कानू सान्याल पुण्यतिथि: नक्सलबाड़ी आंदोलन के नेता का क्या था चीन कनेक्शन?

'पहले नक्सल' कहे गए कानू सान्याल.

पश्चिम बंगाल (West Bengal) से नक्सलवाद विद्रोह की शुरूआत करने वाले कानू कैसे अवैध ढंग से चीन गए थे? वहां चीनी आर्मी (Chinese PLA) से क्या ट्रेनिंग ली थी? माओ (Mao Zedong) ने चेतावनी देने के साथ ही उनके साथ क्या किसी तरह की डील की थी?

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देश में नक्सलवादी विद्रोह (Naxal Movement) के पहले सूत्रधार रहे कानू सान्याल ने 23 मार्च 2010 को पश्चिम बंगाल स्थित नक्सलबाड़ी (Naxalbari) में अपने घर पर खुद को फंदे पर टांगकर आत्महत्या की थी. नक्सलवाद आंदोलन कैसे शुरू हुआ था, इस बारे में भी आपको आगे संक्षेप में बताएंगे, लेकिन पहले आपको वो दिलचस्प कहानी बताते हैं, जिसकी वजह से भारत में तीसरी कम्युनिस्ट पार्टी (Commnist Party) बनी थी और चीन के उस समय के कद्दावर नेता माओ त्से तुंग (Mao Tse Tung) की तर्ज़ पर भारत में कम्युनिस्ट शासन (Communism in India) के सपने को साकार करने की भरसक कोशिश की गई थी.

कानू सान्याल ने 1967 में अपने तीन कामरेड साथियों के साथ चीन की यात्रा की थी, जो कानू के जीवन की एक रोमांचक याद रही. इसी यात्रा के दौरान कानू चीन के क्रांतिकारी नेता कहे जाने वाले माओ के विचारों से काफी प्रभावित हुए थे, लेकिन कहानी में पेंच यह है कि खुद माओ ने उन्हें सलाह दी थी कि भारत में उनकी नकल न की जाए, वरना बाज़ी उल्टी पड़ सकती है.



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कानू की चीन यात्रा
'बंदूक के ज़ोर पर ही सत्ता हासिल की जा सकती है', माओ की इस फिलासफी से बेहद प्रभावित हुए कानू ने खोखन मजूमदार, खुदन मलिक और नक्सल विचारक चारु मजूमदार के करीबी दीपक बिस्वास के साथ चीन की यात्रा चोरी छुपे की थी. आगे बताते हैं कि कैसे ये लोग गैर कानूनी ढंग से चीन पहुंचे थे.

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चीन में कम्युनिस्ट क्रांति के दिग्गज नेता माओ.


चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से ट्रेनिंग लेने वाले कानू ने अपनी 'तेराई रिपोर्ट' में लिखा था कि वो माओ, तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन लाई और आर्मी के कमांडर इन चीफ से मिले थे. 'माओ ने हमें सलाह दी थी कि जो कुछ चीन में सीखा है, उसे भुलाकर अपने देश की खास स्थितियों का समझकर क्रांति को आगे ले जाया जाए.'

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माओ से ही प्रभावित होकर चारु और कानू ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी लेनिनवादी CPI(M-L) 1969 में बनाई थी, जो भारत में कम्युनिस्ट विचार की तीसरी पार्टी थी. लेकिन क्या यह चीन के साथ कोई डील थी? यह सवाल इतिहास में खड़ा होता है.

माओ के सुझाव और प्रस्ताव!
कानू सान्याल पर कोलकाता बेस्ड पत्रकार बप्पादित्य पॉल द्वारा लिखी गई जीवनीनुमा किताब में इन तमाम बातों का उल्लेख है कि किस तरह चीन यात्रा के दौरान कानू और माओ के बीच संपर्क व बातचीत हुई. माओ ने कहा था :

नक्सलबाड़ी लौटकर आप लोग अपने हिसाब से क्रांति की रणनीति तैयार करें और ध्यान रखें कि वहां की ज़मीनी हकीकतें क्या हैं, उसी पर क्रांति की सफलता तय होगी, न कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की आंख मूंदकर नकल करने से.


