हवा से फैलता है कोरोना वायरस, अब कितनी चिंता और सोशल डिस्टेंसिंग है ज़रूरी?

हवा से फैलता है कोरोना वायरस, अब कितनी चिंता और सोशल डिस्टेंसिंग है ज़रूरी?
अब तक विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हवा में वायरस के बने रहने की आशंकाओं को अंडरप्ले किया.

सवा दो सौ से ज़्यादा Scientists एक राय हैं ​कि Coronavirus हवा में न केवल बना रहता है, बल्कि हवा में यात्रा भी कर सकता है तो Public Place ही क्या, कहीं भी सांस लेना जोखिम की बात हो गई है. ऐसे में नियम और Guidelines किस तरह बदलने चाहिए? ये भी जानें कि वैज्ञानिकों की सलाह क्या कहती है.

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अब तक विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) यही कहता रहा कि Covid-19 के वायरस के फैलने का मुख्य ज़रिया खांसी, छींक या बोलने के दौरान निकलने वाले Droplets होते हैं या फिर किसी सतह पर Virus मौजूद हो सकता है, ​जो किसी को संक्रमित कर सकता है. क्या हवा में कोरोना वायरस बना रहता है और फैल सकता है? इस पर WHO ने अब तक इसे संभव तो माना था, लेकिन तवज्जो नहीं दी थी.

अब ताज़ा हालात ये हैं कि 32 देशों के 239 वैज्ञानिकों ने माना है कि हवा के ज़रिये वायरस संक्रमण फैलने के खतरे को WHO ने नज़रअंदाज़ किया. इन वैज्ञानिकों ने एक खुली चिट्ठी लिखी है, जिसके इस हफ्ते छपने के दावे किए जा रहे हैं. इस चिट्ठी में कहा गया है कि WHO को अपनी भूल सुधारते हुए सिफारिशों में संशोधन करने चाहिए. जानिए कि क्या है ये खतरा और क्या हैं इससे जुड़े सवालों के जवाब.

असरदार सोशल डिस्टेंसिंग के मानक
अब तक बताया गया था कि बोलने, छींक और खांसी के ज़रिये जो सांस संबंधी ड्रॉपलेट्स निकलते हैं, उनके ज़रिये वायरस संक्रमण संभव है इसलिए मास्क पहनने और 3 से 6 फीट की दूरी रखने की सलाह दी गई थी. अब पता चला है कि हवा के ज़रिये भी संक्रमण फैल सकता है. यानी हवा में सूक्ष्म ड्रॉपलेट न्यूक्ली मौजूद रह सकते हैं और ये कुछ समय के लिए हवा में सक्रिय और चलायमान भी हो सकते हैं.
ये वो ड्रॉपलेट्स हैं, जो लोगों के बोलने, खांसने या छींकने के समय हवा में शामिल हो जाते हैं और रेस्पिरेटरी ड्रॉपलेट्स की तुलना में और भी हल्के व सूक्ष्म होते हैं. ये ड्रॉपलेट्स रेस्पिरेटरी ड्रॉपलेट्स के वाष्पीकरण से भी बन सकते हैं. इन्हें एयरोसॉल कहा जाता है, जिनके ज़रिये कोविड 19 संक्रमण फैल सकता है. ऐसे में, सवाल खड़ा हो रहा है कि सोशल डिस्टेंसिंग का सही मानक क्या होगा.



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एयरोसॉल उन सूक्ष्म ठोस या द्रव कणों को कहा जाता है, जो हवा में मौजूद रहते हैं.


वैज्ञानिकों को मिले सबूत
इस पूरे अध्ययन का मतलब यह निकला है कि अगर कोई कोविड 19 संक्रमित व्यक्ति किसी माहौल में रहने के बाद वहां से गुज़र जाता है, तो भी उस वातावरण में वायरस मौजूद रह सकता है और इस वातावरण में आने वाले दूसरे लोग संक्रमित हो सकते हैं. वैज्ञानिकों को सबूत मिले हैं कि वातावरण से संक्रमण फैलने का खतरा आशंका से ज़्यादा बड़ा हो सकता है.

नोबेल विजेता ने भी मानी यह थ्योरी
कैलिफोर्निया सैन डिएगो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने जून महीने में एक पेपर प्रकाशित कर कहा था कि महामारी के तीन बड़े केंद्रों, वुहान, न्यूयॉर्क और इटली के डेटा पर किए गए अध्ययन में देखा गया कि वातावरणजनित संक्रमण खासतौर से एयरोसॉल के ज़रिये संक्रमण फैलना एक बड़ा कारण रहा. इस अध्ययन में 1995 के रसायन क्षेत्र के नोबेल विजेता मारियो जे मोलिना भी शामिल थे.

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एक और अध्ययन में कहा गया कि वायरस हवा में 16 घंटे तक सक्रिय तक रह सकता है. हालांकि इस अध्ययन में तापमान, आर्द्रता और प्रदूषण के वायरस पर प्रभावों को नहीं बताया गया.

बदल सकते हैं सतर्कता के उपाय
ये नए तथ्य सामने आने के बाद जल्द ही WHO के नई सिफारिशें जारी करने की उम्मीदें हैं. यह संभव है कि अब आपको घर के भीतर या हर वातावरण में लगातार मास्क लगाए रखने की हिदायत दी जाए. अब अगर घंटों तक वायरस हवा में रह सकता है और चल भी सकता है, तो ज़ाहिर है कि पब्लिक प्लेस में सांस लेना ही जोखिम की बात हो गई है. ऐसे में, सोशल डिस्टेंसिंग के क्या नियम होंगे, इसका खुलासा भी WHO कर सकता है.
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