क्या है वो UAPA कानून, जिसके तहत उमर खालिद हुए गिरफ्तार

क्या है वो UAPA कानून, जिसके तहत उमर खालिद हुए गिरफ्तार
दिल्ली हिंसा के आरोपी उमर खालिद को लेकर दिल्ली पुलिस ने अदालत से मांगी 10 दिन की पुलिस रिमांड.

पूर्व छात्र नेता (Youth Leader) को उस कानून के तहत गिरफ्तार किया गया, जो केंद्र और उसकी जांच एजेंसी (National Investigation Agency) को बेपनाह ताकत देता है और इस कानून के बारे में विशेषज्ञों ने कहा था कि ये कुछ संवैधानिक अधिकारों (Constitutional Rights) का उल्लंघन करता है.

  • News18India
  • Last Updated: September 14, 2020, 8:00 PM IST
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दिल्ली दंगों (Delhi Riots) के सिलसिले में साज़िश रचने के आरोप लगाकर जेएनयू (JNU) के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद (Umar Khalid) की गिरफ्तारी दिल्ली पुलिस (Delhi Police) की स्पेशल सेल ने गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत की. इसी कानून के तहत पहले भी कई मशहूर और सामाजिक ​हस्तियों (Social Activists) को गिरफ्तार किया जा चुका है. एक साल पहले जब यह कानून संसद (Parliament) में पास हो रहा था, तब भी इस पर काफी हो हल्ला हुआ था और कहा गया था कि इससे संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है.

कुछ दलों के समर्थन और कुछ के विरोध के बीच केंद्र की भाजपानीत एनडीए सरकार (NDA Government) ने इस कानून को पास करवा लिया था, लेकिन तबसे ही यह कानून इसलिए चर्चा में रहा है कि ये सरकार और जांच एजेंसियों को असीमित शक्तियां देता है और इसके दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है. जानिए कि उमर खालिद की गिरफ्तारी से जुड़ा यह कानून यूएपीए कितना सख्त है और इससे जुड़ी तमाम खास बातें भी.

कितना सख्त है UAPA?
यूएपीए के तहत देश और देश के बाहर गैरकानूनी गतिविधियों को रोकने के मकसद से बेहद सख्त प्रावधान किए गए. 1967 के इस कानून में पिछले साल सरकार ने कुछ संशोधन करके इसे कड़ा बना दिया. केंद्र की जांच एजेंसियां और राज्य सरकारें आतंक और नक्सलवाद से बेहतर ढंग से निपट सकें इसलिए 2019 में एनडीए सरकार ने इस कानून में कुछ और प्रावधान जोड़े. इस एक्ट के प्रावधानों को समझें :




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यूएपीए में व्यक्ति को आतंकवादी घोषित किए जाने का प्रावधान किया गया.


- कानून पूरे देश में लागू होता है.
- इस कानून के तहत केस में एंटीसिपेटरी बेल यानी अग्रिम ज़मानत नहीं मिल सकती.
- किसी भी भारतीय या विदेशी के खिलाफ इस कानून के तहत केस चल सकता है. अपराध की लोकेशन या प्रवृत्ति से कोई फर्क नहीं पड़ता.
- विदेशी धरती पर अपराध किए जाने के मामले में भी इसके तहत मुकदमा दर्ज हो सकता है.
- भारत में रजिस्टर जहाज़ या विमान में हुए अपराध के मामलों में भी यह कानून लागू हो सकता है.
- मुख्य तौर पर यह कानून आतंकवाद और नक्सलवाद से निपटने के लिए है.
- किसी भी तरह की व्यक्तिगत या सामूहिक गैरकानूनी गतिविधि, जिससे देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता को खतरा हो, इस कानून के दायरे में है.
- यह कानून राष्ट्रीय इनवेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) को अधिकार देता है कि वो किसी तरह की आतंकी गतिविधि में शामिल संदिग्ध को आतंकी घोषित कर सके.
- इस कानून से पहले समूहों को ही आतंकवादी घोषित किया जा सकता था, लेकिन 2019 में इस संशोधित कानून के बाद किसी व्यक्ति को भी संदिग्ध आतंकी या आतंकवादी घोषित किया जा सकता है.

