अब हम हवा की नमी को सोखकर प्यास बुझाएंगे, तो?

भारत ही नहीं दुनिया में जलसंकट के चलते इस तरह की मशीन मार्केट में आ चुकी है, जो हवा की नमी से पेयजल बना रही है. ये मशीन एक नज़र में चमत्कार तो लगती है लेकिन जानिए कि इसके खतरे और अंजाम क्या हो सकते हैं.

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Updated: August 8, 2019, 1:52 PM IST
अब हम हवा की नमी को सोखकर प्यास बुझाएंगे, तो?
हवा से पानी बनाने की तकनीक भारत में हुई कारगर. प्रतीकात्मक तस्वीर.
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Updated: August 8, 2019, 1:52 PM IST
2001 में एक फिल्म आई थी - इवोल्यूशन, जिसका हिन्दी में मतलब है विकास. फिल्म की कहानी एक ऐसे प्राणी की है, जो धरती से टकरा जाता है. यह प्राणी दूसरे ग्रह का है और इसकी खास बात ये है कि ये विकास की अवधारणा को पूरी तरह बदलकर तेज़ी से विकसित होता है. धीरे-धीरे ये प्राणी दूसरे जानवरों को प्रभावित कर उन्हें भी अजीब जानवरों में तेज़ी से बदलने लगता है. जियोलॉजी के प्रोफेसर और उनके साथी इस प्राणी पर शोध करते हुए पाते हैं कि ऑक्सीज़न में इस प्राणी को सांस लेने में दिक्कत होती है और नाइट्रोजन और कार्बन आधारित है. इस प्राणी को आग या गर्मी से ऊर्जा मिलती है और वो गर्मी सोख कर विकसित होता जाता है.

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यह कहानी कुछ-कुछ धरती के विकास की कहानी की तरह ही है. आज से अरबों साल पहले पाए जाने वाला सायनोबैक्टीरिया धरती पर मौजूद कार्बन डाय ऑक्साइड को सोखकर ऑक्सीज़न छोड़ता था. एक वक्त ऐसा आया जब इनकी संख्या बढ़ती गई और धरती पर इनको सोखने के लिए कार्बन डाय ऑक्साइड मिलना बंद हो गया. इस तरह विकास की नई इबारत लिखी गई और धऱती पर दूसरे जीवों का जन्म हुआ, जिसमें हम भी शामिल हैं जो ऑक्सीज़न लेते हैं और कार्बन डाय ऑक्साइड छोड़ते हैं.

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हम इंसान विकास के उस चरम पर पहुंचे कि हमने प्रकृति को अपनी बपौती मान लिया. हम लगातार उसे अपने हाथों की कठपुतली मानने पर तुले हैं. ग्लोबल वार्मिंग, पानी की भीषण कमी, कही भयंकर सूखा, कहीं बाढ़ जैसी तमाम विपदाओं के बाद भी हम प्रकृति को संतुलित करने की कोशिश करने के बजाय उसे और बरबाद करने पर तुले हुए हैं. इसी कड़ी में विकास की ओर एक कदम और बढ़ाते हुए अब पानी की कमी को पूरा करने के लिए हवा में मौजूद नमी को उसी तरह सोखने की मशीन बना ली गई है जिस तरह इवोल्यूशन फिल्म का प्राणी गर्मी को सोखकर खुद को विकसित करता जाता है.

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एटमॉस्फरिक वॉटर जनरेटर (एडब्ल्यूजी) यानि वातावरण से पानी पैदा करने वाली मशीन. एक ऐसी मशीन, जो हवा में मौजूद नमी से शुद्ध, साफ और पीने योग्य मिनरलयुक्त पानी पैदा करती है. नैनोटेक्नोलॉजी से बीटेक करने वाले रमेश कुमार सोनी ने अपने प्रोफेसर और एक साथी के साथ मिलकर वायुजल नाम का स्टार्टअप शुरू किया और इसके तहत वातावरण की नमी को पीने लायक पानी में तब्दील करने वाली मशीन बना डाली.

