नासा के 'सूर्ययान' के पीछे रहा एक भारतीय वैज्ञानिक का अहम रोल

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: August 21, 2019, 3:23 PM IST
नासा के 'सूर्ययान' के पीछे रहा एक भारतीय वैज्ञानिक का अहम रोल
नोबेल विजेता वैज्ञानिक एस. चंद्रशेखर. फाइल फोटो.

सूरज के बहुत करीब जाकर अध्ययन करने वाला नासा (NASA) का स्पेसक्राफ्ट पार्कर सोलर प्रोब (Parker Solar Probe) एक साल सफलता से पूरा कर चुका है. जानें कैसे इस मिशन की नींव के श्रेय में एक नोबेल विजेता (Nobel Winner) भारतीय वैज्ञानिक का नाम है.

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गैलिलियो (Galileo) ने जब इस वैज्ञानिक सिद्धांत का समर्थन किया कि सूर्य के चक्कर पृथ्वी (Earth Rotated Sun) लगाती है, तो चर्च के साथ भारी विवाद खड़ा हो गया था. चर्च (Science vs church) ने अपनी मान्यताओं के इस​ विरोध को कुचलने के लिए गैलिलियो को मरने तक कैद में रखवाया था. गैलिलियो के वैज्ञानिक नज़रिए को मानने में चर्च को करीब 300 साल लग गए थे. ऐसा ही कुछ हुआ होता तो शायद नासा का सूर्य मिशन पार्कर सोलर प्रोब शायद (NASA's Solar Mission) कभी शुरू नहीं हो पाता. एक वैज्ञानिक ने सोलर विंड्स (Solar Winds) की थ्योरी 1950 के दशक में दी थी, उस वक्त ये थ्योरी बुरी तरह नकार दिया गया था. तब, एक भारतीय ने इस थ्योरी पर विश्वास जताकर दुनिया के सूरज के नज़दीक पहुंचने के नए दरवाज़े खोले थे.

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एक तरफ भारत चंद्रयान 2 मिशन (Chandrayaan 2) की लगातार कामयाबी से गौरवान्वित हो रहा है तो दूसरी तरफ, ये भी गौरव की बात है कि नासा के जिस सूर्य मिशन (Solar Mission) का एक सफल साल पूरा हो चुका है, उसके पीछे एक भारतीय वैज्ञानिक (Indian Scientist) का बड़ा योगदान रहा है. हालांकि विज्ञान मानवता के लिए होता है, इसे देश या जातीय सीमाओं में नहीं देखा जाना चाहिए. बहरहाल, जानिए कि कौन थे ये भारतीय वैज्ञानिक और कैसे उन्होंने एक तरह से इस मिशन की बुनियाद रखने का काम किया था.

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नासा का सोलर प्रोब मिशन एक साल सफलतापूर्वक कर महत्वपूर्ण दो चरणों का डेटा भेज चुका है. नासा द्वारा जारी स्पेसक्राफ्ट मॉडल.


60 साल पहले ऐसे शुरू हुई थी कहानी
साल 1958 की बात है कि एक उभरते हुए 31 वर्षीय युवा वैज्ञानिक डॉ. यूजीन पार्कर ने एक पेपर 'सूर्य से लगातार अंतरिक्ष में चार्ज्ड पार्टिकल्स प्रवाहित होते हैं' विषय पर लिखा था. पार्कर चाहते थे कि उनका ये पेपर एस्ट्रोफिज़िकल जर्नल में छपे, जो उस वक्त का सबसे प्रतिष्ठित अंतरिक्ष विज्ञान आधारित पत्र था. लेकिन, उस वक्त इस थ्योरी को वैज्ञानिकों ने नकार दिया था. कोलकाता स्थित आईआईएसईआर के असोसिएट प्रोफेसर ​डॉ. दिब्येंदु नंदी के हवाले से पीटीआई ने एक रिपोर्ट में लिखा था :
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'जब डॉ. पार्कर ने ये पेपर प्रस्तुत किया तो इस पेपर की दो बार अलग अलग समीक्षा करवाई गई ताकि इसे एस्ट्रोफिज़िकल जर्नल में छापा जा सके लेकिन दोनों बार समीक्षा करने वाले वैज्ञानिकों ने इस पेपर में प्रतिपादित थ्योरी को खारिज कर दिया.'

क्यों नकारी गई थी ये थ्योरी?
उस वक्त वैज्ञानिक समुदाय के बीच यह मान्यता दृढ़ता के साथ कायम थी कि अंतरिक्ष में पूरी तरह निर्वात यानी वैक्यूम है इसलिए सोलर विंड्स यानी सूर्य से किसी किस्म हवाएं प्रवाहित होने का सवाल ही नहीं उठता. सोलर विंड्स के अलावा पार्कर ने बाहरी सौरमंडल में सोलर मैग्नेटिक फील्ड के आकार को पार्कर स्पाइरल का नाम देकर इसकी भी थ्योरी दी थी लेकिन उस वक्त वैज्ञानिक ऐसी किसी संभावना पर ध्यान नहीं दे रहे थे.

