नेपाल बॉर्डर से सटकर तैयार हो रहा रेलवे ब्रिज उत्तर पूर्व के लिहाज़ से अहम क्यों है?

कोसी नदी पर महत्वपूर्ण रेल ब्रिज का निर्माण पूरा हुआ. फाइल फोटो.

भारत और Nepal के बीच डेढ़ हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा की सीमा साझा होती है. इसी सीमा से सटकर एक रूट North India से North East भारत को जोड़ता है. इसी रूट पर एक महत्वपूर्ण Railway Bridge करीब 17 सालों की मेहनत के बाद बनकर तकरीबन तैयार हुआ है, जिसके ज़रिये कम समय में उत्तर पूर्व पहुंचना संभव होगा.

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    भारतीय रेलवे (Indian Railway) ने बिहार में रणनीतिक महत्व वाले एक पुल का निर्माण लगभग पूरा कर लिया है. बताया गया है कि निर्देशों के मुताबिक ज़ोनल रेलवे ने काम को इसलिए गति दी क्योंकि उत्तर पूर्व हिस्सों (North Eastern States) के साथ बेहतर ढंग से कनेक्टिविटी बनाने वाले इस रेल ब्रिज को अगस्त महीने से शुरू किया जाना है. नेपाल के साथ चल रहे ताज़ा सीमा विवाद (Border Issue) के नज़रिये से भी यह पुल महत्वपूर्ण है. जानिए कि इस पुल में क्या खास है.

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    उत्तर से उत्तर पूर्व का अहम रूट
    इस पुल का रणनीतिक महत्व यह है कि भारत इसके ज़रिये व्यक्तियों के साथ ही सामान को उत्तरी भारत से उत्तर पूर्व भारत तक एक छोटे रास्ते से पहुंचा सकेगा. दूसरी तरफ, इस लाइन के ज़रिये ज़मीनी पहुंच भी बढ़ने की उम्मीद है.

    नेपाल की सीमा से लगा रूट
    अभी उत्तर पूर्व से जो ट्रेनें आती हैं, उन्हें कटिहार और मालदा से होकर आना पड़ता है यानी 'चिकन नेक' रूट से. इस नए पुल के कारण पहले तो चिकन नेक पर दबाव कम होगा और दूसरी तरफ, उत्तर पूर्व से आने वाले रेल ट्रैफिक को दरभंगा, निर्मली और न्यू जलपाईगुड़ी से होकर आने का अल्टरनेटिव रूट मिलेगा जो नेपाल बॉर्डर के समानांतर चलेगा.

    वाजपेयी ने रखी थी इस ब्रिज की नींव
    भारतीय रेलवे को उत्तर पूर्व फ्रंटियर रेलवे ज़ोन के साथ रणनीतिक रूप से जोड़ने के मकसद से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने साल 2003 में इस पुल की आधारशिला रखी थी. वाजपेयी की पुण्यतिथि के मौके पर इस साल इस पुल को शुरू किया जा सकता है.

    2 किमी का ब्रिज 500 करोड़ में हुआ तैयार
    रेलवे अधिकारियों के हवाले से खबरों में कहा गया है कि ​निर्माली की तरफ से ब्रिज का निर्माण कार्य पूरा होना अभी बाकी है, जो तेज़ी से जारी है. साल 2003 में इस ब्रिज के लिए 323 करोड़ रुपए की मंज़ूरी दी गई थी लेकिन पूरा होते होते इस ब्रिज की लागत 516 करोड़ रुपए से ज़्यादा की हो गई.

    यूं एक सदी पुरानी है इस ब्रिज की कहानी
    अस्ल में, साल 1887 में एक मीटर गेज लाइन का ब्रिज यहां मौजूद था, जिसके स्थान पर 1970 के दशक में इस ब्रॉड गेज लाइन वाले ब्रिज को पहली बार मंज़ूरी मिली थी. 19वीं सदी में चूंकि कोसी निर्माली औ सरायगढ़ के बीच नहीं बहती थी. बाढ़ और भारत व नेपाल में 1934 में आए भूकंप के कारण कोसी पश्चिम की तरफ मुड़ती गई और इन दोनों स्टेशनों के बीच बहने लगी. फिर कोसी की बाढ़ के प्रकोप के चलते इस रेलवे लिंक को एक तरह से भुला ही दिया गया था.

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