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कैसे हुई थी श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मौत? जिसकी जांच चाहती है BJP

भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी.

भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी.

पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी तक जनसंघ के संस्थापक मुखर्जी को फंसाने की साज़िश जवाहरलाल नेहरू द्वारा रचे जाने का आरोप लगा चुके हैं तो उनकी मौत को हत्या तक बताया जा चुका है. जानें कैसे हुई थी श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मौत.

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    जम्मू कश्मीर के मुद्दे पर श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के फैसले का विरोध किया था और इस मसले को हल करने को लेकर उनका मत भी अलग था. नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल मुखर्जी अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू कश्मीर को स्वायत्ता देने को लेकर मतभेद के चलते नेहरू से अलग हो गए थे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मदद से 1951 में उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी, जिसके एक हिस्से के रूप में बाद में भारतीय जनता पार्टी बनी.

    पढ़ें : जानें कश्मीर का वो हिस्सा कैसा है, जिस पर पाकिस्तान का कब्ज़ा है

    मुखर्जी शुरू से ही जम्मू कश्मीर से जुड़ी नीतियों पर नेहरू के रुख से सहमत नहीं थे और उन्होंने संसद के भीतर व बाहर इसका विरोध किया था. 1951 में जनसंघ बनाने के बाद भी मुखर्जी इस नीति के खिलाफ बोलते रहे और 1953 में कश्मीर में ही मुखर्जी की मौत संदेहास्पद स्थितियों में हुई. मौत के बाद कई लोगों समेत मुखर्जी की मां जोगमाया देवी ने भी मौत की जांच किए जाने की मांग की थी, लेकिन नेहरू ने उनकी चिट्ठी को नज़रअंदाज़ किया और यही कहा था कि मुखर्जी की मौत के पीछे कोई रहस्य नहीं, जिसकी जांच की जाए.

    तबसे अब तक मुखर्जी की मौत को लेकर कई तरह के विवाद रहे हैं. 2004 में पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने कहा था कि कश्मीर में मुखर्जी को गिरफ्तार किया जाना नेहरू की रची हुई साज़िश थी. इसके अलावा श्यामाप्रसाद मुखर्जी पर केंद्रित किताब के लेखक एससी दास ने तो मुखर्जी की हत्या किए जाने का दावा कर दिया था. आखिर कैसे हुई थी मुखर्जी की मौत? आइए जानें पूरा घटनाक्रम.

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    आज़ादी के बाद की तस्वीर. नेहरू कैबिनेट और देश के तत्कालीन दिग्गज नेताओं के साथ मुखर्जी (कुर्सी पर सबसे दाएं कोने में). (इनसेट में) 1977 में मुखर्जी की याद में जारी किया गया डाक टिकट. चित्र स्रोत : विकिपीडिया.


    जेल से कॉटेज भेजे गए थे मुखर्जी
    नेहरू की नीतियों के विरोध के दौरान मुखर्जी कश्मीर जाकर अपनी बात कहना चाहते थे, लेकिन 11 मई 1953 को श्रीनगर में घुसते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. तब, वहां शेख अब्दुल्ला की सरकार थी. दो सहयोगियों समेत गिरफ्तार किए गए मुखर्जी को पहले श्रीनगर सेंट्रल जेल भेजा गया और फिर वहां से शहर के बाहर एक कॉटेज में ट्रांसफर ​कर दिया गया.

    लगातार बिगड़ती रही थी सेहत
    एक महीने से ज़्यादा कैद रखे गए मुखर्जी की सेहत लगातार बिगड़ रही थी. उन्हें बुखार और पीठ में दर्द की शिकायतें बनी हुई थीं. 19 व 20 जून की दरम्यानी रात उन्हें प्लूराइटिस होना पाया गया, जो उन्हें 1937 और 1944 में भी हो चुका था. डॉक्टर अली मोहम्मद ने उन्हें स्ट्रेप्टोमाइसिन का इंजेक्शन दिया था. मुखर्जी ने डॉ. अली को बताया था कि उनके फैमिली डॉक्टर का कहना रहा था कि ये दवा मुखर्जी के शरीर को सूट नहीं करती थी, फिर भी अली ने उन्हें भरोसा दिलाकर ये इंजेक्शन दिया था.

    और फिर हार्ट अटैक
    22 जून को हृदय के आसपास मुखर्जी को दर्द की शिकायत हुई और उन्हें सांस लेने में तकलीफ महूसस हुई. मुखर्जी को अस्पताल में शिफ्ट किया गया और उन्हें हार्ट अटैक होना पाया गया. राज्य सरकार ने घोषणा की कि 23 जून की अलसुबह 3:40 बजे दिल के दौरे से मुखर्जी का निधन हो गया. अस्पताल में इलाज के दौरान एक ही नर्स मुखर्जी की देखभाल के लिए थीं राजदुलारी टिकू. टिकू ने बाद में अपने बयान में कहा कि जब मुखर्जी पीड़ा में थे तब उसने डॉ. जगन्नाथ ज़ुत्शी को बुलाया था. ज़ुत्थी ने नाज़ुक हालत देखते हुए डॉ. अली को बुलाया और कुछ देर बाद 2:25 बजे मुखर्जी चल बसे थे.

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    एक सभा के दौरान श्यामाप्रसाद मुखर्जी.


    इस पूरे वाकये से सवाल खड़े हुए
    पहला सवाल तो यही था कि मुखर्जी को जेल से ट्रांसफर क्यों किया गया और उन्हें एक कॉटेज में क्यों रखा गया? दूसरा ये कि डॉ. अली ने यह जानने के बावजूद कि मुखर्जी को स्ट्रेप्टोमाइसिन सूट नहीं करती, वो दवा क्यों दी? तीसरा सवाल ये था कि एक महीने से ज़्यादा वक्त तक मुखर्जी को सही और समय पर इलाज क्यों नहीं दिया गया? चौथा ये कि उनकी देखभाल में सिर्फ एक ही नर्स क्यों थी, वह भी रात के वक्त जब मुखर्जी की हालत गंभीर थी? ये सवाल भी था कि मौत का समय अलग अलग क्यों बताया गया?

    फिर हुई थी जांच की मांग
    हिरासत में मुखर्जी की मौत की खबर ने पूरे देश में खलबली पैदा कर दी थी. कई नेताओं और समाज व सियासत से जुड़े कई समूहों ने मुखर्जी की मौत की निष्पक्ष जांच कराए जाने की मांग की थी. मुखर्जी की मां जोगमाया देवी ने भी तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को इस मांग संबंधी चिट्ठी लिखी. लेकिन, इन सभी मांगों के जवाब में नेहरू ने यही कहा कि उन्होंने मुखर्जी की देखभाल में रहे कई लोगों से तथ्य जुटाए हैं, और इन सबके आधार पर मुखर्जी की मौत कुदरती थी, कोई रहस्य नहीं कि जांच करवाई जाए.

    नेहरू के ये कह देने के बावजूद डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मौत संदिग्ध बनकर रह गई. आज़ादी के समय से देश के इतिहास में जिन तीन नेताओं की मौत पहेलियां बनकर रह गईं, उनमें नेताजी सुभाषचंद्र बोस, पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का नाम शामिल है और उसी फेहरिस्त में तीसरा नाम मुखर्जी का है.

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