यह स्टार्टअप एटमॉस्फरिक वॉटर जनरेटर (एडब्ल्यूजी) की पांच यूनिट तैयार कर चुका है, जिसमें चार मशीन प्रतिदिन 100 लीटर पानी और एक मशीन 400 लीटर पानी प्रतिदिन पैदा कर देती है. कंपनी का दावा है कि उनकी मशीन से बनने वाला पानी बोतल बंद पानी से 10 से 20 गुना सस्ता है.

मशीन कैसे काम करती है?
मीडिया को दिए एक साक्षात्कार में रमेश बताते हैं कि जिस तरह एसी में कई सतह एक साथ काम करती हैं और जहां पानी का संघनन यानि कंडेनसेशन होता है, ठीक उसी तरह इस मशीन में संघनित पानी छनता है, ट्रीट होता है, मिनरल युक्त होता है और पीने और खाना बनाने लायक बनता है. इस मशीन की रचना कैक्टस से प्रभावित है. जिस तरह कैक्टस की सतह पर छोटे कांटे जैसी संरचना होती है उसी तरह एटमॉस्फरिक वॉटर जनरेटर (एडब्ल्यूजी) में भी जो कूलिंग सतह है उसकी कुछ रचना हवा को ठंडा करने में इस्तेमाल होती है.

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हवा से पानी बनाने वाली मशीन में दावा है कि संघनित पानी छनता है, ट्रीट होता है, मिनरल युक्त होता है.


जब गुजरने वाली हवा में आर्द्रता (हवा में नमी) बहुत ज्यादा हो जाती तो पानी निकलना शुरू हो जाता है. पानी की मात्रा वातावरण के तापमान, आर्द्रता कॉइल से कितनी हवा गुज़र रही है, इस पर निर्भर करती है.

मशीन में सोलर एनर्जी का भी इस्तेमाल
इसी तरह बेंगलुरू की उरावू लैब नाम के स्टार्टअप ने भी पानी की समस्या से निपटने के लिए कुछ इसी तरह की मशीन - एक्वापैनल तैयार की है, जो हवा से नमी सोखकर पीने लायक पानी तैयार करती है. सोलर ऊर्जा से चलने वाली ये मशीन, रात के वक्त जब वातावरण में सबसे ज्यादा नमी होती है, तब उसमें से पानी को सोखकर उसे पीने लायक बनाती है. दिन के वक्त सोलर पैनल इस मशीन को 80 से 100 डिग्री तक गर्म कर देता है. ये पानी को भाप में बदल देती है, यही कण बाद में कंडेन्सर से गुज़रते हैं.

ये मशीन गंदगी और प्रदूषक तत्वों को फिल्टर कर देती है और इसमें लगी अल्ट्रा वायलेट लाइट से जीवाणुओं का खतरा भी दूर हो जाता है. इस मशीन से प्रति वर्गमीटर से करीब 4-5 लीटर पानी पैदा किया जा सकता है.

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सोलर ऊर्जा से चलने वाली मशीन वातावरण से पानी को सोखकर उसे पीने लायक बनाती है.


दक्षिण अफ्रीका में हज़ारों घरों में पहुंची मशीन
इसी तरह इज़राइल की तकनीक पर आधारित स्टार्टअप वॉटरजेन भी इस सिद्धांत पर काम करता है. बस फर्क इतना है कि यह सोलर ऊर्जा की बजाए बिजली पर चलता है. जेन-350 नाम के इस वॉटर जनरेटर से एक दिन में हवा से 900 लीटर पानी सोखा जा सकता है. एक रिपोर्ट के मुताबिक साउथ अफ्रीका के करीब 3400 घरों में इस जेन-350 का इस्तेमाल किया जा रहा है. यानी करीब तीस लाख लीटर पानी रोजाना हवा से सोखा जा रहा है.

