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भारतीय सैनिकों ने इस तरह जान देकर की थी इज़रायल की हिफ़ाज़त

News18Hindi
Updated: October 15, 2019, 1:38 PM IST
भारतीय सैनिकों ने इस तरह जान देकर की थी इज़रायल की हिफ़ाज़त
दिल्ली के तीन मूर्ति चौक का नाम तीन मूर्ति हाईफा चौक रखे जाने के पीछे है कहानी.

अगर भारतीय सैनिकों (Indian Army) ने जान की बाज़ी लगाकर विश्व युद्ध (World War) के दौरान एक मुश्किल और ऐतिहासिक लड़ाई न जीती होती, तो शायद इज़रायल (Israel) नाम का देश ही न होता.

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भारत (India) और इज़रायल के बीच रक्षा और व्यापार के संबंधों (Indo-Israel Relations) के मज़बूत होने की खबरें पढ़ते हुए क्या आप जानते हैं कि इज़रायल के लोगों को बचाने और इज़रायल के एक देश बनने के लिए भारतीयों (Indian Soldiers) ने कितनी कुर्बानी दी? कहानी सौ साल पुरानी ज़रूर है लेकिन एक युद्ध (War) अगर न लड़ा गया होता तो आज स्थिति कुछ और होती. यहूदियों (Jews) का एक देश इज़रायल इसलिए अस्तित्व में आया क्योंकि कई भारतीयों ने जान देकर वो ऐतिहासिक जंग जीती थी.

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हाइफा युद्ध से एक दिन पहले
ये कहानी पहले विश्व युद्ध (First World War) के समय की है, जब 22 सितंबर 1918 को ओटोमन सेना (Ottoman Army) ने अपने हथियारों के दम पर हाइफा (Haifa) को खाली करवाया था और कब्ज़ा कर लिया था. हाइफा की सड़क, कार्मल पहाड़ी और नहर अल मुगत्ता यानी किशोन नदी के आसपास ओटोमन सेना के कब्ज़े के बाद 5वीं घुड़सवार टुकड़ी को आदेश दिया गया था कि वह हाइफा को ओटोमन सेना से वापस ले. यह टुकड़ी भारतीयों (Indian Army) की थी, जो ब्रिटिश राज (British Raj) की सेना के तौर पर युद्ध में शामिल थी.

कितने मुश्किल थे हालात?
ओटोमन सेना को काफी बढ़त हासिल थी क्योंकि उनके पास उस वक्त मशीन गन जैसे आधुनिक हथियार थे. साथ ही, किशोन नदी के दोनों मुहानों पर दलदल था इसलिए उसे पार कर पाना तकरीबन नामुमकिन था. पहाड़ी पर ओटोमन चौकी होने के कारण हमले की स्थिति भारतीय टुकड़ी के पक्ष में नहीं थी. इसके बावजूद कैसे भारतीयों ने यह जंग जीती? यह अपने आप में ऐतिहासिक और रोमांचक है.

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हाईफा के ऐतिहासिक युद्ध की यह तस्वीर विकिपीडिया पर सुरक्षित है.


शूरवीरों का साहस और सूझबूझ
5वीं टुकड़ी में जोधपुर लैन्सर और मैसूर लैन्सर यानी जोधपुर और मैसूर की भालाधारी घुड़सवार फौजें शामिल थीं. मैदान ए जंग में पहुंचते ही सेना के प्रमुखों ने तय किया कि जोधपुर लैन्सर हमला कर पोस्ट कब्ज़े में करेंगे और मैसूर लैन्सर उसे कवर देंगे. मैसूर लैन्सर ने पूर्व और उत्तर की तरफ से हाइफा में दाखिल होने के लिए हमला शुरू किया और कार्मल पहाड़ी की पोस्ट लेने के लिए जोधपुर लैन्सर बढ़े.

ऐसे हासिल हुई फत्ह
मैसूर लैन्सर के सैनिकों ने खड़ी पहाड़ी पर चढ़ाई करते हुए दुश्मन सेना की बंदूकों और चौकी को कब्ज़े में लेने का जतन किया और दूसरी तरफ, जोधपुर लैन्सर ने मुख्य माउंट कार्मल की पोस्ट पर हमला बोला. जोधपुर लैन्सर की टुकड़ियां एक्रे रेलवे लाइन को पार करते हुए बढ़ीं लेकिन मशीन गनों की ज़द में आ गईं. यहां दलदल वाली मुश्किल भी खड़ी हुई. जल्द ही हालात को भांपते हुए जोधपुर लैन्सर के जांबाज़ों ने माउंट कार्मल के बाईं तरफ के निचले स्लोप की तरफ से रास्ता बनाने का कदम उठाया.

रेजिमेंट ने तीस दुश्मनों, दो मशीनगनों और दो कैमल बंदूकों को कब्ज़े में लेकर पोस्ट कब्ज़े में ली और हाईफा के रास्ते पर बढ़ने का फैसला किया. जोधुपर लैन्सर ने शहर के भीतर घुसकर दुश्मनों को हैरान कर दिया. इस दौरान मैसूर लैन्सर गोलीबारी कर कवर देते हुए पीछे आ रहे थे. कुछ ही देर में दुश्मन के छक्के छूट गए और दोनों रेजिमेंटों ने मिलकर 1350 जर्मन और ओटोमन सैनिकों को बंदी बनाया, जिनमें दो जर्मन और 35 ओटोमन अफसर भी शामिल थे. असलहे को भी कब्ज़े में ले लिया. भारतीय रेजिमेंटों के 8 जांबाज़ मारे गए और 34 घायल हुए जबकि 60 घोड़े भी मारे गए.

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इज़रायल दौरे पर पीएम मोदी ने किया था हाईफा के नायक के स्मारक का अनावरण.


मेजर दलपत थे हाईफा के नायक
अस्ल में, इस युद्ध का समय वह था जब सैनिकों को अपने राजाओं के आदेशों का पालन करना होता था. छोटी छोटी रियासतों के सैनिकों को ब्रिटिश सरकार अपनी सेना के तौर पर इस्तेमाल करती थी. जेरूसलेम पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक मेजर दलपत सिंह राजस्थान में रावण राजपूत जाति में पैदा हुए थे, जिसे दरोगा के नाम से भी इलाके में जाना जाता था. हाईफा की लड़ाई में शहीद हुए मेजर दलपत ने जोधपुर लैन्सर का नेतृत्व करते हुए रणभूमि में जान गंवाई थी और मरणोपरांत उन्हेंं मिलिट्री क्रॉस से नवाज़ा गया.

मेजर दलपत सहित हाईफा के युद्ध में शहीद हुए भारतीय जांबाज़ों की याद में इज़रायल और भारत दोनों देशों में स्मारक हैं. पीएम नरेंद्र मोदी जब इज़रायल यात्रा पर गए थे तब उन्होंने हाईफा के शहीदों को श्रद्धांजलि दी थी और मेजर दलपत की याद में स्मारक का उद्घाटन किया था, जिसमें दलपत को 'हीरो आफ हाईफा' की उपाधि दी गई थी. इसी तरह इज़रायली पीएम नेतन्याहू जब भारत दौरे पर आए थे, तब उन्होंने दिल्ली स्थित तीन मूर्ति हाईफा चौक पर इज़रायली शहर को मुक्त कराने वाले भारतीय शहीदों को श्रद्धांजलि दी थी.

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First published: October 15, 2019, 1:38 PM IST
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