बात सिर्फ सुझाव तक ही सीमित नहीं थी बल्कि एक प्रस्ताव भी दिया गया था. माओ ने कानू और उनके साथियों से कहा था कि अगर माओवादी भारत में सत्ता हासिल करने में कामयाब हो जाते हैं तो चीन दोस्ताना ढंग से आपसी सहमति से दोनों देशों के हित को साधते हुए सीमा विवाद का निपटारा करेगा.

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कानू सान्याल की आधिकारिक जीवनी.


आखिर किस तरह चीन पहुंचे थे कानू?
पॉल की किताब के हवाले से कहा जाता है कि कानू अपने कामरेड साथियों के साथ पहले काठमांडू पहुंचे थे और वहां उन्होंने चीनी दूतावास से संपर्क किया था. दूतावास ने इन लोगों के मकसद को समझने के बाद चीनी भाषा बोल पाने वाले एक दुभाषिये गाइड का इंतज़ाम करवाया था और नेपाल से पहले इन्हें तिब्बत ले जाया गया.

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तिब्बत के मुश्किल पहाड़ी रास्तों को पैदल पार करते हुए चीनी सीमा में कानू और टीम ने प्रवेश किया था, जहां से उन्हें चीनी सेना की वैनों के ज़रिये सेना के कैंपों तक ले जाया गया. किताब में यह भी उल्लेख है कि ये चारों ही तब हैरान हो गए थे जब उनकी मुलाकात बीजिंग में चारु मजूमदार के खास वफादार कृष्णभक्त शर्मा से हुई थी. शर्मा पहले ही चीन चोरी छुपे गए थे और वहां जाकर गायब हो गए थे.

शर्मा ने कानू को बताया था कि उन्हें किस तरह चीनियों ने जासूस समझकर तकरीबन मार ही डाला होता. बहरहाल, यहां पहुंचने के बाद कानू और उनके साथियों को मशीनगन, राइफल, ग्रेनेड, माइन्स बिछाने और विस्फोटक बनाने आदि की ट्रेनिंग दी गई.

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कानू सान्याल और चारु मजूमदार ने 1969 में सीपीआईएमएल की स्थापना की थी.


भारत का अपमान नहीं सहा!
चीनी आर्मी से ट्रेनिंग लेने के दौरान का एक किस्सा किताब में यह भी है कि जब कानू से एक चीनी सिपाही ने कहा था कि 'जितना खा सकते हो, खा लो क्योंकि लौटकर जाओगे तो तुम्हारे देश में तो खाने को कुछ है ही नहीं.' तब कानू की भावनाएं आहत हुई थीं और उन्होंने चीनी सोल्जर के मुंह पर साफ कहा था कि वो ट्रेनिंग लेने आए थे, खाने के लालच में नहीं.

कैसे शुरू हुआ था नक्सल विद्रोह?
दो बातें खास हैं, एक तो कानू के बाद भी सूरिन बोस जैसे कम्युनिस्ट विचार के नेता चीन जाते रहे और दूसरी यह कि कानू और चारु के विवाद के बाद नक्सल आंदोलन कैसे ढीला पड़ता गया और कमज़ोर हो गया, यह एक अलग इतिहास है. यहां कानू की पुण्यतिथि के मौके पर यह ज़रूर जानना चाहिए कि यह विद्रोह शुरू कैसे हुआ था.

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साहूकारी और ज़मींदारी में नक्सलबाड़ी के किसान सदियों से पिस रहे थे. एक घटना हुई जब गरीब बिगुल किसान को साहूकारों ने बुरी तरह प्रताड़ित किया. 24 मई 1967 को पुलिस गांव पहुंची तो नाराज़ लोगों की भीड़ ने पुलिस पर हमला बोल दिया और एक फसर मारा गया. यह घटना बड़ी थी. अगले दिन पुलिस ने किसान सभा में फायरिंग की और 11 लोग मारे गए.

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न्यूज़18 क्रिएटिव


मध्यम वर्गीय परिवार में 1932 में जन्मे सान्याल किसानों के नेता के रूप में केंद्र में थे और पुलिस व साहूकारी के अत्याचार के खिलाफ आंदोलन को उन्होंने आग की तरह फैला दिया. विद्रोह को तब बंगाल के सीएम सिद्धार्थ शंकर रे ने तुरंत तो कुचला लेकिन इसे दुनिया भर में सुर्खियां मिलीं और बंगाल ही नहीं, कई जगहों पर किसानों ने अत्याचार के खिलाफ बंदूक उठाने का रास्ता अपनाया.

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