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आखिर क्या है ताइवान जिसको लेकर भिड़ रहे हैं चीन और अमेरिका

आखिर क्या है ताइवान जिसको लेकर भिड़ रहे हैं चीन और अमेरिका

चीन का ताइवान (Taiwan) के लेकर दावा उसके और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ा रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

चीन का ताइवान (Taiwan) के लेकर दावा उसके और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ा रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

ताइवान (Taiwan) के लेकर चीन (China) और अमेरिका (USA) में लंबे समय से ठनी हुई है. पिछले कुछ समय से अमेरिकी ताइवान और वहां के लोकतंत्र के पक्ष में खुल कर सामने आने लगा है. तो वहीं चीन लंबे समय से ताइवान के अपना हिस्सा कहता रहा है और ऐसे किसी भी कार्य या घटना पर ऐतराज जता रहा है जिससे ताइवान के प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से एक देश की तरह माना जा सकता है.

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अमेरिकी संसद के निचले सदन की  स्पीकर नैंसी पोलेसी की ताइवान यात्रा पर चीन (China) ने कड़े कूटनीतिक कदम उठाए हैं. इससे चीन अमेरिका के बीच तनाव (China USA Tension) बढ़ गया है. ताइवान को लेकर दोनों देशों के बीच यह सबसे चरम स्तर का तनाव है. चीन ताइवान (China Taiwan Issue) को अपना हिस्सा मानता है जबकि अमेरिका उसकी आजादी और वहां लोकतंत्र की बात करता है. सवाल यह है कि आखिर दोनों देश ताइवान को लेकर क्यों टकरा रहे हैं. क्या ताइवान कोई देश है भी या नहीं या उसकी वास्तविक स्थिति क्या है. चीन और अमेरिका का ताइवान को लेकर क्या नजरिए है और  ऐसा क्या है जो दो महाशक्तियों के बीच टकराव की वजह है.

क्या है ताइवान
ताइवान का आधिकारिक नाम रिपब्लिक ऑफ चाइना है. यह पूर्वी एशिया में में स्थित एक द्वीपों का समूह है जो उत्तर पश्चिमी प्रशांत महासागर के पूर्वी एवं दक्षिण चीनसागार के मिलने वाले स्थान पर है. इसके उत्तर पश्चिम में चीन, उत्तर पूर्व में जापान और दक्षिण में फिलिपींस स्थित है. यह समूह कुल 168 द्वीपों से बना है जिनका संयुक्त क्षेत्रफल 36193 वर्ग किलोमीटर है. इसमें प्रमुख द्वीप को ताइवान का द्वीप कहते हैं जो 35808 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्रफल वाला द्वीप है.

संयुक्त राष्ट्र के देशों की सूची में नहीं
ताइवान को वैसे तो एक देश कहा जाता है, लेकिन यह संयुक्त राष्ट्र के देशों की सूची में शामिल नहीं है. जबकि यह  2.39 करोड़ की आबादी वाले देश की अधिकांश जनसंख्या शहरों में रहती है और यह दुनिया के सबसे घनी जनसंख्या वाला इलाका माना जाता कहा जाता है. ताइवान द्वीप के उत्तरी हिस्से में ताइपे शहर यहां का प्रमुख वित्तीय केंद्र है.

ताइवान का इतिहास
छह हजार साल पहले इसमें इसानों ने बसना शुरू किया था.  8 से 10वीं सदी में यहां चीन से लोगों ने आना सुरू किया. 13वी से 17वीं सदी के बीच यहां चीनी और जापानी लोग बसने लगे थे. 17वीं सदी में डच लोगों ने ताइवान को एक व्यापारिक केंद्र बनाया. 1683 में किंग वंश ने शासकों ने इस पर कब्जा किया था और 1895 में यह जापान के कब्जे में आ गया था.

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चीन (China) ताइवान को लंबे समय से अपना हिस्सा बताता रहा है, लेकिन वह कभी उसका हिस्सा बन नहीं सका था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

20 सदी से द्वितीय विश्वयुद्ध तक
साल 1911 में बाद चीनी गणतंत्र ने किंग साम्राज्य को खत्म किया और ताइवान चीन का हिस्सा  बना लिया गया. द्वितीय विश्व युद्ध में जापान ने इस पर कब्जा किया. मित्र राष्ट्रों के हाथों जापान की हार के बाद जब चीन का गृहयुद्ध हुआ तो ताइवान में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ में आ गया, लेकिन 1949 में चीन ताइवान से पीछे हट गया. वहीं 1951 में जापान ने ताइवान से अपना हर तरह का नाता तोड़ लिया लेकिन चीन जापान संधि में यह स्पष्टता से जिक्र नहीं किया गया कि ताइवान चीन का हिस्सा होगा.

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चीन से स्वतंत्र लेकिन
वास्तव में ताइवान चीन का हिस्सा नहीं है. ताइवान का अपने झंडा है, अपने सरकार और सेना है.  यहां लोग सीधे लोकतांत्रितक तरीके से अपने राष्ट्रपति चुनते हैं. ताइवान का आधिकारिक नाम रिपब्लिक ऑफ चाइना है. 1949 में चीन के गृह युद्ध में चीन कम्युनिस्टों चीनी राष्ट्रवादियों को हरा दिया था जो ताइवान चले गए थे जहां उन्होंने अपनी सरकार तो बना ली लेकिन खुद को एक अलग देश घोषित नहीं किया.

एक देश है कि नहीं
1971 तक ताइवान को संयुक्त राष्ट्र में एक देश की मान्यता मिली हुई थी. लेकिन 1971 के बाद इसे संयुक्त राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं मिली. यह भी दावा किया जाता रहा कि यह चीन काहिस्सा है, लेकिन 1990 में यहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरू होने से यह दावा कमजोर हो गया. वहीं लोकतंत्र की पैरवी करने वाले कई देश ताइवान को एक देश के रूप में मान्यता देने की बात करते रहे हैं.

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जब भी चीन अमेरिका के संबंधों में तनाव होता है, तब ताइवान (Taiwan) का मुद्दा भी सिर उठाने लगता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

चीन का दावा
चीन दावा करता रहा कि ताइवान उसका क्षेत्र है. वहां अधिकांश लोग चीनी मूल के हैं. चीन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी ताइवान के एक पृथक देश के रूप में मान्यता देने का विरोध करता है और उन देशों से भी उसके संबंध खराब ही हो जाते हैं जो ताइवान को मान्यता देते हैं और जहां जहां ताइवान के दूतावास आदि काम करते हैं.

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अमेरिका भी उन देशों में शामिल है जो खुल कर ताइवान का समर्थन करते हैं. लेकिन देखने में यह ज्यादा आया है कि ताइवान का मुद्दा तब ज्यादा उठता है जब किसी भी वजह से चीन –अमेरिका संबंध खराब होते हैं. इसके अलावा ताइवान दुनिया में सेमीकंटक्टर चिप का सबसे बड़ा उत्पादक है. माना जाता है कि इसी वजह से अमेरिका नहीं चाहता की ताइवान पर किसी भी तरह का चीनी दखल होने लगे. वहीं ताइवान सरकार के अपने दावे हैं जो एकल चीन के सिद्धांत का समर्थन तो करते हैं, लेकिन वर्तमान चीन यानि पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के अधीन नहीं है.

Tags: China, Research, USA, World

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