इसी तरह हैदराबाद की मैथ्री एक्वाटेक और सीएसआईआर इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ केमिकल ने एक एटमॉस्फरिक वॉटर जनरेटर (एडब्ल्यूजी) विकसित किया है, जो वातावरण की नमी को सोखकर पेयजल पैदा करता है. बाज़ार के लिए तैयार उनके इस वर्जन को उन्होंने मेघदूत नाम दिया है. दि हिंदू बिज़नेस को दिए एक साक्षात्कार में मैथ्री कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर एम. रामकृष्णा बताते हैं कि एडब्ल्यूजी के कई मॉडल उपलब्ध हैं, जो प्रतिदिन 30 से 1000 लीटर पानी पैदा करते हैं. ये सब कुछ तापमान और आर्द्रता पर निर्भर करता है.

ये हैं कीमतें
एक हज़ार लीटर प्रतिदिन पानी पैदा करने वाली मशीन की लागत 10 लाख रु से अधिक होती है, वहीं 100 लीटर प्रतिदिन पानी पैदा करने वाली यूनिट 2 लाख रुपए तक में लग जाती है. ये बात सही है कि भारत सहित तमाम देश ऐसे हैं, जहां पीने के पानी को लेकर बुरी तरह किल्लत है. करोड़ों लोग प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं. हर साल करीब 20 लाख लोग खराब पानी पीने से होने वाली बीमारी का शिकार होते हैं. ऊपर जिस नई मशीन की चर्चा की गई है, वो आरओ (रिज़र्व ऑस्मोसिस) की तरह 60 फीसद पानी बरबाद भी नहीं करती है.

वातावरण से नमी खत्म हो गई तो?
लेकिन, क्या प्रकृति की नमी को सोखकर उसे पेयजल में तब्दील करने के बाद हम वापस उस नमी को लौटाने के लिए कुछ कर पाएंगे? धरती लगातार गर्म होती जा रही है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं. मौसम की जानकारी देती वेबसाइट अब जो सूचना देती है उसके मुताबिक आपके इलाके का तापमान असल में कुछ और होता है और आपको अहसास कुछ और होता है. मसलन आपके इलाके का तापमान 35 डिग्री हो लेकिन आपको एहसास 38 डिग्री तक का होगा. ये तीन डिग्री का जो अंतर आपको महसूस हो रहा है, यह इसलिए है क्योंकि हमने वातावरण की नमी को खत्म कर दिया है.

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एक हज़ार लीटर प्रतिदिन पानी पैदा करने वाली मशीन की लागत 10 लाख रु से अधिक है.


ये वो नमी है जो न सिर्फ आपको कम गर्मी का अहसास कराती है बल्कि ये पेड़-पौधों के जीवन के लिए भी बेहद ज़रूरी है. लेकिन, हम इंसान इतने मतलबी और खुद की सोचने वाले बन चुके हैं कि जब हम दूसरे इंसानों की परवाह नहीं कर पाते हैं, तो पेड़-पौधे और दूसरे जंतुओं के बारे में सोचना तो बेमानी है. लेकिन, अगर हम इस राह पर चलते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब धरती पर हम ठीक उसी तरह खत्म हो जाएंगे जिस तरह सायनोबैक्टीरिया हुए थे. वैसे भी विकास की अवधारणा के लिए बने सिद्धांतों में सबसे ज़रूरी पहलू प्रकृति है और हमें अगर खुद को बचाना है तो प्रकृति के मुताबिक चलना होगा. अमरबेल की तरह जिस पेड़ पर हम पनप रहे हैं, अवशोषक बनकर उससे जीवन को चूसना बंद करना पड़ेगा.
(लेख : पंकज रामेन्दु, स्वतंत्र लेखक)

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First published: August 8, 2019, 1:50 PM IST
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