जानिए, सावित्री बाई फुले को, जिन्होंने लड़कियों के लिए एक के बाद एक 18 स्कूल खोल डाले

आज ही के दिन देश की पहली शिक्षिका और महिला अधिकारों की हिमायती सावित्री बाई फुले का जन्म हुआ

आज ही के दिन देश की पहली शिक्षिका और महिला अधिकारों की हिमायती सावित्री बाई फुले का जन्म हुआ

महज 10 साल की उम्र में सावित्री बाई फुले (Savitribai Phule) की शादी हो गई थी लेकिन इससे उनकी पढ़ाई और भी जोर-शोर से चल पड़ी. वे अपने पति के साथ मिलकर पढ़ने लगीं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 3, 2021, 6:21 PM IST
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आज ही के दिन देश की पहली शिक्षिका और महिला अधिकारों की हिमायती सावित्री बाई फुले का जन्म हुआ था. साल 1831 में महाराष्ट्र के सतारा में जन्मी इस महान महिला ने केवल 17 बरस की उम्र में देश का पहला कन्या विद्यालय खोला था ताकि अभिभावक अपनी बच्चियों को पढ़ाई-लिखाई से न रोकें. जानिए, सावित्री फुले के बारे में सबकुछ.

दलित परिवार में जन्मी सावित्री बाई का बहुत कम उम्र में ज्योतिबा फुले से विवाह हो गया था. हालांकि उस समय की रीत से अलग ज्योतिबा ने अपनी पत्नी की रुचि देखकर उन्हें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया. बेहद कुशाग्रबुद्धि सावित्री बाई पाश्चात्य शिक्षा की ओर आकर्षित हुईं और जल्द ही सीखने-पढ़ने लगीं.

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इस बीच ज्योतिबा फुले खुद एक दलित चिंतक की तरह उभरे. इधर सावित्री बाई ने उनके साथ मिलकर साल 1848 में एक स्कूल खोला. ये पहला स्कूल था, जिसके बाद उन्होंने 18 स्कूल खोले, ये सारे ही स्कूल पुणे में थे और उन जातियों की लड़कियों को शिक्षा देते थे, जिन्हें समाज की मुख्यधारा से अलग रखा जाता था.

savitribai phule
लड़कियों को समान स्तर की शिक्षा दिलाने के खिलाफ समाज के लोगों ने सावित्री बाई का काफी अपमान किया- सांकेतिक फोटो (pixabay)

पढ़-लिखकर स्कूल खोलना सुनने में आसान लगता है लेकिन उस दौरान ये आसान नहीं था. दलित लड़कियों को समान स्तर की शिक्षा दिलाने के खिलाफ समाज के लोगों ने सावित्री बाई का काफी अपमान किया. यहां तक कि वे स्कूल जातीं, तो रास्ते में विरोधी उनपर कीचड़ या गोबर फेंक दिया करते थे ताकि कपड़े गंदे होने पर वे स्कूल न पहुंच सकें. एकाध बार ऐसा होने के बाद सावित्री रुकी नहीं, बल्कि इसका इलाज खोज निकाला. वे अपने साथ थैले में अतिरिक्त कपड़े लेकर चलने लगीं.

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सावित्रीबाई फुले अंग्रेजी शासन का समर्थन करती थीं और पेशवा राज को खराब बताती थीं, क्योंकि उनके राज में दलितों और स्त्रियों को बुनियादी अधिकार नहीं मिल सके थे. उनके लेखन में अंग्रेजी शिक्षा के लिए ये प्रभाव दिखता भी है. अपनी कविता ‘अंग्रेजी मैय्या’ में वे लिखती हैं:

अंग्रेजी मैय्या, अंग्रेजी वाणई शूद्रों को उत्कर्ष करने वाली पूरे स्नेह से.

अंग्रेजी मैया, अब नहीं है मुगलाई और नहीं बची है अब पेशवाई, मूर्खशाही.

अंग्रेजी मैया, देती सच्चा ज्ञान शूद्रों को देती है जीवन वह तो प्रेम से.

अंग्रेजी मैया, शूद्रों को पिलाती है दूध पालती पोसती है माँ की ममता से.

अंग्रेजी मैया, तूने तोड़ डाली जंजीर पशुता की और दी है मानवता की भेंट सारे शूद्र लोक को.

savitribai phule
वे बार-बार कहती रहीं कि पाठशाला ही इंसानों का सच्चा गहना है (Photo-news18 Hindi creative)

छत्रपति शिवाजी की प्रशंसक सावित्रीबाई पेशवाओं के शासन की घोर विरोधी थीं. पेशवाओं के राज में दलितों की दयनीय स्थिति का वर्णन अपनी एक कविता में करते हुए लिखती हैं:

पेशवा ने पांव पसारे उन्होंने सत्ता, राजपाट संभाला

और अनाचार, शोषण अत्याचार होता देखकर शूद्र हो गए भयभीत

थूक करे जमा गले में बँधे मटके में और रास्तों पर चलने की पाबंदी

चले धूल भरी पगडंडी पर, कमर पर बंधे झाड़ू से मिटाते पैरों के निशान

‘शिक्षित हो, संगठित हो और संघर्ष करो’ का जो नारा भीमराव अंबेडकर ने पीड़ित और शोषितों के लिए दिया था, उस नारे की पृष्ठभूमि सावित्रीबाई फुले ने अपनी कविताओं से बहुत पहले तैयार कर दी थी. वे कहती हैं कि अगर किसी को मेरी कविताएं पढ़-सुनकर थोड़ा भी ज्ञान मिल सके तो मैं समझूंगी कि मेहनत सफल हो गई. साथ ही महिलाओं को शिक्षा से जोड़ने के लिए वे बार-बार कहती रहीं कि पाठशाला ही इंसानों का सच्चा गहना है.

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साल 1897 की बात है, जब देश के कई हिस्सों में प्लेग फैला हुआ था. सावित्री बाई ने स्कूल छोड़कर बीमारों की मदद शुरू कर दी. वे गांव-गांव जाकर लोगों की सहायता करतीं. इसी दौरान वे खुद भी प्लेग की चपेट में आ गईं और 10 मार्च 1897 को उनका देहांत हुआ.

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