जानिए 1962 के युद्ध की रेजांग ला की बेमिसाल लड़ाई की कहानी

जानिए 1962 के युद्ध की रेजांग ला की बेमिसाल लड़ाई की कहानी
1962 के भारत चीन (India china) युद्ध में रेजांग ला (Rezang la) में एक अहम लड़ाई में मेजर शैतान सिंह ने बहादुरी की मिसाल पेश की थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

नवंबर 1962 में 18000 फुट ऊंचाई पर स्थिति रेजांग ला (Rezang La) की लड़ाई में मेजर शैतान सिंह (Major Saitan Singh) के नेतृत्व में चीन (China) के खिलाफ एक शानदार लड़ाई लड़ी गई थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 9, 2020, 1:25 PM IST
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भारत चीन सीमा विवाद (India china border dispute) को लेकर लद्दाख (Laddakh) में चल रहे संघर्ष ने दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा रखा है. पहले गलवान इलाका और फिर चुशूल इलाका में सैन्य गतिविधि के बाद अब रेजांग ला (Rozang La) इलाका चर्चा में जहां सोमवार को चीनी सैनिकों ने भारतीय सेना का पूर्वी लद्दाख में यहां के कुछ अहम चोटियों पर से कब्जा हटाने की नाकाम कोशिश की. ये वही इलाका है जहां साल 1962 के युद्ध (1962 War) में चीनी सेना से भारतीय सैनिकों ने तीखी लड़ाई लड़ी थी.

किसके जिम्मे था ये इलाका
18 हजार फुट की ऊंचाई पर इस रोजांग ला इलाके में नवंबर 1962 के युद्ध में 124 भारतीय सैनिकों ने अपने से कहीं ज्यादा संख्या वाली चीनी फौज का डटकर मुकाबला किया था. ये सैनिक भारतीय सेना के कुमांयू रेजिमेंट की 13वीं बटालियन की चार्ली कंपनी के सैनिकों का सामना करीब 5 हजार चीनी जत्थों से हुआ था जिनके साथ भारी मात्रा में गोला बारूद था.

मेजर शैतान सिंह
इस चार्ली कंपनी की सैन्य टुकड़ी की अगुआई मेजर शैतान सिंह कर रहे थे जिनके नेतृत्व और साहस ने एक बेमिसाल कहानी लिख दी थी. मेजर सिंह ने आखिरी सांस तक चीनी सेना को अकल्पनीय नुकसान पहुंचाया था.



बर्फ में मिली बहादुरी की दास्तां
बहादुरी की इस दास्तां को जंग के तीन महीने बाद मिले भारतीय सैनिकों के बर्फ में जमे हुए शवों से मिली जिनके  हाथों में मरने के बाद भी बंदूकें नहीं छोड़ी थीं. रानीखेत स्थित कुमायूं रेजिमेंटल केंद्र की ओर से 2005 में इमेजेस ऑफ वेलौर एंड ट्रायम्फ नाम से प्रकाशित किताब में बताया गया है कि 1962 में 18 नवंबर को जैसे ही चीन सेना भारतीय सैनिकों की राइफल रेंज के अंदर आई, मेजर ने अपने सैनिकों को गोली चलाने के आदेश दे दिए.

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पिछले तीन महीनों में भारत और चीन के बीच लद्दाख सीमा पर विवाद तीखा होता गया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


तीखी जंग
किताब में जिक्र है, “बहुत सारे दुश्मन सैनिक गिर गए थे और बाकी आगे बढ़ रहे थे. लेकिन सी कंपनी का हर हथियार फायरिंग कर रहा था. 8 प्लाटून की गली बहुत सारे मरे और घायल सैनिकों से भर गई थी.”नतीखे भारतीय प्रतिरोध के बाद, पहला हमला नाकाम होने पर चीनी सैनिकों ने मेजर सिंह और उनके सैनिकों पर भारी गोलाबारूद का इस्तेमाल किया. लेकिन यह तीखा हमला भी भारतीय सैनिकों के हौसलों को ध्वस्त करने में नाकाम रहा.

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विपरीत परिस्थितियों में जांबाजी
भारी गोलाबारी से चीन सैन्य टुकड़ियों को एक साथ बहुत सारे हमले करने का मौका मिल गया जिससे सी कंपनी चारों ओर से दुश्मन सेना से घिर गई. किताब के मुताबिक मेजर सिंह ने अपने सैनिकों कि स्थिति में बदलाव किया और स्वचलित हथियारों को उपयोग किया. इस कदम से चीनी सेना को और ज्यादा नुकसान होने लगा.

तीन महीने बाद
यह बहादुर अफसर इस दौर में अपने 114 साथी सैनिकों के सात शहीद हो गया. किताब में रेजांग ला के अध्याय में बताया गया है, “गड्ढों में बर्फ से जमे हुए, लेकिन हथियार पकड़े हुए मरे हुए लोग पाए गए थे. कुछ के मशीन गन टूटी हुईं थी तो कुछ सैनिक केवल राइफल का बट पकड़े हुए रह गए थे, जबकि बचे हुए जो हथियार उड़ा दिए गए थे, वह दुश्मन सेना की फैलाई आग की गवाही दे रही थी. शहीदों के ये अवशेष तीन महीने बाद मिल सके थे.

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उस युद्ध में भारतीय सेना की तुलनात्मकरूप एक विशाल सेना का सामना करना पड़ा था. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


परमवीर चक्र
मेजर शैतान सिंह को अपने अदम्य साहस और रण नेतृत्व के लिए मरणोपरांत देश के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था. जनरल वीपी मलिक, जो चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ रह चुके हैं, उस समय लद्दाख सेक्टर में अक्टूबर 1962 में ही  कैप्टन नियुक्त हुए थे. उन्होंने बताया, “ हमें सीदे चुशूल इलाके में तैनात कर दिया गया था. लेकिन हमें दुंगाती चूमा तांग धुरी के पीछे सुरक्षा तैयारी कर रहे थे.

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कितना अहम है यह इलाका
रेजांग ला कि रणनीति अहमियत उसकी ऊंचाइयों में निहित थी. जिसमें गुरुंग हिल और गेमार हिल शामिल हैं जो फिलहाल हमारे कब्जे में है. युद्ध के दौरान हमने मेजर शैतान सिंह के बहादुरी के कारनामे सुने थे. लेकिन मैं वह जगह बहुत बाद में देख सका जहां ये लड़ाई हुई थी. “
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