"शादी की तो बर्खास्तगी" से लेकर "मूंछ की लड़ाई" तक कैसे लड़ीं देश की पहली महिला IAS और IPS

किरण बेदी के नाम से तो पूरा देश वाकिफ है, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि देश की पहली महिला आईएएस कौन थीं. पढ़ें पहली महिला आईएएस और आईपीएस के सामने रहीं कुछ समान चुनौतियों की दास्तान.

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: July 9, 2019, 10:32 PM IST
देश की पहली महिला आईपीएस और आईएएस.
Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: July 9, 2019, 10:32 PM IST
देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी का नाम कौन नहीं जानता. अपने करियर में बेदी को न केवल श्रेष्ठता बल्कि शोहरत भी भरपूर हासिल हुई. वो पूरे देश में एक मिसाल और एक मुहावरे की तरह प्रचलित होने का गौरव रखती हैं. लेकिन, बहुत कम लोग हैं, जो देश की पहली महिला आईएएस अन्ना राजम के बारे में जानते हैं. पहली महिला आईपीएस किरण बेदी ने पिछले महीने जीवन के 70 साल पूरे किए हैं और अन्ना की 92वीं जयंती एक हफ्ते बाद है. इस मौके पर जानिए कि देश की इन दो महत्वपूर्ण महिलाओं ने कैसे पुरुष प्रधान समाज में संघर्ष के बलबूते अपनी पहचान बनाई और श्रेष्ठता के आयाम गढ़े.

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अस्ल में, अन्ना राजम मल्होत्रा और किरण बेदी के करियर में कुछ समानताएं रहीं, लेकिन चूंकि अन्ना राजम 1951 बैच की अधिकारी थीं और बेदी 1972 बैच की तो 20 साल से ज़्यादा के समय के दौरान स्थितियां बदलने की वजह से दोनों के संघर्ष के मायने और प्रसंग बदलना भी स्वाभाविक थे. उदाहरण के तौर पर जब अन्ना आईएएस चुनी गई थीं तो उनके नियुक्ति पत्र में एक शर्त थी कि अगर उन्होंने शादी की तो उनकी नौकरी बर्खास्त कर दी जाएगी, लेकिन कुछ ही साल बाद ये शर्त बतौर नियम खारिज कर दी गई. तो ऐसी स्थितियां बेदी के सामने नहीं रहीं लेकिन फिर भी, दोनों का संघर्ष की कहानी कहने और सुनने लायक है.

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'ये नौकरी' न करने के मशवरे
अन्ना राजम : 1950 में जब अन्ना ने सिविल सर्विस की परीक्षा पास की और वो इंटरव्यू तक पहुंची, तब यूपीएससी चेयरमैन आरएन बनर्जी की अध्यक्षता वाले इंटरव्यू पैनल ने अन्ना के महिला होने के कारण उन्हें प्रशासनिक सेवा न करने का मशवरा दिया और कहा कि वो विदेश या केंद्रीय सेवाओं का विकल्प चुन लें. लेकिन, अन्ना ने अपने तर्कों और क्षमताओं के हवाले से प्रशासनिक सेवाओं का विकल्प ही चुना और देश की पहली आईएएस बनीं.

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1951 बैच की आईएएस अधिकारी अन्ना राजम मल्होत्रा.

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किरण बेदी : पहली महिला आईपीएस बनने के साथ ही अपने बैच में 80 पुरुष आईपीएस के बीच बेदी अकेली महिला थीं, जो ट्रेनिंग ले रही थीं. इससे पहले चूंकि कोई महिला पुलिस सेवा में अधिकारी नहीं बनी थी, इसलिए बेदी को भी ऐसी सलाह देने वाले लोग थे कि वो प्रशासनिक सेवाओं का विकल्प चुनें क्योंकि वो बेहतरीन विद्यार्थी रह चुकी थीं. इसके बावजूद अपनी परवरिश, अपने फैसलों और अपनी ज़िद के चलते बेदी ने पुलिस सेवा का ही विकल्प चुना.

