभिशाप समझने वाले दौर में, शकुंतला देवी ने इस समुदाय के प्रति समाज को मानवीय नज़रिया दिया.

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शकुंतला देवी को एक लेखक के तौर पर भी पहचाना जाता है.


भारत में सेक्शन 377 को साल 2018 में गैर दंडात्मक किया गया. अब, जबकि समलैंगिकों की चर्चाएं किसी स्तर पर समाज में होने लगी हैं, शकुंतला देवी की किताब भारत में समलैंगिकों की स्थिति पर सबसे अहम शुरूआती दस्तावेज़ मानी जाती है. हालांकि 40 साल पहले उनके शब्दों पर बहुत कम ध्यान दिया गया था.

बहुत वक्त बीत चुका है और हम इसी खयाल में हैं कि होमोसेक्सुल लोग होते ही नहीं है या फिर हम उन्हें नकारकर या सज़ा देकर खत्म करने के बारे में सोच रहे हैं... हमें सच का सामना करना होगा और उनके लिए स्थान बनाना ही होगा.


साल 1979 : तलाक से जुनून तक
समलैंगिकों पर किताब आए दो साल हो चुके थे और शकुंतला देवी की निजी ज़िंदगी के बारे में दुनिया में तरह तहर की चर्चाएं हो रही थीं. हालांकि उन्होंने यह किताब समलैंगिकों के प्रति 'सिर्फ हमदर्दी नहीं बल्कि पूरी स्वीकार्यता' की मानसिकता से लिखी थी. यह संभवत: भारत में पहली किताब थी, जिसने समलैंगिक संबंधों को अपराध न माने जाने की वकालत की थी.

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गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शकुंतला देवी का नाम दर्ज हुआ था.


लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि बात तलाक तक पहुंची. लेकिन तलाक के बाद शकुंतला देवी ने ज़िंदगी नए सिरे से शुरू करने का इरादा किया. बेंगलूरु शिफ्ट होकर उन्होंने अपने गणित के जुनून के लिए पूरा समय देने का फैसला किया. 1980 में लंदन के इंपीरियल कॉलेज में उन्होंने 13 अंकों की दो संख्याओं (7,686,369,774,870 गुणा 2,465,099,745,779) का गुणा कर सही जवाब महज़ 28 सेकंड में दिए. यह इसलिए आज तक उल्लेखनीय है क्योंकि इसी समय के भीतर उन्होंने जवाब (18,947,668,177,995,426,462,773,730) बोलकर बताया भी था!

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जादू में जीती, और रिश्ते में?
शकुंतला देवी के पिता सर्कस में ट्रिक्स दिखाते थे. सिर्फ तीन साल की शकुंतला ने नंबर कार्ड के जादू में पिता को इसलिए हरा दिया था क्योंकि उन्हें सारे नंबर याद हो गए थे. 5 साल की शकुंतला सड़कों पर नंबरों को याद रखने का तमाशा पिता के साथ करती थीं. 6 साल की उम्र में मैसूर यूनिवर्सिटी में उनका पहला बड़ा शो हुआ था. लेकिन इस जादू की दुनिया से दुनिया भर में हैरत बनी शकुंतला देवी शादी के बाद जिस 'अलग दुनिया' में दाखिल हुईं, वहां उनकी संवेदनाओं के बावजूद रिश्ता एक तकलीफ ही बनकर रह गया.
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