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किस तरह NIA की ताकत बढ़ाता है कानून?
पहले यह व्यवस्था थी कि आतंकवाद के किसी भी मामले में संपत्ति सीज करने की कार्यवाही जांच अधिकारी बगैर डीजीपी की अनुमति के कर नहीं सकता था, लेकिन इस कानून में प्रावधान है कि एनआईए का जांच अफसर सिर्फ एनआईए के डीजी की इजाज़त से यह कार्रवाई कर सकता है. यानी यह कानून एनआईए को असीमित अधिकार दे देता है.

यही नहीं, आतंक से जुड़े किसी भी मामले में किसी व्यक्ति के किसी भी तरह के कमिटमेंट, आतंक की तैयारी में सहभागिता, आतंक को बढ़ावा देने या किसी भी तरह की संलिप्तता के आधार पर, यहां तक कि शक के आधार पर भी किसी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने की कार्रवाई केंद्र की एजेंसी कर सकती है.

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यह भी गौरतलब है कि पहले नियमानुसार, आतंक संबंधी किसी भी मामले की जांच डीएसपी या असिस्टेंट कमिश्नर (एसीपी) रैंक के अधिकारी कर पाते थे, लेकिन इस कानून के बाद से NIA इंस्पेक्टर रैंक या उससे ऊपर के अफसर इन मामलों में जांच ​अधिकारी हो सकते हैं.

सरकार और विपक्ष की दलील
केंद्र की दलीलें ये रहीं कि यूएपीए के कड़े प्रावधानों से NIA की जांच तेज़ और मज़बूत होगी, वह आतंकी गतिविधियों में शक के आधार पर कार्रवाई कर जल्दी रिज़ल्ट दे सकेगी, संदिग्ध गतिविधियों वाले संगठनों को आतंकी घोषित कर कार्रवाई कर सकेगी और जांच में राज्य के साथ सामंजस्य की अड़चन भी खत्म होगी. ऐसे में अपराधियों की धरपकड़ बढ़ेगी, लेकिन विपक्ष का कहना रहा कि इससे एनआईए की मनमानी बढ़ेगी और अल्पसंख्यकों के खिलाफ कानून का दुरुपयोग होगा.

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एनआईए को कई तरह की ताकतें यूएपीए कानून ने दीं.


UAPA में गिरफ्तार हुईं कई हस्तियां
उमर खालिद से पहले कई एक्टिविस्टों और सामाजिक हस्तियों को इस एक्ट के तहत गिरफ्तार किया जा चुका है. साल 2007 में नक्सली गतिविधि का आरोप लगाकर मशहूर डॉक्टर और मानव अधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन, 2018 में दलित अधिकार के लिए काम करने वाले सुधीर धवाले, आदिवासियों के लिए काम करने वाले महेश राउत, मशहूर कवि वरवर राव को गिरफ्तार किया जा चुका है.

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साल 2018 में ही आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्षरत सुधा भारद्वाज, रिसर्च स्कॉलर रोना विल्सन और पत्रकार गौतम नवलखा पर भी यही कानून लगा था. इसी साल, यह कानून तब चर्चा में था, जब जम्मू-कश्मीर पुलिस (Jammu Kashmir Police) ने घाटी में सोशल मीडिया (Social Media) का गलत तरीके से इस्तेमाल करने वाले यूजर्स पर UAPA (Unlawful Activities Prevention Act ) लगाया था.

कितनी हो सकती है सज़ा?
इस कानून के मुताबिक 'गैरकानूनी' गतिविधि की परिभाषा के मुताबिक 'भारत की संप्रभुता, अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाली, नुकसान पहुंचाने का इरादा रखने वाली या नकारने वाली कोई भी गतिविधि' इस दायरे में में मानी जाएगी. ऐसी किसी गतिविधि के लिए इस कानून में 7 साल तक की कैद का प्रावधान है. लेकिन, ऐसी किसी गैर कानूनी या आतंकी गतिविधि में कोई जान जाती है तो सज़ा उम्र कैद या मृत्युदंड की भी हो सकती है.
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