पुरुषवादी सोच से होता रहा टकराव
अन्ना राजम : अन्ना की पहली पोस्टिंग के समय उनके महिला होने के कारण उनकी रैंक के मुताबिक पद दिए जाने को लेकर भी बाधाएं रहीं. उस समय के मुख्यमंत्री सी राजगोपालाचारी के बारे में भी कहा जाता है कि वो एक महिला के आईएएस अधिकारी बनने की बात को पचा नहीं पा रहे थे. बहरहाल, जब उन्हें होसूर के सब कलेक्टर के तौर पर नियुक्ति मिली, तब भी उन्हें पुरुष अधिकारियों से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला. समय समय पर उन्हें अपनी क्षमताओं को सिद्ध करना पड़ा और उनकी क्षमताएं मिसाल बनीं.

बंदूक चलाने से लेकर घुड़सवारी में कुशल अन्ना की तारीफ आखिर राजगोपालाचारी को भी करना पड़ी थी. 'वो जानती थीं कि पुरुषों और बंदूकों को कैसे काबू में किया जाता है', एक लेख का ये शीर्षक अन्ना की क्षमता बयान करता है.

किरण बेदी : बेदी के कई किस्से सुने जाते रहे हैं और पुरुषवादी सोच से उनका टकराव होता रहा. 'अजी मूंछ की बात है', जैसे जुमलों वाले किस्से भी चर्चित रहे हैं, जिनमें पुरुष पुलिस अधिकारियों के बीच एक महिला अधिकारी के होने को लेकर ईगो की लड़ाई चलती रहती थी. बेदी को कई बार इस तरह के बर्ताव का सामना करना पड़ा और उन पर कभी कभी लगे आरोप भी चर्चा में रहे.

दोनों ने कहा कि वो 'पुरुषों के खिलाफ' नहीं थीं
अन्ना राजम : सिविल सर्विसेज़ के बड़े पद पर रहते हुए कानून और व्यवस्था बनाए रखने के कुछ मौकों पर अन्ना राजम को पुलिस फायरिंग या लाठी चार्ज के आदेश देने जैसे सख़्त फैसले भी लेने होते थे. इस बारे में अन्ना ने कहा था कि उन्होंने कभी ऐसा इसलिए नहीं किया कि वो पुरुषों के खिलाफ थीं, बल्कि ये फैसले उस समय और स्थिति की ज़रूरत के मुताबिक ही लिये जाते थे.

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देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी पुडुचेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर पद तक कई क्षेत्रों में सक्रिय रहीं.


किरण बेदी : वकीलों के साथ किरण बेदी की जंग का किस्सा काफी चर्चित रहा. वकीलों ने बेदी के खिलाफ मोर्चा खोल लिया था. वकीलों की एक सभा पर लाठी चार्ज करने का आरोप भी बेदी पर लगाया गया था. इस मामले के तूल पकड़ने के बाद बेदी ने साफ कहा था 'मैं माफी मांगूंगी अगर कोई गलती की होगी तो, लेकिन मैंने कोई गलती नहीं की'. इसके बावजूद बेदी ने ये भी कहा कि उन्होंने जो किया, कानून के मुताबिक किया, न कि किसी दुर्भावना के चलते.

दोनों ने हासिल कीं अहम उपलब्धियां
अन्ना राजम : अन्ना ने अपने पूरे करियर के दौरान कई उपलब्धियां हासिल कीं. कृषि सचिव के पद तक पहुंचीं और इंदिरा गांधी के साथ उनके दौरे पर लंबे समय तक कठिन हालात में गांधी की कोर टीम के रूप में काम किया. इसके अलावा जब भारत के पहले कंप्यूटराइज़्ड कंटेनर पोर्ट की योजना पर काम हुआ तब मुंबई के इस महत्वाकांक्षी न्हावा शेवा प्रोजेक्ट को अन्ना के सुपुर्द किया गया. राजीव गांधी ने इस प्रोजेक्ट के लिए अन्ना की भरपूर तारीफ की और फिर उन्हें पद्मभूषण सम्मान से नवाज़ा गया.

किरण बेदी : पुलिस सेवा के दौरान जितने बड़े या लूपलाइन के पद बेदी को दिए गए, बेदी ने हर जगह अपनी छाप छोड़ते हुए अपना कौशल सिद्ध किया. इसके अलावा बेदी समाज सेवा के क्षेत्र से जुड़ीं, परामर्श मंडलों और कार्यक्रमों से जुड़ीं, लेखक के तौर पर सक्रिय रहीं और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलनकारी से लेकर राजनीतिक तक का सफर किया. यूनाइटेड नेशन्स जैसी दुनिया की महत्वपूर्ण संस्थाओं से उन्हें सम्मान मिले.

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First published: July 9, 2019, 2:47 PM IST
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