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डॉ. यूजीन पार्कर, जिनकी थ्योरी और जिनके नाम पर नासा के सौर मिशन का नाम रखा गया.


एस चंद्रशेखर ने दी हरी झंडी
1953 में अमेरिका की नागरिकता पा चुके सुब्रमण्यन चंद्रशेखर उर्फ चंद्रा प्रतिष्ठित वैज्ञानिक थे और उस वक्त जर्नल के वरिष्ठ संपादक थे, जब पार्कर ने ये पेपर तैयार किया था. चंद्रा ने समीक्षकों की राय को नकारते हुए पार्कर की थ्योरी को हरी झंडी दी और जर्नल में इस पेपर को छापे जाने का रास्ता बनाया. डॉ. नंदी के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया था 'कैसे दूसरों के आइडियाज़ को लेकर उदार हुआ जाता है, चंद्रा से सीखा जाना चाहिए था. अगर किसी थ्योरी में कुछ भी तार्किक संभावना है तो फिर आपके व्यक्तिगत विचार के खिलाफ भी हो, तब भी उसका स्वागत किया जाना उन्हें आता था'.

इसके बाद बनी सूर्ययान की भूमिका
डॉ. पार्कर की ये थ्योरी प्रकाशित हुई तो इसके बाद इसे लेकर चर्चा और अध्ययन शुरू हुए. पार्कर लगातार इस थ्योरी के विस्तार पर काम करते रहे और अन्य थ्योरीज़ भी देते रहे. नासा ने सूर्य के बेहद नज़दीक यान भेजकर अध्ययन करने का मिशन पिछले साल 2018 में शुरू किया क्योंकि सालों का समय उस तकनीक को विकसित करने में लगा, जिसके ज़रिए ऐसा यान बनाया जा सके जो सूर्य के प्रचंड ताप को सहन कर सके. इस यान और मिशन का नाम थ्योरी देने वाले वैज्ञानिक के सम्मान में पार्कर सोलर प्रोब रखा गया, जो एक साल में अपने दो चरण पूरे कर चुका है और 2025 तक सूरज के बहुत पास पहुंचकर सोलर विंड्स व मैग्नेटिक फील्ड संबंधी अध्ययन करने वाला है.

अब जानें चंद्रशेखर के बारे में
एस चंद्रशेखर उर्फ चंद्रा नोबेल पुरस्कार विजेता हैं. 1983 में उन्हें भौतिकी के क्षेत्र में विलियम फॉलर के साथ संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. नासा ने अपने एक मिशन का नाम उनके नाम पर रखा था - चंद्रा एक्स-रे ऑब्ज़र्वेटरी. चंद्रा उन चुनिंदा वैज्ञानिकों में शामिल हैं जो बेहद प्रतिष्ठित इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ साइन्स के मानद सदस्य रहे हैं. ये भी आपको जानना चाहिए कि वैज्ञानिक, दार्शनिक और विज्ञान लेखक चंद्रा मशहूर भारतीय वैज्ञानिक और नोबेल विजेता डॉ. सीवी रमन के परिवार की ही अगली पीढ़ी थे.

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वैज्ञानिक, दार्शनिक और विज्ञान लेखक एस चंद्रशेखर मशहूर भारतीय वैज्ञानिक और नोबेल विजेता डॉ. सीवी रमन के परिवार की अगली पीढ़ी थे.


सूर्ययान के पीछे चंद्रा की भूमिका
नासा के पार्कर सोलर प्रोब के पीछे डॉ. पार्कर की थ्योरीज़ रहीं लेकिन चंद्रा अगर उस वक्त उन थ्योरीज़ को विरोध के बावजूद प्रकाशित करने का फैसला नहीं करते, तो शायद इन थ्योरीज़ की गर्भहत्या ही हो गई होती और ऐसा कोई मिशन कभी वजूद में ही नहीं आता. ऐसी आशंका इसलिए जताई जाती है क्योंकि गैलिलियो के मामले में ऐसा हुआ था. चर्च की मान्यता थी कि सूर्य समेत ब्रह्मांड के सभी ग्रह पृथ्वी के चक्कर लगाते हैं. एक स्थापित मान्यता को चुनौती देने का साहस गैलिलियो ने किया तो उसे मौत तक कैद में रखा गया था. गैलिलियो की बात को स्वीकार करने में चर्च को करीब 300 साल लगे.

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First published: August 21, 2019, 2:37 PM IST
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